चाचा चंडीगढ़िया के तीरों की कटु, कठोर और मीठी चुभन
पंजाबी लेखक सभा द्वारा 1980 में बलराज साहनी सम्मान प्राप्त कनरे वाले चाचा चंडीगढ़िया के नाम से जाने जाते गुरनाम सिंह तीर को मैं 1953 से जानता था। तब पंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों ने उन्हें जनसम्पर्क अधिकारी नियुक्त करके देश की राजधानी नई दिल्ली भेजा था। उनका आवास इंडिया गेट के पास एक सरकारी कॉलोनी पंडारा रोड था, जहां मेरी जीवन साथी भी रहती थीं। जब मैंने दिल्ली में अपनी सरकारी नौकरी से 9 वर्ष पहले सेवामुक्त होकर पंजाबी ट्रिब्यून की सम्पादकीय का काम संभाला तो चंडीगढ़ में मेरा स्वागत भी तीर ने ही किया था। उन्होंने 1924 से 2017 तक अपने 70 साल के जीवन में अमूल्य हास्य-व्यंग्य पुस्तकें लिखीं। उसका ‘चाचा चंडीगढ़िया’ शीर्ष वाला कॉलम आज भी शौक से पढ़ा जाता है। गुरनाम सिंह तीर फिरोज़पुर ज़िले के गांव कोट सुखिया में जन्मे थे। उनके तीरों में मीठी चुभन होती थी। ‘पत्नियां’ नामक पुस्तक में निम्नलिखित बात लिखने वाले वही थे।
‘एक वकील ने एक दिन अपनी पत्नी का ज़िक्र करते हुए कहा, ‘़खुदा-नाखास्ता, अगर मेरे खिलाफ कोई मुकद्दमा दर्ज हो जाए और मेरी पत्नी इस इस्तगासे के गवाह के तौर पर पेश हो, तो वह मुझे अवश्य कैद करवा कर रहेगी।’
एक पत्नी अपने पति के दोस्तों से कहने लगी कि इन्होंने पी.एच.डी. करते हुए नौ साल साहित्य को दिए। अगर मुझे कहीं इन पर पी.एच.डी. करनी हो तो मैं तीन महीने में इनके बारे में इतनी सुंदर पुस्तक लिख सकती हूं जो वह तीस साल में भी नहीं लिख सकते।
कुछ व्यक्ति अपनी पत्नियों से इतने परेशान हो जाते हैं कि वे ज्योतिषियों की ओर दौड़ते हैं और जाकर पूछते हैं कि उसकी पत्नी से उसका पीछा कब छूटेगा?
इस पुस्तक के कुछ पात्रों में से एक पात्र एक ज्योतिषी मित्र को मुंह मांगी दक्षिणा देकर पूछता है कि श्रीमती जी से मेरा पीछा कब छूटेगा?
ज्योतिषी ने अपने कागज़-पत्र उलटे-सीधे करते हुए कहा, ‘श्रीमान जी, मेरे ज्योतिष के अनुसार, आपकी पत्नी आपके निधन के बीस वर्ष बाद तक आपके घर की देखभाल करेगी।’ पूछने वाला चुप करके बैठ गया।
पति-पत्नी के घरेलू संबंध इतने मित्रतापूर्ण होते हैं कि यदि समुचित ढंग से बयान किए जाएं तो उच्च दर्जे का हास्य-व्यंग्य पैदा कर देते हैं। व्यंग्य की एक जानी-मानी शक्ति है कि यह जीवन से गुस्से हुए औरंगज़ेब जैसे बादशाह को हंसा देता है। पंजाब के कुछ जट्ट लोगों को पकड़ कर औरंगज़ेब के दरबार में ले जाकर कहा गया कि वे इस्लाम कबूल करें।
एक नेता जट्ट कहने लगा, ‘महाराज इतना बढ़िया धर्म अवश्य कबूल करेंगे, परन्तु आपके पिछले पूर्वज, हमारे पूर्वजों को इस्लाम कबूल करने के लिए दो-दो लाख रुपये दान दिया करते थे, और आप कम से कम हमें एक-एक लाख रुपये तो दें।’ औरंगज़ेब हैरान होकर कहने लगा, ‘क्या आप पहले भी इस्लाम धारण कर चुके हैं?
जट्ट नेता कहने लगा, ‘जनाब बैलगाड़ी के पहिये की भांति चलते रहना ठीक है।’ औरंगज़ेब इनकी बातें सुन कर खिल-खिलाकर हंस पड़ा और कहने लगा, ‘आप अजीब किस्म के धार्मिक लोग हैं, जो पैसे लेकर धर्म बदलते हैं।’
जट्ट सुन कर कहने लगे, ‘हम तो यही इंतज़ार करते रहते हैं कि कब यह बादशाह मरता है और कब अगला आता है?’ औरंगज़ेब ने हाथ जोड़ कर उन्हें वापसी का किराया दिया और कहा कि अभी तुम पिछला धर्म ही चलाओ, अगले की बात फिर करेंगे।
जब इब्राहिम लिंकन अमरीके के राष्ट्रपति बनें तो उन्होंने अपने एक साथी को कहा, ‘वह सामने वाली गली में लगभग सौ गज़ आगे जाकर मुड़ जाना, उस गली में आगे जाकर एक बड़ा-सा आंगन होगा। उसमें एक महिला चर्खा चला रही होगी। तुम उसे यह खुशखबरी दे देना कि तुम्हारा पति अमरीका का प्रमुख बन गया है। वह अवश्य तुम्हारा मुंह मीठा करवाएगी।
संदेश देने वाला सज्जन मुस्कुराता हुआ मिसिज़ लिंकन के पास जा पहुंचा और कहने लगा, ‘मैडम बधाई हो लिंकन साहिब अमरीका के प्रमुख बन गए हैं।’
मिसेज़ लिंकन मुंह बनाकर कहने लगीं, ‘पहले चंद्रा कब घर आता था, अगर आ भी जाता था तो अपने कागज़-पत्र पढ़-पढ़ कर समय खराब करता रहता था। कभी सीधे मुंह बात नहीं करता था। अब वह बिल्कुल किसी काम का नहीं रहा।’
मेरी ओर से चाचा चंडीगढ़िया की अपनी बात
‘भाभी, क्या बात आज सूल-सूल कर रही हैं, कहीं फिर आपस में झगड़ तो नहीं पड़े? चन्नो की ननद जीतां ने अपनी भाभी से बड़ी हमदर्दी से पूछा।
चन्नो कहने लगीं, ‘मेरी हड्डियां व प्राण तो परमात्मा ने शायद इसलिए बनाएं हैं कि तुम्हारा भाई ‘परानियां’ मार-मारकर तोड़ दे। कई बार छोटी-सी बात पर लाठी डंडा लेता है।’
जीतां ने कुछ मुस्कुराकर कहा,‘भाभी, ये सब तो प्यार की बातें हैं। जोगिंदर वीर तुमसे बहुत प्यार करता था। इसीलिए कभी-कभी वह ज़रूरत से ज़्यादा लड़ाई-झगड़ा कर लेता है।’ अगले दिन हमारे स्कूल में एक अध्यापक एक अंग्रेज़ लेखक मिस्टर डार्लिंग की किताब पढ़ कर सुना रहे थे। वह किसी समय फिरोज़पुर जिले में डिप्टी कमिश्नर थे। जब दौरा करते हुए हमारे गांव बाघा पुराणा पहुंचे तो एक बूढ़ी औरत ने डार्लिंग साहिब से कहा, ‘साहिब, मेरा दामाद मेरी बेटी से प्यार नहीं करता।’ साहिब बहुत हैरान हुआ और कहने लगा, ‘माई, तुम्हे बेवजह शक हो गया है। तुम्हारे पास क्या सबूत है कि तुम्हारा दामाद तुम्हारी बेटी से प्यार नहीं करता? फिर इस मामले में डिप्टी कमिश्नर क्या कर सकते हैं?’
महिला साहिब से कहने लगीं, ‘साहिब, मेरे दामाद ने कभी मेरी बेटी को पीटा नहीं और न पीटना इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि वह उसे प्यार नहीं करते।’
महिला की बात पर साहिब हंस पड़े। तो भाभी, भाई जोगिंदर उस महिला के हिसाब से आपको ज़्यादा ही प्यार करते है, इसीलिए कभी-कभी बैलों वाली ‘परानी’ के साथ एक-दो जड़ जाता है।
गुस्सा होने के बजाय चन्नो मुस्कुराई और बोली, ‘जीतां जब तुम्हारी शादी होगी तो देखेंगे कि पति किस ढंग से प्यार करता है।’
चंडीगढ़ में मेरे सेक्टर के मकान नंबर 1521 में उनकी बेटी बब्बू तीर, दामाद गुरमोहन सिंह संधू और उनका पूरा परिवार है, जिसमें उनकी मेडिकल पास सीरत कौर, फतेह सिंह गिल, निमरत कौर सिद्धू और सहजबीर सिंह सिद्धू आनंद से रह रहे हैं।



