थोरियम का भंडार होने के बावजूद ऊर्जा क्षेत्र में भारत बहुत पीछे

पूरी दुनिया आज ऊर्जा संकट का सामना कर रही है। कोयला, गैस, तेल जैसे संसाधन महंगे हो रहे हैं। जलवायु परिवर्तन की मुसीबत अलग है। मध्य-पूर्व के युद्ध ने बड़े-बड़े देशों को घुटनों पर ला दिया है। ऐसे में भारत में उपलब्ध थोरियम नामक तत्व पर चर्चा होना शुभ संकेत है। इसके साथ ही ज़रूरी हो जाता है यह सोचना कि हम इसका उपयोग करने में पिछड़ कैसे गए?
राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव 
प्रकृति की हमारे देश पर असीम अनुकंपा है। निर्मल जल स्रोत, उपजाऊ ज़मीन और हरे भरे वन प्रदेश हैं। इसके साथ ही हमारे अनेक समुद्री तट रेत के रूप में उपलब्ध थोरियम के संसार के सबसे बड़े भंडार से युक्त हैं। यह ऐसा तत्व है जो सदियों तक मुफ्त बिजली दे सकता है। हमारी तेल आयात पर निर्भरता बहुत कम हो सकती है। यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि पहले प्रधानमंत्री नेहरू के नेतृत्व में डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा ने हमारी ऊर्जा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए चरणबद्ध तरीके से इस अनमोल और विशाल खज़ाने के इस्तेमाल के लिए तीन चरणों में एक ऐसी योजना बनाई थी जो भारत को ऊर्जा क्षेत्र में अग्रणी बना देती। यदि एक दुर्घटना में उनका निधन न हुआ होता और नेहरू जीवित रहते तो यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि भारत एक शक्तिशाली देश बन चुका होता। उनके बाद यह महत्वाकांक्षी योजना ठंडे बस्ते में चली गई जिसका कारण राजनीतिक नेतृत्व में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव प्रमुख था। 
थोरियम की खोज की भी बड़ी दिलचस्प कहानी है। सन् 1828-29 में स्वीडिश रसायनज्ञ जोंस जैकब बर्जेलियस और नॉर्वे के खनिज वैज्ञानिक मोर्टेन थ्राने एस्मार्क ने लोवोया द्वीप पर घूमते हुए एक काला खनिज (थोराइट)पाया। बर्जेलियस ने उसका विश्लेषण किया और एक नया तत्व सामने आया। उन्होंने इसे थोर (नॉर्स देवता, बिजली और तूफान के देवता) के नाम पर थोरियम नाम दिया। 1898 में जर्मन वैज्ञानिक गेरहार्ड कार्ल श्मिट और मैरी क्यूरी ने स्वतंत्र रूप से थोरियम के रेडियोएक्टिव गुण की खोज की और पाया कि यह यूरेनियम के बाद दूसरा रेडियो एक्टिव तत्व है। शुरू में थोरियम का इस्तेमाल गैस लैंप के मैन्टल, वेल्डिंग और कुछ मिश्र धातुओं में होता था। 
भारत के पास इसका सबसे बड़ा लगभग 8.46 लाख टन (मोनाजाइट रेत से) का भंडार है। भारतीय वैज्ञानिकों के अनुसार 500 गीगावाट बिजली 400 साल तक लगातार पैदा हो सकती हैं। मतलब, भारत की कुल बिजली ज़रूरत से कई गुना ज्यादा, और वो भी सदियों तक। दुनिया भर में थोरियम इतना है कि अगर सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो हज़ारों साल तक ऊर्जा की कमी नहीं रहेगी। एक किलो थोरियम से जितनी बिजली बनती है, उतनी 2000 टन कोयले या लाखों लीटर तेल से भी नहीं बन पाती। इसी बात को ध्यान में रखते हुए डॉ. होमी भाभा ने 1950 के दशक में ही तीन-चरणीय कार्यक्रम बनाया था—पहले चरण में यूरेनियम, दूसरे में ब्रीडर रिएक्टर (जो ज्यादा ईंधन बनाता है) और तीसरे में थोरियम।
वैज्ञानिक अनुसंधान को राजनीतिक चश्मे से देखने वाले नेताओं के कारण सन् 2004 में ही इसकी शुरुआत हो सको और 22 वर्ष बाद अप्रैल 2026 में कल्पाक्कम का प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर क्रिटिकलिटी हासिल कर सका। इसे दूसरा चरण शुरू करने की ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया गया है। यह काम असल में अब से पचास साल पहले हो जाना चाहिए था और अगर ऐसा हुआ होता तो अब हम तीसरे चरण की और बढ़ रहे होते। 
दुनिया के बहुत-से देश जिनके पास बहुत कम थोरियम भंडार है, वे हमसे बहुत आगे निकल गए, विशेषकर चीन और अमरीका, जो अब ऊर्जा महाशक्ति बनने जा रहे हैं। यदि भारत ने गति नहीं पकड़ी तो थोरियम का विशाल भंडार होने के बावजूद हम पिछड़ जाएंगे। चीन ने 2023 में दुनिया का पहला थोरियम मोल्टन सॉल्ट रिएक्टर चालू किया और 2024-25 में थोरियम को यूरेनियम में बदलने का सफल प्रयोग किया। चीन का दावा है कि वह जहाज़ों को 10 साल तक एक बार चार्ज पर चला सकता है। अन्य देश जैसे अमरीका, डेनमार्क भी इस पर काम कर रहे हैं, लेकिन भारत और चीन ही मुख्य खिलाड़ी हैं। 
यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें थोरियम पारम्परिक ईंधन की जगह लेकर हमारी तेल निर्भरता को बहुत कम कर सकता है। लेकिन यदि हमारा रवैया ढीला रहा अर्थात इसमें निवेश को प्राथमिकता नहीं दी गई और निजी क्षेत्र को बड़े पैमाने पर इसमें शामिल कर उसके सामने स्पष्ट लक्ष्य नहीं रखा गया तो अगले 25-30 साल में भी हम ऊर्जा में आत्मनिर्भर नहीं हो सकेंगे। बिजली उत्पादन में कोयला और गैस की जगह थोरियम आसानी से ले सकता है। यह निरंतर बिजली देता है, जबकि सोलर-विंड मौसम पर निर्भर हैं। तेल मुख्यत: परिवहन और पेट्रोकेमिकल्स के लिए इस्तेमाल होता है। थोरियम बिजली से इलेक्ट्रिक वाहन, हाइड्रोजन और सिंथेटिक ईंधन बनाए जा सकते हैं। 
भारत का ऊर्जा उत्पादन तेल के 85 प्रतिशत आयात पर निर्भर है। थोरियम से बिजली उत्पादन हालांकि बहुत महंगा है अर्थात् 15 से 18 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट, लेकिन यही एक ऐसा विकल्प है जो हमारी ऊर्जा सुरक्षा मज़बूत कर सकता हैं और मध्य-पूर्व या रूस पर हमारी निर्भरता कम कर सकता है। 
आज जब देश ऊर्जा संकट और जलवायु परिवर्तन से जूझ रहा है, लेकिन सही योजना बना कर प्रकृति का यह खज़ाना हमारा भविष्य संवार सकता है। भारत के पास यूरेनियम कम (दुनिया का मात्र 1.2 प्रतिशत) लेकिन थोरियम बहुत ज्यादा (दुनिया के कुल भंडार का करीब 25 प्रतिशत) है। डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने ठीक इसी तथ्य को भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता का आधार बनाया। सीमित यूरेनियम का कुशल उपयोग करके विशाल थोरियम भंडार खोलने का काम किया ताकि भारत सदियों तक ऊर्जा संकट से मुक्त रहे। 
थोरियम रिएक्टर सिर्फ  बिजली के स्रोत नहीं, बल्कि ऊर्जा हब हैं। इनसे बिजली, हाइड्रोजन, समुद्र से मीठा पानी और औद्योगिक गर्मी एक साथ मिल सकती है, जिससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा, जल सुरक्षा और औद्योगिक विकास में क्रांति आ सकती है। यह सोलर-विंड जैसी नवीकरणीय ऊर्जा को पूरक बनाकर 24×7 भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भर बना सकता है, लेकिन इसका इस्तेमाल करने की गति बहुत धीमी है। तकनीकी जटिलताओं और निवेश की चुनौतियों पर काबू पा लिया गया तो 2040-50 तक भारत थोरियम ऊर्जा में विश्व नेता बन सकता है। अन्यथा चीन और अमरीकी स्टार्टअप्स हमसे काफी आगे निकल जाएंगे।

#थोरियम का भंडार होने के बावजूद ऊर्जा क्षेत्र में भारत बहुत पीछे