ऊर्जा क्षेत्र में भारत की बड़ी उपलब्धि—पीएफबीआर

ईरान जंग की वजह से पूरी दुनिया में बेचौनी है। कच्चे तेल के दाम बढ़ने से हर तरफ महंगाई बढ़ रही है। भारत भी इस जंग के असर से अछूता नहीं है, लेकिन अब भारत ऊर्जा के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी घोषणा की है। अगर सब कुछ ठीक रहा तो इस उपलब्धि के दम पर भविष्य में भारत ऊर्जा के क्षेत्र में आत्म-निर्भर बन जाएगा। प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर) एक बेहद जटिल तकनीक है। पश्चिमी देश इस तकनीक को हासिल करने में नाकाम रहे हैं। इस तकनीक वाले न्यूक्लियर रिएक्टर में यूरेनियम की जगह थोरियम का इस्तेमाल किया जाता है और दुनिया के थोरियम भंडार का 25 फीसदी हिस्सा भारत में हैं। इस तकनीक की बदौलत परमाणु बिजली के क्षेत्र में भारत की यूरेनियम पर निर्भरता खत्म हो जाएगी। भारत में यूरेनियम भंडार बहुत नगण्य है। इसके लिए भारत को रूस और ऑस्ट्रेलिया पर निर्भर रहना पड़ता है।
जानकारी के अनुसार भारत ने फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर की कल्पना 70 साल पहले की थी। प्रसिद्ध वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा ने इस दिशा में काम शुरू किया था। तब से भारत इस तकनीक को हासिल करने में लगा था। दरअसल, दुनिया के सबसे अमीर छह देशों ने फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर तकनीक हासिल करने पर 50 बिलियन डॉलर (लगभग 4.25 लाख करोड़ रुपये) खर्च कर चुके हैं, लेकिन असफलता के कारण एक-एक करके सभी ने प्रोजेक्ट छोड़ दिए। इस तकनीक को विकसित करने के लिए अमरीका ने 15 बिलियन, जापान ने 12 बिलियन, ब्रिटेन ने 8 बिलियन, जर्मनी ने 6 बिलियन डॉलर खर्च कर दिए। फ्रांस और इटली भी भाग खड़े हुए। सबने कहा कि यह तकनीक हासिल करना बहुत मुश्किल और बहुत महंगा है, लेकिन भारत ने सिर्फ  90 करोड़ डॉलर (लगभग 7,700 करोड़ रुपये) में अपना पहला कमर्शियली वायबल प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर विकसित कर लिया। ऐसा करने वाला भारत रूस और चीन के बाद तीसरा देश है। वर्ष 2004 में यह प्रोजेक्ट शुरू हुआ प्रोजेक्ट था। शुरुआती बजट 42 करोड़ डॉलर का था। अब 22 साल बाद दर्जनों बार समय-सीमा खत्म होने और लागत दोगुनी होने के बाद भारत के हाथ सफलता लगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे नागरिक परमाणु के सफर में एक अहम कदम बताया है।
प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफ बीआर) एक बेहद उन्नत किस्म का न्यूक्लियर रिएक्टर है, जिसे भारत ने अपनी खास ज़रूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया है।  आम न्यूक्लियर रिएक्टर जहां यूरेनियम का उपयोग करके ऊर्जा पैदा करते हैं, वहीं पीएफबीआर यूरेनियम और प्लूटोनियम के साथ-साथ भविष्य के लिए नया ईंधन भी तैयार करता है, जिससे ईंधन की कमी का खतरा कम हो जाता है। भारत के लिए यह बहुत अहम है, क्योंकि हमारे पास यूरेनियम सीमित है लेकिन थोरियम का भंडार काफी ज्यादा है। रिपोर्ट के अनुसार भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम तीन चरणों में बनाया गया है, जिसे होमी जे. भाभा ने तैयार किया था। अभी जो प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ने क्रिटिकलिटी हासिल की है, वह दूसरे चरण की एक बड़ी उपलब्धि ज़रूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पूरी तरह तीसरे चरण में पहुंच गया है। असल में भारत अभी दूसरे और तीसरे चरण के बीच के संक्रमण दौर में है।
दूसरे चरण का मकसद फास्ट ब्रीडर रिएक्टर के जरिए प्लूटोनियम का इस्तेमाल करके ज्यादा ईंधन तैयार करना और आगे के लिए जरूरी सामग्री जुटाना है। पीएफबीआर का सफल होना दिखाता है कि यह तकनीक अब काम कर रही है, लेकिन पूरे देश में इस तरह के और रिएक्टर लगने और स्थिर रूप से चलने के बाद ही कहा जा सकता है कि दूसरा चरण पूरी तरह सफल हुआ है।
तीसरे चरण में भारत का फोकस थोरियम पर आधारित रिएक्टरों पर होगा। इसके लिए पहले पर्याप्त मात्रा में यू-233 जैसे ईंधन का उत्पादन ज़रूरी है, जो दूसरे चरण से ही मिलेगा। परमाणु ऊर्जा विभाग के अनुसार यह एक लंबी और चरणबद्ध प्रक्रिया है, जिसमें प्रतेक चरण अगले चरण के लिए आधार तैयार करता है। जानकारों के अनुसार यह रिएक्टर उसी दिशा में एक मजबूत कदम है, जिससे आगे चलकर थोरियम आधारित ऊर्जा को व्यापक स्तर पर इस्तेमाल किया जा सकेगा। तमिलनाडु के कलपक्कम में बना यह रिएक्टर पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से तैयार किया गया है। (अदिति)

#ऊर्जा क्षेत्र में भारत की बड़ी उपलब्धि—पीएफबीआर