विपक्षी दलों ने फिर प्रकट किया चुनाव आयोग पर अविश्वास

देश के 23 विपक्षी राजनीतिक दलों ने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग पर पक्षपात ढंग से काम करने के गम्भीर लगाए हैं। पत्र में यह भी लिखा गया है कि देश में लोकतंत्र और संविधान की रक्षा करना न्यायपालिका की बड़ी ज़िम्मेदारी है। न्यायपालिका को यह सुनिश्चित बनाना चाहिए कि चुनाव न केवल स्वतंत्र और निष्पक्ष हों, अपितु इस ढंग से होते हुए भी नज़र आएं। इस पत्र में विपक्षी दलों के नेताओं ने देश में चल रहे मतदाता सूचियों के  विशेष गहन संशोधन पर भी सवाल उठाए हैं। बिहार और पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के हुए विशेष गहन संशोधन में गम्भीर त्रुटियां रहने के आरोप लगाते हुए विपक्षी दलों के नेताओं ने कहा है कि चुनाव के बिलुकल नज़दीक आकर किसी भी प्रदेश में जल्दबाजी में ऐसी प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए, अपितु चुनावों के उपरांत ऐसी प्रक्रिया होनी चाहिए और इस क्रियान्वयन को पारदर्शी ढंग से सफल बनाया जाना चाहिए। उन्होंने इस समय बिहार और पश्चिम बंगाल के बाद अन्य प्रदेशों में चल रही प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय को फिर से बैलेट पेपर द्वारा चुनाव करवाने पर विचार करने के लिए भी कहा है। ‘इंडिया’ गठबंधन में शामिल उपरोक्त पार्टियों के नेताओं द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखने संबंधी फैसला नई दिल्ली में 8 जून को हुई अपनी बैठक में लिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखने वाले सांसद कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डी.एम.के., आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, शिव सेना (उद्धव ठाकरे), नैशनल कांग्रेस पार्टी और वामपंथी पार्टियों से संबंधित हैं।
विगत लम्बी अवधि से विपक्षी दल चुनाव आयोग पर यह गम्भीर आरोप लगाते रहे हैं, कि उसकी ओर से चुनाव पक्षपात ढंग से करवाए जा रहे हैं और इस ढंग से चुनाव आयोग केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा को लाभ पहुंचाने के लिए यत्नशील रहता है। बिहार और पश्चिम बंगाल के बाद देश के अन्य प्रदेशों में मतदाता सूचियों के चल रहे विशेष गहन संशोधन संबंधी भी विपक्षी राजनीतिक दलों की यह ज़ोरदार धारणा है, कि विपक्षी दलों को मतदान करने वाले लोगों और विशेष रूप से एक अल्पसंख्यक वर्ग को निशाना बना कर वोट काटे जा रहे हैं। विपक्षी दलों के अनुसार यह लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर बड़ा हमला है। इस संबंध में विपक्षी दलों ने पहले भी सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया था, परन्तु उस समय भी विपक्षी दल महसूस करते रहे हैं कि उन्हें न्याय नहीं मिला। इसके परिणाम स्वरूप बिहार और पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग मतदाता सूचियों के गहन संशोधन मामले में मनमानी करने में सफल रहा। निष्पक्ष पत्रकारों की रिपोर्टों के अनुसार भी बिहार और पश्चिम बंगाल की मतदाता सूचियों के गहन संशोधन के बाद भी उनमें अनेक तरह की त्रुटियां हैं और ज्यादातर सभी पात्र मतदाता भी दोनों प्रदेशों में अपने मताधिकार का उपयोग करने से वंचित रह गए थे। विपक्षी दलों के सांसदों द्वारा संसद में भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध महाभियोग चला कर उन्हें पद से हटाने के लिए मार्च मास में राज्यसभा के चेयरपर्सन और लोकसभा स्पीकर को अपने हस्ताक्षर करके नोटिस भेजा गया था, परन्तु क्रमिक रूप से राज्यसभा के चेयरमैन और लोकसभा के स्पीकर द्वारा विपक्ष के इस नोटिस को रद्द कर दिया गया था। इसके उपरांत पुन: विपक्षी दलों से संबंधित राज्यसभा के सांसदों द्वारा ऐसा नोटिस दिया गया है, जिस संबंध में अभी राज्यसभा के चेयरपर्सन की ओर से कोई फैसला नहीं लिया गया।
इस संबंध में हमारी यह राय है कि चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से काम करना चाहिए। सभी दलों के नेताओं द्वारा की जाती शिकायतों का न केवल उसे तर्क-संगत ढंग से समाधान करना चाहिए, अपितु इस संबंध में उनकी ओर से लिखे गए पत्रों के जवाब भी देने चाहिएं। विपक्षी दलों में यह प्रभाव नहीं जाना चाहिए कि चुनाव आयोग सिर्फ केन्द्र में सत्तारूढ़ पार्टी के लिए ही काम कर रहा है। उसे विपक्षी दलों की कोई चिंता नहीं है। चुनावों को स्वतंत्र और निष्पक्ष करवाना चुनाव आयोग की मुख्य ज़िम्मेदारी है। मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन के संबंध में उन्हें यह सुनिश्चित बनाना चाहिए कि कोई भी पात्र मतदाता, मतदाता सूची बाहर न रहे और न ही मतदाता सूचियों में जाली और दोहरे मतदाताओं की भरमार हो। उन्हें चुनाव आयोग की वैबसाइट पर पढ़ने योग्य और डाऊनलोड करने योग्य मतदाता सूचियों की डिजीटल सूची उपलब्ध करवानी चाहिए। भिन्न-भिन्न प्रदेशों में विधानसभा के चुनावों के समय कुछ दलों द्वारा अन्य प्रदेशों के मतदाता लाकर भुगताने के उभर रहे रुझान को भी सख्ती से नकेल डालनी चाहिए। 
विपक्षी दलों द्वारा ई.वी.एम. द्वारा हो रहे चुनावों पर भी गम्भीर सवाल उठाए जा रहे हैं, विशेष रूप से मतदान और विपक्षी दलों के एजेंटों को फार्म 17-सी देने के बाद हुए मतदान की प्रतिशतता में व्यापक स्तर पर चुनाव आयोग की ओर से जो बढ़ौत्तरी दिखाई जाती है, उस पर विपक्षी दलों को विशेष रूप से आपत्ति है। वे  इसे मतदान में हेरा-फेरी के तौर पर देखते हैं। मतदान होने के बाद मतगणना की प्रक्रिया संबंधी भी वे गम्भीर सवाल उठाते रहे हैं। इन सभी त्रुटियों को चुनाव आयोग द्वारा दूर किया जाना बनता है। यदि चुनाव आयोग ऐसा करने में विफल रहता है, तो सर्वोच्च न्यायालय को प्रभावशाली ढंग से हस्तक्षेप करके चुनाव आयोग को निष्पक्षता से काम करने के लिए प्रतिबद्ध किया जाना चाहिए, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय कानून के शासन और संविधान का संरक्षक है। हम उम्मीद करते हैं कि विपक्षी दलों की इन शिकायतों को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बनता महत्त्व दिया जाएगा। 

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