प्रयास की ताकत

रमेश इस वर्ष दसवीं में आ गया था। और हमेशा की तरह उसकी नकारात्मक सोच उसको उल्टा-सीधा सोचने पर विवश कर रही थी। जैसे कि वह इस वर्ष अच्छे अंक कैसे ला पायेगा? इस वर्ष की पढ़ाई तो बहुत ही मुश्किल है। सारे विषय उफ! मम्मी कितने कठिन हैं। अगर इस वर्ष अच्छे अंक नहीं आ पाए तो उसे स्पेस इंजीनियरिंग में दाखिला कैसे मिल पायेगा? यूँ तो रमेश पढ़ाई में बहुत अच्छा था, मगर उसकी नकारात्मक सोच उसे जल्दी ही परेशान कर देती और वह हौंसला हार जाता। रमेश के माता-पिता भी उसकी इस नकारात्मक सोचने की आदत से बड़े ही परेशान थे। क्योंकि रमेश के पिता एक मामूली क्लर्क थे और रमेश उनका इकलौता पुत्र होने के कारण उनकी एकमात्र उम्मीद कि वह एक दिन जग में उनका नाम रोशन करेगा जो वह ना कर सके वह उनका पुत्र कर दिखायेगा। मगर जब पिताजी रमेश को ही बात-बात पर हिम्मत हारते देखते तो उनकी भी रमेश से लगायी उम्मीदें टूटकर बिखरने लगतीं।
रमेश ने दसवीं कक्षा को मन ही मन हौवा बना लिया था। अत: वह जितना भी पाठ याद करता घबराहट में दूसरे ही पल सब भूल जाता। एक दिन उसने अखबार में एक विज्ञापन देखा, जिसमें लिखा था कि इस रस को पीने से दिमाग तेज होता है और पाठ एक ही बार में याद भी हो जाता है। बस फिर क्या था रमेश पिताजी के पीछे ही पड़ गया वह रस खरीदकर देने को। यह रस महंगा था मगर रमेश कि जिद मान उसका मन रखने के लिए पिताजी ने उसे यह रस दिलवा दिया। सात दिन की इस दावा की कीमत 400 रुपये थी और पिताजी की मासिक आय मात्र 7000 इस प्रकार पिताजी की आय का एक बड़ा हिस्सा इस दवा पर खर्च होने लगा जिससे पिताजी तनाव में रहने लगे, उधर रमेश के अन्दर कुछ आत्मविश्वास आने लगा और इसे वह दवा का असर समझता था। रमेश ने स्कूल की फुटबॉल टीम में अपना नाम लिखवा लिया था और अपने एक अमीर मित्र को एनर्जी ड्रिंक पीते देख वह भी पिताजी से उस ड्रिंक को लाने की जिद करने लगा। रमेश की इन महंगी महंगी फरमाइशों से घर का बजट बिगड़ने लगा था। पिताजी रमेश को इन कृत्रिम दवाओं के दुष्प्रभाव और आत्मविश्वास की ताकत को समझाने का मौका तलाशने लगे। एक दिन इतबार को पिताजी ने रमेश को सुबह की सैर पर साथ चलने को कहा। थोड़ी ना-नकुर के बाद रमेश पिताजी के साथ चलने को तैयार हो गया। पार्क में चलते हुए उसने ने देखा कि एक नन्हां सा चिड़िया का बच्चा अपने नन्हे-नन्हे पंखों से उड़ने का प्रयास कर रहा था। पिताजी ने उससे कहा-‘तुमने देखा रमेश यह नन्हा सा चिड़िया का बच्चा कितनी मेहनत और लगन से उड़ने का प्रयास कर रहा है।’ 
रमेश-मगर पिताजी यह उड़ कहां पा रहा है? थोडा सा उड़ता है फिर वापस डाल पर बैठ जाता है और वापस उड़ने की कोशिश करता है, काश इन पक्षियों के लिए भी कोई एनर्जी ड्रिंक बना होता? 
‘कोशिश अर्थात् प्रयास कर रहा है। बेटा रमेश निरंतर प्रयास से ही व्यक्ति अपनी मंजिल को प्राप्त कर सकता है, कृत्रिम उपाय या प्रार्थनाएं तो सिर्फ मन को तसल्ली देने के लिए होती हैं। हमें हमारे लक्ष्य तक तो हमारा परिश्रम एवं प्रयास ही पहुंचाता है।’  ‘मगर पिताजी कृत्रिम उपाय भी तो ज़रूरी होते हैं आपने देखा ना दवा से पहले में कुछ भी याद नहीं कर पाता था। जब से उसे इस्तेमाल किया मुझे सब याद हो जाता है और कैल्शियम पाउडर पीने की वजह से ही तो फुटबॉल टीम में मुझे जगह दी गयी है।’ 
‘मेरे नादान बच्चे, इन दवाइयों से ना तुम्हारी याददाश्त बढ़ी है ना ही हड्डियां मजबूत हुई हैं। हुआ यह है कि तुम इन्हें इस्तेमाल करने की वजह से अपनी सफलता के लिए आश्वस्त हो गए हो यानि की सकारात्मक सोचने लगे हो। अच्छा यह बताओ क्या तुम्हारे स्थान पर दवाई पढ़ाई करती है?’ 
‘नहीं मैं खुद करता हूँ।’
‘पुटबॉल में किक तुम लगते हो या कैल्शियम पाउडर?’
‘क्या मजाक करते हैं पिताजी मैं ही तो लगाता हूँ।’
‘जब सारी मेहनत और प्रयास तुम ही करते हो फिर इन दवाइयों की क्या ज़रूरत? बस तुम अपनी सोच सकारात्मक रखो और प्रयास करते रहो। सफलता खुद एक दिन तुम्हारे कदम चूमेगी।’ तभी फुर्र की आवाज आई और रमेश ने देखा कि नन्हीं चिड़िया दूर आसमान में उड़ रही थी आखिर उसका परिश्रम और प्रयास रंग लाया। 
रमेश खुशी से चीख पड़ा ‘तुम्हारा प्रयास सफल हुआ नन्हीं चिड़िया मुझे भी प्रयास की ताकत समझाने के लिए धन्यवाद।’ (सुमन सागर)

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