परिसीमन को लेकर मनमानी नहीं कर पाएगी सरकार

महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर पहले लग रहा था कि विपक्ष के सामने दुविधा है और विपक्षी पार्टियां इसमें उलझ जाएंगी, लेकिन अब धीरे-धीरे विपक्ष ने अपना रुख स्पष्ट करना शुरू कर दिया है। असल में दुविधा इस बात को लेकर थी कि अगर केंद्र सरकार की ओर से लाए जा रहे संविधान संशोधन विधेयक का विरोध किया जाता है तो विपक्षी पार्टियों को महिला आरक्षण का विरोधी बताया जाएगा। यह खतरा अब भी है, लेकिन विपक्ष की ओर से अब यह बताने का प्रयास किया जा रहा है कि सभी पार्टियां महिला आरक्षण के पक्ष में हैं, लेकिन परिसीमन का समर्थन नहीं कर रही हैं। इसके लिए सैद्धांतिक रूप में पार्टियों का रुख तय किया जा रहा है और सर्वोच्च नेता इसे ज़ाहिर कर रहे हैं। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने 16 से 18 अप्रैल के तक संसद का सत्र बुलाया है। इसके लिए ही बजट सत्र का सत्रावसान नहीं किया गया। इस सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन को नारी शक्ति वंदन कानून से अलग करने का प्रस्ताव लाया जाएगा। विपक्ष महिला आरक्षण का विरोध नहीं करेगा, लेकिन परिसीमन का विरोध करेगा। सरकार चाहती है कि 2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन का काम हो जाए और लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ा कर 816 कर दी जाएं। इसमें से एक तिहाई यानी 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएं। इसके लिए संविधान में संशोधन का विधेयक लाना होगा और विशेष बहुमत यानी दो तिहाई बहुमत से पास कराना होगा। विपक्ष के सहयोग के बगर यह संभव नहीं लग रहा है।
पेमा खांडू के इस्तीफे का सवाल 
जब से भाजपा की कमान नरेंद्र मोदी और अमित शाह के हाथों में आई है तब से उसने यह सिद्धांत अपना लिया गया है कि अपने नेताओं पर चाहे कितने भी संगीन आरोप लगें, उनका इस्तीफा नहीं कराना है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक बार मीडिया के सामने कहा भी था कि भाजपा में इस्तीफे नहीं होते हैं। इसीलिए भाजपा के कई मुख्यमंत्रियों और केंद्रीय मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगने पर न तो उनसे इस्तीफा देने को कहा गया और न ही उन पर जांच बैठाई गई। इसलिए सवाल है कि अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू का इस्तीफा होगा या नही? उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का आरोप विपक्ष ने नहीं लगाया है, बल्कि उनकी सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि अरुणाचल प्रदेश सरकार की ओर से पिछले 11 साल में यानी 2015 के बाद से दिए गए सभी ठेकों की जांच की जाए। आरोप है कि अरुणाचल प्रदेश की भाजपा सरकार ने हज़ारों करोड़ रुपये के ज्यादातर ठेके मुख्यमंत्री पेमा खांडू के परिवार के लोगों को ही दिए हैं। पेमा खांडू 2016 से राज्य के मुख्यमंत्री हैं। कई ठेके तो उनकी पत्नी को मिले हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को दो हफ्ते में प्रारंभिक जांच शुरू करने और चार महीने में रिपोर्ट देने को कहा है। सवाल है कि जिसके खिलाफ आरोप है, अगर वह मुख्यमंत्री बना रहता है तो क्या स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हो सकेगी?
खाड़ी संकट से कांग्रेस को नुकसान
पश्चिम एशिया में 40 दिन तक चली जंग ने केरल में कांग्रेस पार्टी का नुकसान किया है। हालांकि ऐसा नहीं है कि इस नुकसान की वजह से चुनाव में कांग्रेस की हार तय हो गई है, लेकिन प्रचार समाप्त होने से पहले जो ओपिनियन पोल आए हैं, उनमें अगर कांटे की टक्कर दिखाई गई है या कांग्रेस को बहुत आराम से चुनाव जीतते नहीं दिखाया गया है। तो इसके कई कारणों में एक कारण पश्चिम एशिया में चली जंग भी है। इस जंग से कांग्रेस को बड़ा नुकसान इसलिए हो रहा है क्योंकि संकट के समय मतदाता मज़बूत नेता की ओर देखते हैं, जो कांग्रेस में नहीं दिख रहा है। दूसरी ओर सीपीएम की ओर से मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन का नेतृत्व स्पष्ट दिख रहा है। उन्हें बहुत मज़बूत नेता के तौर पर देखा जाता है। वह 10 साल से मुख्यमंत्री है और उनके पक्ष में सबसे बड़ी बात यह जाती है कि कोरोना महामारी के समय उनकी सरकार ने अन्य राज्यों के मुकाबले बहुत अच्छा प्रबंधन किया था। पश्चिम एशिया में जंग की वजह से भी जो संकट खड़ा हुआ है, उसमें केरल के लोग एक मज़बूत नेता की तौर पर उनकी ओर देख रहे हैं। गौरतलब है कि केरल के लगभग 35 लाख लोग खाड़ी देशों में रहते हैं।
गोगोई पर खामोश रहे हिमंत
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा कांग्रेस के निशाने पर रहे। चुनाव प्रचार बंद होने से दो दिन पहले कांग्रेस ने उनकी पन्नी रिंकी भुइयां सरमा के तीन पासपोर्ट का बम फोड़ा और साथ ही अमरीका के टैक्स हेवन राज्य वायोमिंग में 52 हजार करोड़ रुपए की कंपनी होने का दावा किया। कहा गया कि कंपनी में हिमंता और उनके बच्चे भी हिस्सेदार हैं। इसे लेकर बड़ा विवाद शुरू हुआ है और हिमंत बिस्वा सरमा और उनकी पत्नी ने कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रभारी पवन खेड़ा को कानूनी नोटिस भेजने का ऐलान किया। उनके घर पुलिस भी भेजी गई, लेकिन इस पूरे प्रकरण में यह बहुत दिलचस्प है कि हिमंता खुद गौरव गोगोई की पत्नी के पाकिस्तानी सम्पर्क का आरोप लगाते रहे हैं और अभी अचानक खामोश हो गए। उन्होंने कुछ समय पहले कहा था कि वह बड़े सबूत पेश करेंगे लेकिन अब मतदान खत्म होने तक उन्होंने कोई खुलासा नहीं किया और न कोई सबूत पेश किया। कहा जा रहा है कि यह भाजपा की रणनीति का हिस्सा है। बताया जा रहा है कि पार्टी को फीडबैक मिली थी कि गौरव गोगोई पर हमले का फायदा नहीं हो रहा था, उलटे नुकसान की आशंका थी। असम में 10 फीसदी आबादी अहोम जाति की है, जिसके प्रतिनिधि गौरव गोगोई हैं। उसका वोट उनके पक्ष में गोलबंद हो रहा था। इसी वजह से हिमंता ने चुप्पी साध ली।
मेज़बानी से क्यों हटा भारत?
यह बड़ा सवाल है और कूटनीति के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण से भी जुड़ा हुआ है कि आखिर भारत ने जलवायु परिवर्तन पर बने अंतर्राष्ट्रीय समूह कॉन्फ्रैंस ऑफ  पार्टीज़ यानी सीओपी के 33वें सम्मेलन की मेज़बानी से हटने का फैसला क्यों किया? यह सही है कि भारत ने आधिकारिक रूप से इसकी मेज़बानी का दावा नहीं किया था, लेकिन 2023 में दुबई सम्मेलन के दौरान खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रस्ताव दिया था कि भारत 2028 के सम्मेलन की मेज़बानी कर सकता है, लेकिन अब भारत ने मेज़बानी का प्रस्ताव वापस ले लिया है। सवाल है कि ऐसा क्यों किया गया? गौरतलब है कि भारत सरकार ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के तहत जलवायु परिवर्तन की एक अलग इकाई बना दी थी, जिसे 2028 के सम्मेलन की मेज़बानी की तैयारी करनी थी, लेकिन अब सरकार ने इससे अपने हाथ खींच लिए हैं। इसका कोई आधिकारिक कारण नहीं बताया गया है, लेकिन ऐसा लग रहा है कि भारत सरकार भी जलवायु परिवर्तन को लेकर उसी रास्ते पर चल रही है, जिस रास्ते पर डोनाल्ड ट्रम्प का अमरीका चल रहा है। कार्बन उत्सर्जन कम करने की अपनी प्रतिबद्धता के बावजूद ऐसा लग रहा है कि भारत किसी बंधन में नहीं बंधना चाहता है।

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