शिकार को पानी की धार से शूट करने वाली धनुर्धारी मछली
धनुर्धारी मछली विशेष प्रकार से भोजन करने वाली और हवा में अपना शिकार ढूंढ़ने वाली एक अद्भुत मछली है। यह अपनी विलक्षण विशेषताओं के लिए संपूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है। धनुर्धारी मछली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पानी की सतह पर आकर पानी के किनारे के वृक्षों पर बैठे हुए कीड़े-मकोड़ों को अपने मुंह से, पानी की तेज धार छोड़कर नीचे गिरा देती है और उन्हें अपना आहार बना लेती है। इसी गुण के कारण इसे धनुर्धारी मछली कहते हैं। अंग्रेजी में इसे आर्कर फिश कहते हैं। धनुर्धारी मछली भारत के उत्तरी-पूर्वी क्षेत्रों से लेकर पूर्वी भागों तक में बहुतायत से पायी जाती है। भारत के साथ ही दक्षिण-पूर्वी एशिया के अन्य देशों- इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया के कुछ भागों तथा फिलीपींस के सागर तटों पर भी यह देखने को मिलती है। धनुर्धारी मछली उष्ण कटिबंधीय देशों के दलदली भागों में पानी के पास उगने वाले वृक्षों के निकट तथा खारे पानी की जलधाराओं में रहना अधिक पसंद करती है, किन्तु यह सागरों, महासागरों एवं ताजे पानी की नदियों में भी बहुत बड़ी संख्या में पायी जाती है।
धनुर्धारी मछली की पांच प्रजातियां पायी जाती हैं, जिनके आकार और रंग में थोड़ा-बहुत अंतर होता है। इसकी लंबाई 8 सेंटीमीटर से लेकर 2 सेंटीमीटर तक होती है किन्तु कभी-कभी 30 सेंटीमीटर तक की धनुर्धारी मछली भी देखने को मिल जाती है। इसके शरीर का रंग पीलापन लिए हुए हल्का मटमैला सा होता है और इस पर तीन से चार तक गहरे रंग के पट्टे होते हैं। धनुर्धारी मछली का समागम और प्रजनन सामान्य मछलियों की तरह होता है। प्रजनन काल में मादा धनुर्धारी मछली प्राय: मूंगे की चट्टानों वाले क्षेत्रों में अंडे देती है, जो कई दिनों तक पानी में तैरते रहते हैं। इन अंडों से बच्चे निकलने के बाद ये खारे पानी या मीठे पानी में वापस आ जाते हैं। वयस्क धनुर्धारी मछलियों के समान नवजात बच्चों की पीठ पर गहरे रंग के तीन या चार पट्टे होते हैं। इसके साथ ही इनकी पीठ पर पट्टों के मध्य चमकीले, पीले रंग के धब्बे होते हैं, जिनसे हरे रंग का प्रकाश सा निकलता है। जीव वैज्ञानिकों का मत है कि इसी प्रकाश के द्वारा ही ये मटमैले पानी अथवा दलदल में एक-दूसरे की उपस्थिति का पता लगा लेते हैं। एक-दूसरे के निकट आ जाते हैं।
जीव वैज्ञानिकों के अनुसार धनुर्धारी मछली के मुंह की विशेष संरचना इसे पानी में तेज धार छोड़ने में सहयोग करती है। पानी के किनारे के पौधों पर बैठे हुए कीड़े-मकोड़ों का शिकार करते समय यह पानी की सतह पर आ जाती है। इस समय इसका थूथुन पानी से बाहर निकला रहता है तथा आंखें पानी के भीतर डूबी रहती हैं। धनुर्धारी मछली अपने शिकार को पानी की धार से शूट करने के लिए सर्वप्रथम अपने गलफड़ों में पानी भरती है। इसके बाद इनके आवरण को दबाती है, जिससे पूरा पानी मुंह में आ जाता है। अब यह अपनी जीभ को ऊपर की ओर ले जाती है, जिससे तालू के ऊपर का खाली स्थान परख नली के समान बन जाता है और इससे जो धार बाहर निकलती है, उसकी गति बढ़ जाती है। इस कार्य में इसका नुकीला थूथुन विशेष सहयोग करता है।
धनुर्धारी मछली जिस समय पौधों की पत्तियों अथवा शाखाओं पर बैठे हुए कीड़े-मकोड़ों को पानी की धार से शूट करती है। उस समय उसकी आंखें पानी के नीचे रहती हैं अत: यह शिकार की दूरी किस प्रकार नापती है तथा उसका निशाना किस तरह लगाती है? ये प्रश्न एक लंबे समय तक रहस्य बने रहे। जीव वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में यह पाया कि धनुर्धारी मछली पौधों पर बैठे कीड़े-मकोड़ों का शिकार करते समय सीधी तैरती हुई अपने शिकार के बिल्कुल नीचे आ जाती है और अपने शिकार को झटका देकर बिल्कुल नीचे खड़ी हो जाती है। इस स्थिति में आने से प्रकाश के नियम का प्रभाव शून्य हो जाता है। अब यह शिकार का निशाना लगाकर पानी की धार छोड़ती है। यह निशाना प्राय: कभी नहीं चूकता। किंतु कभी-कभी धनुर्धारी मछली का निशाना चूक भी जाता है।
धनुर्धारी मछली की शारीरिक संरचना भी इसे पौधों पर बैठे हुए कीड़े-मकोड़ों की खोज करने एवं उन्हें शूट करने में सहयोग देती है। धनुर्धारी मछली की आंखें अन्य मछलियों की तुलना में बड़ी होती हैं तथा कुछ आगे की तरफ होती हैं। इनकी संरचना इस प्रकार की होती है कि ये दूरबीन की तरह कार्य करती हैं, जिससे धनुर्धारी मछली अपने शिकार को सरलता से देख लेती है एवं उसकी दूरी मालूम कर लेती है। इसी तरह धनुर्धारी मछली के मुंह, जीभ और गलफड़ों की बनावट तथा पानी की धार छोड़ने वाले अंगों की संरचना एवं उनका मैकेनिज्म भी इसे शिकार को शूट करने में इसे सहयोग करता है। धनुर्धारी मछली एक रोचक मछली है। इसे सरलता से पालतू बनाया जा सकता है और एक्वेरियम में रखा जा सकता है। शूटिंग करने अर्थात निशाना लगाकर पानी की तेज धार फेंकने की क्षमता होने के कारण, यह जहां भी होती है, वहां के लोगों का आकर्षण का केन्द्र बन जाती है। जीव वैज्ञानिकों का मत है कि धनुर्धारी मछली को भी थोड़ा बहुत प्रशिक्षण देकर डॉलफिन के समान मनोरंजक बनाया जा सकता है।
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