धमकियां देने से बाज नहीं आ रहा खस्ताहाल पाकिस्तान

हाल के महीनों में पाकिस्तान के कुछ नेताओं और सैन्य अधिकारियों की ओर से सिंधु जल, सैन्य शक्ति और भारत के खिलाफ बार-बार तीखे बयान सामने आये हैं। ऐसे बयान स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा करते हैं कि आखिर पाकिस्तान किस गलतफहमी में भारत के साथ इन दिनों इस तेज़ाबी जुबान से बात करने की हिम्मत कर रहा है। क्या इसका कारण अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ईरान मसले पर उसे दिया गया गैर-ज़रूरी भाव उससे संभाले नहीं संभल रहा? इन सवालों का जवाब सिर्फ  भावनाओं से नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी तलाशना होगा। सबसे पहले आइये यह समझते हैं कि आखिर पाकिस्तान को ऐसी क्या गलतफहमी हो गई है कि वह इन दिनों भारत के प्रति उकसाने वाली जुबान बोलने लगा है?
जब हम भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य संघर्षों की बात करते हैं तो यह जानते हैं कि केवल इन घटनाओं के परिणाम ही महत्वपूर्ण या निर्णायक नहीं होते बल्कि इनके पीछे का वृत्तांत भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और पाकिस्तान दोनों ने ही अपने-अपने सैन्य तरीके से सफलता का दावा किया। पाकिस्तान का तो सिर्फ  खोखला दावा ही था, लेकिन भारत के दावे को तो पूरी दुनिया ने देखा है कि किस तरह पाकिस्तान के कई महत्वपूर्ण सैन्य अड्डे ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ध्वस्त हो गये थे।  आखिर क्या बात है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद से पाकिस्तान किसी भी स्तर पर बैकफुट पर आने की जगह उल्टे हावी होने की कोशिश कर रहा है? क्या इसकी वजह हाल के दिनों में दुनिया के कूटनीतिक मंच पर उसे मिला वह अप्रत्याशित श्रेय तो नहीं है, जिसके तहत वह अमरीका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते में बिचौलिया था। 
यह अलग बात है कि ट्रम्प की वजह से पाकिस्तान मध्यस्थ तो था ही। हालांकि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कई बार यह दावा कर चुके हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उन्होंने ही हस्तक्षेप करके युद्ध रुकवाया था, लेकिन भारत न केवल एक बार भी ट्रम्प के बयान का समर्थन नहीं किया, बल्कि बार-बार भारत ने विश्व मंच में खुले रूप से कहा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम का मसला द्विपक्षीय था और पाकिस्तान के अनुरोध पर यह फैसला लिया गया था। सवाल है इन सब बातों को दरकिनार करते हुए आखिरकार पाकिस्तान भारत के खिलाफ उकसाने वाली बयानबाज़ी क्यों कर रहा है? 
 पाकिस्तान में व्याप्त राजनीतिक अस्थिरता, आतंकवाद की चुनौती, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा की सुरक्षा समस्या और आर्थिक निर्भरता उसके सामने बड़ी चुनौतियां हैं। ऐसे समय में भारत के खिलाफ  कठोर भाषा का इस्तेमाल दरअसल वह अपने घरेलू दर्शकों को यह संदेश देने का माध्यम भी बनता है कि ‘सेना और सरकार कमज़ोर नहीं हैं’। 
भारत अभी भी सिंधु जल संधि को लेकर अपने निर्णय पर अडिग है कि सिंधु जल समझौता नहीं होगा। सिंधु जल संधि का मामला पाकिस्तान में केवल एक जल सुरक्षा की चिंता नहीं है। यह पाकिस्तान की कृषि और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा का भी बड़ा मसला है। इसलिए जल संबंधी मुद्दों पर पाकिस्तान की भाषा रह-रहकर सामान्य से अधिक और भावनात्मक तथा आक्रामक हो जाती है। यह दुनिया ही नहीं पाकिस्तान भी जानता है कि वह हवा-हवाई बातें चाहे जितनी कर ले, लेकिन वह भारत को आंख दिखाने की हैसियत में नहीं है। तो क्या पाकिस्तान को अमरीका से कोई आश्वासन मिला है, जिसके कारण वह अचानक इस कदर चौड़ा होने लगा है? तो सवाल है कि फिर भारत के विरुद्ध पाकिस्तान की इस कठोर भाषा को बल कहां से मिल रहा है? कहीं न कहीं लगता है कि यह पाकिस्तान का मनोवैज्ञानिक पैंतरा है। क्योंकि आज के संघर्ष में केवल मिसाइलें या लड़ाकू विमान ही नहीं लड़ते, मीडिया, सोशल मीडिया, प्रैस कॉन्फ्रैंस भी युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं। पाकिस्तान इसी मंच को उपयोग करते हुए अपने घरेलू समस्याओं से अपने नागरिकों का ध्यान हटाने के लिए भारत को धमकाने की कोशिश कर रहा है। 
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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