'कभी सोचा नहीं था ज़िंदा वापस लौट पाऊंगा' मिसाइल हमलों के बीच कुवैत से लौटे शख्स ने सुनाई आपबीती
तमिलनाडु, 7 मई: रामनाथपुरम ज़िले के मुदुकुलथुर के पास स्थित अनिकुरुंथन गांव के एक निवासी हाल ही में खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच कुवैत से लौटे जो अपने परिवार का गुज़ारा करने के लिए रोज़ाना मज़दूरी वाला पक्का काम ढूंढने के लिए स्ट्रगल कर रहा है।
कालिदास नाम का शख्स पिछले चार सालों से कुवैत और सऊदी अरब के स्पोर्ट्स स्टेडियमों में कार पार्क अटेंडेंट के तौर पर काम कर रहा था। उन्होंने बताया कि विदेश में रहते हुए वह अपने परिवार का गुज़ारा करने लायक अच्छी-खासी कमाई कर लेता था लेकिन, खाड़ी क्षेत्र में मिसाइल हमले और लोगों के हताहत होने की खबरों की वजह से कई भारतीय मज़दूरों को बचाव प्रयासों के तहत वहां से निकालकर भारत वापस लाया गया।
कालिदास भी उन लोगों में शामिल था जिन्हें वापस लाया गया। वह कुवैत से हवाई जहाज़ से मुंबई आए और फिर चेन्नई होते हुए ट्रेन से अपने गांव वापस पहुंचा। अपनी आपबीती सुनाते हुए कालिदास ने बताया कि वापस लौटने के बाद उसके पास कोई सैलरी नहीं बची थी, फिलहाल वह अपने पास बचे थोड़े-बहुत पैसों से ही घर का रोज़ाना खर्च चला रहा है। वह बताते हैं, "4 साल तक संघर्ष करने के बावजूद, मैं शांति से काम कर रहा था। जब से युद्ध शुरू हुआ है, कई तरह की पाबंदियां लग गई हैं। पूरी रात बमों की आवाज़ें आती रहती हैं, यह डर लगा रहता है कि कहीं कोई बम हम पर ही न गिर जाए, और इस बात की कोई उम्मीद नहीं रहती कि हम ज़िंदा घर लौट पाएंगे। हमने उनसे मिन्नतें की कि किसी भी तरह हमें हमारे देश वापस भेज दें। उन्होंने हमें हवाई जहाज़ से भारत भेज दिया। हम मुंबई पहुंचे। हमारे हाथों में जो थोड़े-बहुत पैसे थे, उन्हीं से हम अपने गांव वापस लौटे। मुझे इस बात की बहुत चिंता थी कि क्या मैं ज़िंदा वापस लौट पाऊंगा, क्या मैं अपने परिवार से मिल पाऊंगा। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं ज़िंदा वापस लौट पाऊंगा। यह किसी सपने जैसा लगता है।"
उन्होंने सरकार का आभार जताया जिन्होंने वहां फंसे लोगों को निकालने में मदद की। कालिदास ने बताया कि वापस लौटने के बाद से उन्हें पक्का काम ढूंढने में काफी मुश्किल हो रही है। फिलहाल वह रोज़ाना मिलने वाली मज़दूरी पर ही घर का खर्च चला रहे हैं क्योंकि उनके गांव में काम के मौके बहुत कम है।

