दास्तान एक योद्धा की
कौन थे मेजर हरि पाल सिंह आहलूवालिया ?
एक बहादुर सैनिक, एक जांबाज़ पर्वतारोही और एक समाज सेवक, यदि एक शब्द में इनके बारे में ज़िक्र करना हो तो कहा जा सकता है—एक योद्धा।
कई लोग इतने सकारात्मक स्वभाव के होते हैं कि यदि उनके साथ ज़िंदगी में कुछ बुरा हो जाए तो वे उसको एक चुनौती की तरह लेते हैं, हिम्मत नहीं हारते और अन्य लोगों के लिए मिसाल बनते हैं। हम बात कर रहे हैं ऐसे व्यक्ति की, जिसने अपनी बहादुरी, अपनी हिम्मत, अपने जज़्बे के साथ ज़िंदगी में आए मुश्किल समय में हार नहीं मानी बल्कि चुनौती का सामना करके लोगों के लिए एक मिसाल कायम की कि अपने शरीर पर आए कष्ट के साथ जीना सीखो, लोगों के लिए कुछ बेहतर करने में योगदान डालो। उनकी सख्त मेहनत और लगन के कारण आज पूरे भारत को उन पर गर्व है। यह हैं मेजर हरि पाल सिंह आहलूवालिया जिनका जन्म 6 नवम्बर 1936 को शिमला में हुआ।
अपनी ग्रैजुएशन के बाद वह भारतीय सेना में भर्ती हो गये। अपनी सैन्य सेवा के साथ-साथ उन्होंने जांबाज़ खेलों, वातावरण में सुधार, विकलांगों की भलाई और समाज सेवा में योगदान डाला। उन्होंने हिमालय की चढ़ाई हेतु सिखलाई प्राप्त की, जिसके तहत सिक्किम और नेपाल में कई चोटियों को फतेह किया।
1965 में भारतीय सेना ने एवरेस्ट की चढ़ाई चढ़ने के लिए एक टीम तैयार की, जिसमें 9 लोग शामिल थे। इस टीम का मोहन सिंह कोहली ने नेतृत्व किया और स. आहलूवालिया जी इसके सदस्य थे। यह एवरेस्ट की चढ़ाई की पहली कामयाब भारतीय मुहिम थी। यह पहली माउंट एवरेस्ट की मुहिम थी, जिसने सबसे ज्यादा भारतीय पर्वतारोहियों की शमूलियत का रिकार्ड बनाया। इससे स. आहलूवालिया का नाम माउंट एवरेस्ट की चोटी को फतेह करने वाले पहले भारतीयों में शामिल हो गया। स. आहलूवालिया जी को लैफ्टिनेंट और कैप्टन रैंक की तरक्की दी गई।
एवरेस्ट की चढ़ाई फतेह करने के बाद स. आहलूवालिया ने बहुत नाम कमाया परन्तु बदकिस्मती से पाकिस्तान के साथ 1965 की जंग में उनको गोली लगने से कमर से नीचे के हिस्से से वह अपाहिज हो गये।
1968 में सेना छोड़ दी परन्तु उनको मेजर के ‘ऑनरेरी’ रैंक से सम्मानित किया गया।
स. आहलूवालिया जी ने बहुत से पर्वतारोहियों को अपनी उपलब्धियों से उत्साहित किया। वह लिखते थे, ‘पहाड़ कुदरत की सबसे बढ़िया देन है। पहाड़ भगवान के साथ नाता जोड़ने का सबसे अच्छा साधन है।’
स. आहलूवालिया को पद्म भूषण और पद्म-श्री के अलावा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहुत से मैडल और ईनामों के साथ सम्मानित किया गया।
स. आहलूवालिया जी ने 13 किताबें लिखीं, उन्होंने एक टेलीविज़न धारावाहिक का भी निर्माण किया, जिसका नाम था ‘बियोंड हिमालया’। यह धारावाहिक डिस्कवरी और नेशनल ज्योग्राफिक पर प्रसारित हुआ और इसको ईनाम भी दिया गया था।
वह ‘स्पेशल एबिलिटी ट्रस्ट और रिहैबिलिटेशन काउंसिल ऑफ इंडिया’ (Special Ability Trust and Rehabilitation Council of India) के चेयरमैन थे।
इतने उच्च स्तर तथा हौसले वाले इन्सान के साथ जब कोई भयानक हादसा हो जाए और वह हिम्मत नहीं हारते। जब स. आहलूवालिया जी गोली लगने के बाद अपाहिज हो गये तो इलाज के लिए उनको विदेशों में जाना पड़ा था, क्योंकि भारत में रीढ़ की हड्डी का उस समय इलाज नहीं था। मेजर स. आहलूवालिया जी व्हीलचेयर पर आ गये, क्योंकि उनकी चलने फिरने की सामर्थ्य चलाई गई थी। उनके साथ हुई इस घटना ने स. आहलूवालिया जी को अंदर से हिला कर रख दिया। इसलिए नहीं कि वह चलने में असमर्थ हो गये थे परन्तु उनको दु:ख इस बात का अधिक था कि हमारे देश में रीढ़ की हड्डी का इलाज क्यों नहीं है। उन्होंने अपने मन में कुछ ऐसा करने का पक्का इरादा कर लिया कि भविष्य में भारत के लोगों को रीढ़ की हड्डी के हुए नुकसान के लिए मायूस न होना पड़े बल्कि उनको अच्छा इलाज भारत में ही मिले।
इस सोच ने जन्म दिया ‘द इंडियन स्पाइनल इंजरीज़ सैंटर’ The Indian Spinal Injuries Centre (ISIC) दिल्ली को, वह अस्पताल जो रीढ़ की हड्डी के रोगियों को इलाज उपलब्ध करवा रहा है। उन्होंने अपनी बाकी की ज़िंदगी अक्षमता वाले लोगों की सेवा करने में गुजारने का फैसला किया और सारी ज़िंदगी इसी काम में लगे रहे।
मेजर स. आहलूवालिया जी कहते थे, माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई ने और ISIC ने ज़िंदगी का एक सच सिखाया है कि ‘ज़िंदगी का मकसद है, एक और मुहिम को जीतना जो है हमारे मन की मुहिम’।
मेजर हरि सिंह आहलूवालिया 14 जनवरी, 2022 को 85 साल की आयु में इस दुनिया को छोड़ कर चले गये। अंतिम पलों तक उन्होंने लोगों की सेवा में कमी नहीं आने दी। अपनी ज़िंदगी के मकसद ढ्ढस्ढ्ढष्ट अस्पताल के ज़रिये वह हमेशा के लिए लोगों के मन पर, उनकी ज़िंदगी में एक बड़ा सकारात्मक प्रभाव छोड़ कर चले गये। उनके पीछे उनकी पत्नी श्रीमती भोली आहलूवालिया और बेटी सुगंध आहलूवालिया (जो बोर्ड सदस्य और मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं) ने उनका मकसद पूरा करने में आज तक ढ्ढस्ढ्ढष्ट के ज़रिये कोई कमी नहीं छोड़ी। उनकी याद और कुर्बानियों को ताज़ा रखने के लिए स. आहलूवालिया जी के नाम पर अस्पताल में म्यूज़ियम भी बनाया गया है।
स. आहलूवालिया जी की ज़िंदगी के बारे में जानकर, उनके द्वारा किए कार्यों को पहचान कर सच में यह लगता है कि भगवान कुछ लोगों के मन में अमर हो जाते हैं। हम सभी को ऐसे महान लोगों की ज़िंदगी से शिक्षा ज़रूर हासिल करनी चाहिए। ऐसी शख्सियतों के बारे में जानकर दिल से उनके लिए सलाम निकलता है। हमेशा इन का जज़्बा, सेवा, लोगों के दिलों में अमर रहे।
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