न्यायिक अधिकारी तय करेंगे एसआईआर की विसंगतियों के मामले

एक अप्रत्याशित निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी ‘असाधारण शक्तियों’ का प्रयोग करते हुए पश्चिम बंगाल में न्यायिक अधिकारी तैनात करने का निर्देश दिया है, जो एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) के ‘तार्किक विसंगति’ मामलों को तय करेंगे और उनका फैसला सुप्रीम कोर्ट का फैसला माना जायेगा। यह निर्देश इसलिए दिया गया है ताकि राज्य में मतदाता सूची का एसआईआर तेज़ी से और समय से पूरा हो सके। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी बल दिया है कि अगर रिविजन एक्सरसाइज समय से पूरी न हुई तो उसके नतीजों से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तो अवगत होंगी ही। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची और न्यायाधीश विपुल एम पंचोली की खंडपीठ ने 20 फरवरी, 2026 को तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व वाली राज्य सरकार की आपत्ति के बावजूद चुनाव आयोग को यह अनुमति दी कि वह 28 फरवरी, 2026 को संशोधित मतदाता सूची प्रकाशित कर सकता है, जोकि कुल सूची का 95 प्रतिशत है। क्योंकि जिन लोगों को शामिल नहीं किया गया है, उनके दावे अभी लम्बित पड़े हैं। अंतिम सूची प्रकाशित करने की तिथि भी 28 फरवरी ही थी। 
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के इस आग्रह को भी स्वीकार नहीं किया कि मतदाता सूची में शामिल किये जाने के दावों पर अंतिम निर्णय इलेक्ट्रोल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (ईआरओ) का होना चाहिए न कि न्यायिक अधिकारियों का। बहरहाल, सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत इस मामले में अप्रत्याशित हस्तक्षेप करने का फैसला क्यों लिया? खंडपीठ के अनुसार, उसे ऐसा इसलिए करना पड़ा क्योंकि पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग व राज्य सरकार के बीच विश्वास के अभाव व असहयोग के कारण ‘असाधारण स्थिति’ उत्पन्न हो गई थी। खंडपीठ ने कहा, ‘अगर कुछ अनपेक्षित कारणों से एसआईआर मुकम्मल नहीं हो पाती है तो उसके परिणाम क्या होंगे, राज्य को इस बात का एहसास होना चाहिए।’ गौरतलब है कि अगर मतदाता सूची समय पर तैयार नहीं होगी तो राज्य में समय पर विधानसभा चुनाव नहीं हो पायेंगे और केंद्र को पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू करने का बहाना मिल सकता है; क्योंकि वह ममता बनर्जी को कार्यवाहक सरकार चलाने का मौका तो देने से रहा, उसके लिए तो राज्यपाल के ज़रिये शासन करना अधिक लाभकारी होगा, जैसा कि उसने लम्बे समय तक जम्मू कश्मीर में किया लेफ्टिनेंट गवर्नर के माध्यम से। 
आगे बढ़ने से पहले यहां यह जानकारी देना भी आवश्यक है कि भारत के चुनाव आयोग ने 17 राज्यों व 5 केंद्र शासित प्रदेशों (जहां अभी एसआईआर नहीं हुआ है) के मुख्य चुनाव अधिकारियों को पत्र (19 फरवरी, 2026) लिखकर कहा है कि अप्रैल 2026 से आरंभ होने वाली एसआईआर के लिए सभी तैयारी कार्य जल्द से जल्द पूरा कर लें। इस तैयारी कार्य में शामिल है 2002-2004 (जब पिछला एसआर हुआ था) की मतदाता सूची से वर्तमान मतदाताओं को मैप करना और बूथ स्तर के अधिकारियों (बीएलओ) को प्रशिक्षित करना। गौरतलब है कि सबसे पहले एसआईआर पिछले साल बिहार में करायी गई, विधानसभा चुनाव से ज़रा पहले। दूसरे चरण में चुनाव आयोग ने 27 अक्तूबर, 2025 को 12 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर का आदेश दिया, जो अब पूर्ण होने के चरण में है, अनेक बार अतिरिक्त समय देने के बाद। अंतिम तिथि को सबसे अधिक बार उत्तर प्रदेश में बढ़ाया गया। असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीज़ंस की अधूरी प्रक्रिया के कारण कानूनी बाधाएं थीं, इसलिए एसआईआर की जगह एसआर कराया गया था। 
सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को यह ज़िम्मेदारी सौंपी है कि वह न्यायिक अधिकारियों का चयन वर्तमान व रिटायर्ड ज़िला न्यायाधीशों व अतिरिक्त ज़िला न्यायाधीशों में से करें, जो न्यायिक अधिकारी नियुक्त किये जायेंगे वह ही ‘तार्किक विसंगति’ की श्रेणी के तहत जो मतदाता रखे गये हैं, उनके दावों व आपत्तियों के फैसले करेंगे। 
खंडपीठ के अनुसार, न्यायिक अधिकारी एसआईआर प्रक्रिया के दौरान दावों व कागज़ात की समीक्षा करते हुए जो आदेश पारित करेंगे वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित आदेश माना जायेगा और एसपी व डीएम को तुरंत उसका पालन करना होगा। खंडपीठ के अनुसार, ‘राज्य में जो असाधारण स्थितियां उत्पन्न हुई हैं, उनके मद्देनज़र यह निर्देश दिये गये हैं, अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट को प्राप्त असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए।’ पश्चिम बंगाल में एसआईआर के मुकम्मल न होने को लेकर चुनाव आयोग व राज्य सरकार में ज़बरदस्त टकराव की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। चुनाव आयोग ने अदालत में अपने वकील के ज़रिये शिकायत की थी कि राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के 9 फरवरी, 2026 के आदेश के अनुसार ग्रुप ए अधिकारियों की पर्याप्त संख्या तैनात नहीं कर रही है, जो ईआरओ व सहायक ईआरओ के रूप में कार्य कर सकें।
राज्य सरकार ने चुनाव आयोग के विरुद्ध अनेक शिकायतें दर्ज की थीं कि वह उचित तरीके से मतदाताओं के दावों व कागज़ात का संज्ञान नहीं ले रहा है। खंडपीठ ने पहले तो राज्य सरकार पर गुस्सा किया कि वह उसके 9 फरवरी के आदेश का पालन नहीं कर रही है, लेकिन फिर उसे एहसास हुआ कि दोनों पक्षों के बीच आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला कुछ अधिक ही तीखा हो गया है। इसलिए उसने अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग किया और न्यायिक अधिकारी तैनात करने का आदेश दिया, मतदाताओं के दावे व उनके कागज़ात की विश्वसनीयता तय करने के लिए। पश्चिम बंगाल में एसआईआर का 95 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। मतदाताओं की इस अधूरी सूची को 28 फरवरी, 2026 को प्रकाशित कर दिया जायेगा, सुप्रीम कोर्ट ने इसकी अनुमति दे दी है। शेष सूची न्यायिक अधिकारियों का कार्य पूर्ण होने के बाद प्रकाशित की जायेगी। सुप्रीम कोर्ट इस बात से सहमत नहीं है कि अधूरी सूची प्रकाशित करने से राज्य में अनेक जगहों पर कानून व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने डीजीपी से कहा है कि वह पूरक व्यक्तिगत शपथ-पत्र दाखिल करें यह बताते हुए कि एसआईआर प्रक्रिया को बाधित करने की जो 28 घटनाएं हुई हैं और चुनाव आयोग के खिलाफ जो भड़काऊ भाषण दिये गये हैं, उनमें क्या एक्शन लिया गया है। अनुमान यह है कि अब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद पश्चिम बंगाल में प्रत्येक वैध नागरिक अपना नाम मतदाता सूची में पायेगा।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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