करज़ को बढ़ाती और विकास में बाधा बनती ‘रेवड़ियों की राजनीति’

भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में पिछले एक दशक में एक बड़ा बदलाव आया है। विभिन्न पार्टियों की नीतियों का केन्द्र मुफ्त की रेवड़ियां यानी मुफ्त की योजनाएं बन गया है। कभी सामाजिक सुरक्षा के रूप में देखी जाने वाली ये योजनाएं अब चुनावी रणनीति का केन्द्र बन चुकी हैं। नकद हस्तांतरण, मुफ्त राशन, महिलाओं के लिए मासिक सहायता, बिजली-पानी पर सब्सिडी आदि इन सबने मिलकर एक ऐसा मॉडल तैयार किया गया है, जिसमें चुनाव जीतने का गणित सीधे लाभ से जुड़ गया है। लेकिन इस मॉडल की कीमत क्या है? क्या यह वास्तव में गरीबों के सशक्तिकरण का रास्ता है या फिर अर्थ-व्यवस्था को कमज़ोर करने वाला एक दीर्घकालिक जोखिम? यही इस पूरे विमर्श का मूल प्रश्न है।
मुफ्त की रेवड़ियों का सबसे बड़ा उभार 2020 के बाद देखने को मिला, जब विभिन्न राज्यों में चुनावी घोषणाओं में नकद सहायता और मुफ्त सेवाओं का अनुपात तेज़ी से बढ़ा। पश्चिम बंगाल की ‘लक्ष्मीर भंडार’ योजना, मध्य प्रदेश की ‘लाड़ली बहना’, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में महिलाओं के खातों में सीधे पैसे भेजने की योजनाएं, इन सबने एक नया रुझान पैदा कर दिया है। अब स्थिति यह है कि चुनावी घोषणा-पत्र विकास के वादों से ज्यादा सीधे पैसे और सुविधाओं के इर्द-गिर्द घूमने लगे हैं। राजनीतिक दलों के बीच एक तरह की प्रतिस्पर्धा बन गई है कि कौन ज्यादा देगा, कौन ज्यादा तेज़ी से देगा और किस वर्ग को सीधे लाभ पहुंचाएगा। इस प्रतिस्पर्धा ने लोकतांत्रिक राजनीति को नीतिगत बहस से हटाकर आर्थिक पेशकश की दिशा में मोड़ दिया है।
रेवड़ियों की राजनीति का सबसे अहम पहलू है—महिला मतदाताओं को केन्द में रखना। लगभग हर राज्य में महिलाओं के लिए अलग योजनाएं बनाई जा रही हैं, जिनमें हर महीने 1000 से 2500 रुपये तक की नकद सहायता दी जा रही है। इस रणनीति के पीछे स्पष्ट गणित है। कई राज्यों में महिला वोटरों की संख्या पुरुषों के बराबर या उससे अधिक हो चुकी है। तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में महिलाओं का वोट प्रतिशत 50 प्रतिशत से ज्यादा है। ऐसे में यह वर्ग चुनावी नतीजों को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकता है।
इन योजनाओं का सामाजिक असर भी दिखा है। कई गरीब परिवारों में महिलाओं के हाथ में पहली बार नियमित नकदी आई है। लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी उठता है कि क्या यह वास्तविक सशक्तिकरण है या सिर्फ  आर्थिक निर्भरता का नया रूप है।
रेवड़ियों की सबसे बड़ी आलोचना इसके आर्थिक प्रभाव को लेकर है। आंकड़े बताते हैं कि कई राज्यों में इन योजनाओं का खर्च कुल राजस्व का 30 से 40 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इसका सीधा मतलब है कि सरकारों के पास विकास कार्यों के लिए पैसा कम बच रहा है। मध्य प्रदेश में लाड़ली बहना और अन्य सब्सिडी योजनाओं पर सालाना करीब 50 हज़ार करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। तेलंगाना में चुनावी वादों को पूरा करने के लिए हर साल लगभग एक लाख करोड़ रुपये की ज़रूरत है। पंजाब में स्थिति और गंभीर है, जहां आय और खर्च के बीच बड़ा अंतर है और बजट संतुलन बिगड़ चुका है। इसका असर यह हो रहा है कि सरकारें लगातार कज़र् ले रही हैं। इससे भविष्य में वित्तीय संकट और बढ़ जाएगा। कई राज्यों में तो स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि वेतन और पेंशन देने में भी दिक्तत आने लगी है।
जब बजट का बड़ा हिस्सा मुफ्त की योजनाओं पर खर्च होता है तो सबसे पहले असर विकास परियोजनाओं पर पड़ता है। सड़क, पुल, सिंचाई, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि ये सभी क्षेत्र धीरे-धीरे फंड की कमी से प्रभावित होते हैं। राजस्थान जैसे राज्यों में सड़क और पानी परियोजनाओं का बजट कम करना पड़ा। महाराष्ट्र में कुछ पारंपरिक योजनाएं बंद करनी पड़ीं। इसका मतलब यह है कि तत्काल राजनीतिक लाभ के लिए दी जा रही राहत दीर्घकालिक विकास को कमज़ोर कर रही है। यह स्थिति एक ‘ट्रेड ऑफ ’ पैदा करती है कि सरकारें आज राहत दें या भविष्य के लिए निवेश करें? अगर यह संतुलन बिगड़ता है तो आने वाले वर्षों में रोज़गार, औद्योगिक विकास और आर्थिक वृद्धि पर गंभीर असर पड़ सकता है।
एक राज्य में अगर कोई पार्टी 1000 रुपये की योजना लाती है तो दूसरी पार्टी 1500 या 2000 रुपये का वादा करती है। यह प्रतिस्पर्धा धीरे-धीरे अनियंत्रित होती जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि नीतियां ज़रूरत के आधार पर नहीं, बल्कि चुनाव जीतने की रणनीति के आधार पर बनाई जाती हैं। राजनीतिक दल जानते हैं कि एक बार कोई योजना लागू हो गई तो उसे बंद करना लगभग असंभव हो जाता है, क्योंकि इससे वोट बैंक प्रभावित होता है। इस तरह मुफ्त की रेवड़ियां एक स्थायी राजनीतिक दबाव बन जाते हैं, जो हर सरकार को मजबूर करते हैं कि वह इसे जारी रखे या और बढ़ाए। यह स्थिति आर्थिक अनुशासन के लिए सबसे बड़ा खतरा बनती जा रही है।
मुफ्तखोरी पर बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू इसका कानूनी और संवैधानिक पक्ष है। सुप्रीम कोर्ट ने यह माना है कि कल्याणकारी योजनाएं असंवैधानिक नहीं हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि चुनाव से पहले घोषित योजनाओं की सीमा क्या होनी चाहिए। क्या चुनावी वादे प्रलोभन की श्रेणी में आते हैं? क्या इनके लिए कोई वित्तीय सीमा तय होनी चाहिए? क्या सरकारों को यह बताना चाहिए कि इन योजनाओं के लिए पैसा कहां से आएगा? इन सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं होने के कारण राजनीतिक दलों को खुली छूट मिल जाती है। नतीजा यह है कि नीतिगत पारदर्शिता और जवाबदेही कमज़ोर होती जा रही है।
यह कहना भी गलत होगा कि रेवड़ी संस्कृति पूरी तरह नुकसानदेह है। भारत जैसे देश में जहां बड़ी आबादी अभी भी गरीबी और असमानता से जूझ रही है, वहां सामाजिक सुरक्षा योजनाएं ज़रूरी हैं। ऐसी योजनाओं को पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं है। योजनाओं को ज़रूरतमंद वर्ग तक ही सीमित किया जाना चाहिए। इसके अलावा एक स्वतंत्र संस्थान या वित्त आयोग जैसी व्यवस्था यह तय कर सकती है कि राज्यों के लिए मुफ्त की योजनाओं की सीमा क्या होनी चाहिए। इससे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को भी एक सीमा मिलेगी और आर्थिक अनुशासन भी बना रहेगा।
मुफ्तखोरी देश के सामने एक गम्भीर चुनौती बन गई है। यह एक तरफ  गरीबों को राहत और सशक्तिकरण का साधन है, तो दूसरी तरफ आर्थिक असंतुलन और कज़र् का कारण भी बन गई है। (अदिति)

#करज़ को बढ़ाती और विकास में बाधा बनती ‘रेवड़ियों की राजनीति’