मुफ्त की रेवड़ियों पर राज्यों को सुप्रीम कोर्ट की फटकार 

इस साल पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव से पहले ‘मुफ्त की रेवड़ियां’ बांटने पर कड़ी आपत्ति जाहिर की है। राज्य सरकारों को फटकार लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि अगर वे इसी तरह मुफ्त खाना, मुफ्त बिजली जैसी सुविधाएं देते रहेए तो विकास के लिए पैसे कहां से बचेगा? तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने एक याचिका दायर कर उपभोक्ताओं की वित्तीय स्थिति पर गौर किए बिना हर किसी को मुफ्त बिजली देने करने का प्रस्ताव दिया है।  इसके बाद मुफ्त की रेवड़ियां बांटने का मुद्दा एक बार फिर सामने आ गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनाई के दौरान कहा कि कई सरकारें करोड़ों रुपये विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं पर सब्सिडी देने में खर्च कर रही हैं जबकि वे बजट घाटे का सामना कर रही हैं और विकास एवं बुनियादी ढांचे के लिए धन की कमी की शिकायत कर रही हैं। अदालत ने कहा कि अंधाधुंध मुफ्त सहायता, विशेष रूप से उन लोगों को जो उपयोगिताओं और सेवाओं के लिए भुगतान करने में सक्षम हैं, इससे एक ऐसी संस्कृति का जन्म हुआ है जो काम न करने को पुरस्कृत करती प्रतीत होती है। 
सुप्रीम कोर्ट ने लोगों को मुफ्त सुविधाएं देने की संस्कृति की कड़ी आलोचना करते हुए गुरुवार को कहा कि देश के आर्थिक विकास में बाधा डालने वाली ऐसी नीतियों पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है। शीर्ष अदालत ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अगर राज्य गरीबों की मदद करते हैं, तो यह बात पूरी तरह से समझ में आती है। देश के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची एवं न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने कहा कि अधिकतर राज्यों का राजस्व घाटे में हैं, लेकिन वे विकास की अनदेखी करते हुए इस तरह की मुफ्त सुविधाएं प्रदान कर रहे हैं। 
अदालत ने कहा कि इस तरह की मुफ्त सुविधाएं देने से देश के आर्थिक विकास में बाधा पैदा होती है और राज्यों को सभी को मुफ्त भोजन, साइकिल और बिजली देने के बजाय रोज़गार के अवसर खोलने के लिए काम करना चाहिए। हालांकि, अदालत ने द्रविड़ मुनेत्र कजगम (द्रमुक) सरकार के नेतृत्व वाली बिजली वितरण कंपनी की मुफ्त बिजली उपलब्ध कराने का प्रस्ताव रखने वाली याचिका पर केंद्र और अन्य को नोटिस जारी किया। बिजली वितरण कंपनी ने विद्युत संशोधन नियम-2024 के एक नियम को चुनौती दी है। पीठ ने कहा, ‘भारत में हम कैसी संस्कृति विकसित कर रहे हैं? यह समझ में आता है कि कल्याणकारी कदमों के तहत आप उन लोगों को नि:शुल्क सुविधाएं उपलब्ध कराना चाहते हैं, जो बिजली शुल्क चुकाने में असमर्थ हैं।’
गौरतलब है कि इन मुद्दों में से पहला रेवाड़ी के नाम से जानी जाने वाली मुफ्त योजनाओं का मुद्दा है, जिसे हाल ही में दायर किया गया था, लेकिन पहली याचिका 2013 में मुफ्त उपहारों को रोकने के लिए दायर की गई थी, यहां तक कि रेवड़ी शब्द प्रचलन में आने से पहले ही। तमिलनाडु में पार्टियां भविष्य की सरकार से मुफ्त रंगीन टीवी, मिक्सर और अन्य वस्तुओं के साथ मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रही हैं। इस भ्रष्टाचार को रोकने की मांग करने वाले मामले को भी सुलझा लिया गया। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने मुफ्त योजना को रोकने के लिए क्या निवारक उपाय किए जाने चाहिए, विशेष रूप से चुनाव से पहले सत्तारूढ़ दल को इस तरह की घोषणाएं करने से कैसे रोका जाए, इस पर सरल नियमों को अनिवार्य और लागू नहीं किया था। 
लेकिन यह अपरिहार्य है कि अदालत के निर्देशों को खाली उपदेशों के रूप में मानने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जिसे सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नहीं किया जाता है। लोकतंत्र (यहां तक कि एआई जैसे नए क्षेत्रों में भी) का लोकतंत्रीकरण किया जाना चाहिए। देश के आर्थिक सलाहकारों को पता चलने से पहले ही देश के आर्थिक सलाहकारों ने आर्थिक सर्वेक्षण में कहा है कि अगर हम विकास दर को एक निश्चित प्रतिशत बिंदु पर और घाटे को एक निश्चित प्रतिशत पर रखते हैं तो क्या होगा? ऐसी सूची बनाई जाती है। उधर, चुनाव आयोग की प्रैस कॉन्फ्रैंस में कहा जा रहा है कि बिना किसी प्रलोभन के खुले माहौल में चुनाव कराया जाएगा। इससे देश की प्रगति नहीं टूटती है, लेकिन अगर निर्देशों और शिक्षाओं को नहीं समझा गया तो यह धीमा हो सकता है।
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