महिला की आज़ाद शख्सियत

भारत के सामाजिक और अन्य क्षेत्रों में महिला की भागीदारी सदियों से बनी रही है। हमारे महान ग्रंथों में महिला जाति का विशेष स्थान रहा है। लगातार उसकी चर्चा चलती रही है और वह पिछले समय में भी उच्च पदों पर विराजमान रही है, परन्तु इसके साथ-साथ महिला के साथ दुर्व्यवहार की गाथा भी चलती रही है। अक्सर उसे पुरुष प्रधान समाज में दुष्वारियों में से गुज़रना पड़ता रहा है। सदियों से महिला ऐसे पड़ावों से गुज़रती रही है, जिनमें बहुत कुछ शर्मनाक भी घटित होता रहा है। उसे एक तरह से गुलाम बन कर रखा जाता रहा है। उसकी आवाज़ भी दबाई जाती रही है, परन्तु प्रत्येक समय में उसकी सामाजिक भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।
देश की स्वतंत्रता के संघर्ष में महिला ने अपना पूरा योगदान डाला। उसकी कुर्बानियों की गाथा अलग है। आज़ादी की लड़ाई में अनेकों महिलाओं ने अपना योगदान डाला और उनमें से कुछ के नाम उभर कर सामने आये, जो सभी के लिए प्ररेणादायक सिद्ध होते रहे हैं। महिला को अपनी आज़ाद शख्सियत के लिए भारत में ही नहीं, विश्व भर के देशों में कड़ा संघर्ष करना पड़ा, परन्तु भारत की आज़ादी के बाद संविधान में महिला को पुरुष के समान दर्जा दिया गया। उसे उस समय वोट डालने का अधिकार मिला, जब ज्यादातर देशों में इस मामले पर बहस और कशमकश चल रही थी। नि:संदेह दशकों के स़फर दौरान भारतीय महिला ने प्रत्येक क्षेत्र में अपनी प्रतिभा भी दिखाई है और समूचे समाज के लिए वह उदाहरण भी बनी है। राजनीति के क्षेत्र में भी महिला ऊंचे से ऊंचे पद तक पहुंची है और उसके प्रभाव को माना भी जाता रहा है। पिछले कुछ वर्षों से संसद और प्रदेश की विधानसभाओं में महिला के आरक्षण की बात चलती रही है। इस संबंध में कानून भी पारित किया गया था, परन्तु इससे पहले वर्ष 1993 में पंचायत स्तर पर महिलाओं के लिए आरक्षण ज़रूरी किया गया था। इसी मांग को लेकर अब केन्द्र सरकार ने लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के आरक्षण पर मोहर लगाने की बात की है। इस संबंध में पहले पारित किए गए विधेयक को तकनीकी कारणों के दृष्टिगत पूरी तरह लागू नहीं किया जा सका था, परन्तु अब इसकी पूरी सम्भावनाएं उजागर हो गई हैं। सरकार की ओर से इस उद्देश्य के लिए तीन विधेयक लोकसभा में पेश किए गए हैं, जिन पर चर्चा भी आरम्भ हो गई है।
भारत अनेक जातियों-समुदायों और धर्मों का मिश्रण है। इस कारण इस संबंधी समाज में उठते रहे मामलों की कोई कमी नहीं रही, परन्तु ऐसा होते हुए भी महिला ने समय के व्यतीत होने के साथ अपना प्रभाव बढ़ाया है। इसके अधिकारों की रक्षा के लिए भी अब तक अनेक कानून बने हैं, जिन्होंने समाज की शक्ति को और भी बढ़ाया है। आज महिला प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ कर अपना योगदान डाल रही है। इसलिए आरक्षण का कानून लागू होने से वह समाज को आगे बढ़ाने और इसकी खुशहाली में अहम योगदान डालने में सहायक होगी और देश की विकास गाथा का एक अहम हिस्सा बनेगी, ऐसी उम्मीद की जानी स्वाभाविक है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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