विश्व विरासतों का संरक्षण सबकी ज़िम्मेदारी
आज के लिए विशेष
विश्व विरासत दिवस प्रत्येक वर्ष 18 अप्रैल को मनाया जाता है। इस वर्ष 2026 में यह दिवस संघर्ष और आपदाओं में विरासत संरक्षण थीम के साथ मनाया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को ने विरासत को अनमोल मानते हुए और लोगों से इन्हें सुरक्षित और सम्भाल कर रखने के उद्देश्य से ही इस दिवस को मनाने का निर्णय लिया था। विश्व विरासत के स्थल किसी भी राष्ट्र की सभ्यता और उसकी प्राचीन संस्कृति के महत्वपूर्ण परिचायक माने जाते हैं। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य यह है कि पूरे विश्व में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों के संरक्षण के प्रति जागरूकता लाई जा सके।
भारत की विरासत ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बिखरी पड़ी है जिन्हें संरक्षित सहेजना चुनौतीपूर्ण है। देश के ग्रामीण अंचलों में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक विरासतों की भरमार है। विरासतों की सार-संभाल के साथ इन्हें ग्रामीण पर्यटन से जोड़ दिया जाए तो ना केवल क्षेत्र का समुचित विकास हो सकेगा, वहीं इन विरासतों को नए मायने मिलने से बड़ा पर्यटन सर्किट विकसित हो सकता है। इससे क्षेत्र की कायापलट हो सकती है। इससे एक तरफ जहां हमारी अमूल्य विरासत संरक्षित होगी वहां दो हाथों को रोज़गार मिलेगा। प्रत्येक विरासत स्थल उस देश विशेष की संपत्ति होती है, जिस देश में वह स्थल स्थित हो। आने वाली पीढ़ियों के लिए और मानवता के हित के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का हित भी इसी में होता है कि वे इनका संरक्षण करें। इसके संरक्षण की ज़िम्मेदारी पूरे विश्व समुदाय की होती है।
विरासत के स्थल किसी भी राष्ट्र की सभ्यता और उसकी प्राचीन संस्कृति के महत्वपूर्ण परिचायक माने जाते हैं। बीता हुआ कल काफी महत्वपूर्ण होता है। बीता हुआ समय वापस नहीं आताए किंतु अतीत के पन्नों को हमारी विरासत के तौर पर कहीं पुस्तकों तो कहीं इमारतों के रूप में संजो कर रखा गया है। हमारे पूर्वजों ने निशानी के तौर पर तमाम तरह के मंदिर मकबरे, मस्जिदें, किले, कुएं, बावड़ी और अन्य चीज़ों का सहारा लिया, जिनसे हम उन्हें आने वाले समय में याद रख सकें। लेकिन वक्त की मार के आगे कई बार उनकी यादों को बहुत नुकसान पहुंचा। किताबों, इमारतों और अन्य किसी रूप में सहेज कर रखी गई यादों को पहले स्वयं हमने भी नज़रअंदाज़ किया, जिसका परिणाम यह हुआ कि हमारी अनमोल विरासत हमसे दूर होती गई और उनका अस्तित्व भी संकट में पड़ गया।
वर्तमान में दुनियाभर में कुल 1248 विश्व धरोहर स्थल हैं। इनमें से 972 सांस्कृतिक, 235 प्राकृतिक और 41 मिश्रित स्थल है। चीन, इटली, स्पेन, जर्मनी और भारत दुनिया भर के कुछ शीर्ष देश हैं, जिनकी विश्व स्तर की विरासत की अच्छी गिनती है। भारत में कुल 3691 ऐसे स्मारक और स्थल हैं, जिसमें से यूनेस्को ने भारत में कुल 44 विश्व धरोहरों की घोषणा की है। इनमें 7 प्राकृतिक, 36 सांस्कृतिक और एक मिश्रित हैं। यूनेस्को की अस्थायी सूची में भारत के 70 धरोहर स्थल शामिल हैं।
भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों का ज़िक्र करें तो ऐसे बहुत से स्थानों का नाम महत्वपूर्ण है, लेकिन ताजमहल और मुगलकालीन शिल्प की दास्तां बयान करने वाले दिल्ली के लाल किला ने इस सूची को भारत की ओर से और भी खूबसूरत बना दिया है। ताजमहल को एक विश्वव्यापी मतसंग्रह के दौरान दुनिया के सात अजूबों में अव्वल नम्बर कर रखा गया था। विश्व धरोहर सूची में शामिल भारत की अजंता की गुफाएं 200 साल पूर्व की कहानी कहती नज़र आती हैं लेकिन इतिहास के पन्नों में धीरे-धीरे ये भुला दी गईं और बाद में बाघों का शिकार करने वाली एक ब्रिटिश टीम ने इनकी फिर खोज की।
विश्व धरोहर सूची में शामिल एलोरा की गुफाएं दुनिया भर को भारत की हिन्दू, बौद्ध और जैन संस्कृति की कहानी बताती हैं। ये गुफाएं लोगों को 600 और 1000 ईस्वी के बीच के इतिहास से रूबरू कराती हैं। भारत को विश्व धरोहर सूची में 14 नवम्बर 1977 में स्थान मिला। तब से अब तक 44 भारतीय स्थलों को विश्व धरोहर स्थल के रूप में घोषित किया जा चुका है। भारत में सर्वप्रथम एलोरा की गुफाएं (महाराष्ट्र) को विश्व विरासत स्थल घोषित किया था।
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