सब बराबर हैं
गांव के चौपाल में एक दिन बहस छिड़ी। रमई काका बोले, ‘दुनिया में अमीर हो या गरीब-भगवान की नज़र में सब बराबर हैं। वह सबको एक दृष्टि से देखता है।’
‘मैं नहीं मानता’, गनेसी ने प्रतिवाद किया।
जागेसर ने भी गनेसी का पक्ष लेकर कहा, ‘अगर भगवान की नज़र सब पर एक जैसी है तो कोई अमीर और कोई गरीब होता ही क्यों? वह सबको एक जैसा बनाता।’
इस विषय पर देर तक बहस चली। वाद-विवाद होता रहा। कुछ लोग रमई काका की तरफदारी करते तो कुछ गनेसी की बात सही जान पड़ती। अपने-अपने ढंग से सब तर्क भी देते रहे। मगर कोई ऐसा हल नहीं निकला जिस पर सब एक मत हो।
आखिर में रमई काका ने कहा, ‘कल से गांव के बाहर मेला लगने वाला है। हमलोग कल वहां चलेंगे। हो सकता है, वहां हमारे सवाल का सही जवाब मिल जाए।’
मेला में कहा जवाब मिलेगा, क्या जवाब मिलेगा, यह बात किसी की समझ में नहीं आयी। फिर भी चौपाल में मौजूद सबने एक स्वर से कहा, ‘अच्छी बात है। कल हम लोग मेला देखने ज़रुर जाएंगे। सब एक साथ चलेंगे। उचित जवाब मिल जाएगा तो खूब खुशी होगी।’
अगले दिन दोपहर में सब एक साथ गांव से मेला देखने निकल पड़े। तीन किलोमीटर की दूरी पर मेला लगा था। एक घंटा में सब मेला स्थल पर आ पहुंचे। मेला में खूब घूमे-फिरे। आखिर में रमई काका सबको लेकर एक कुम्हार की दुकान के करीब आ धमके। फिर कुम्हार द्वारा बनायी, दुकान में सजी एक ही साइज की ढेर सारी मूर्तियों को देखने लगे। थोड़ी देर बाद रमई काका ने कुम्हार से पूछा, ‘इन मूर्तियों की क्या कीमत है?’
‘प्रत्येक मूर्ति की कीमत एक सौ रुपया है, चाहे जो आप लें।’
‘मतलब कि सबकी कीमत बराबर है। समान है।’
‘जी हां!’
‘गजब की बात है, यह राजा की मूर्ति भी एक सौ रुपया में और यह भिखारी भी एक सौ रुपया का है।’ रमई काका बोले।
‘बिल्कुल’, दुकानदार ने हामी भरी।
‘यह हाथी भी एक सौ रुपया का है और यह बिल्ली भी उतनी ही कीमत की है।’ इस बार गनेसी बोला।
‘हां भई, हां!’ दुकानदार फिर बोला।
अब रमई काका ने दो सौ रुपए देकर एक हाथी और एक बिल्ली की मूर्तियां खरीद लीं। गनेसी ने भी दो सौ रुपये देकर एक राजा और एक भिखारी की मूर्तियां खरीदीं। फिर वे आगे बढ़े। अब वे एक जगह आकर हरी और कोमल घास पर बैठ गए। थोड़ी देर बाद रमई काका सबसे बोले, ‘जिस तरह एक कुम्हार की नज़र में उसके द्वारा बनायी हर मूर्ति समान है, चाहे वह राजा की हो या भिखारी की। हाथी या बिल्ली की। उसी तरह भगवान की नज़र में सभी जीव एक सा दया भाव वह सब पर रखता है। है न ?’
‘बिल्कुल’, वहां मौजूद कुछ को रमई काका की बात अब समझ में आ गयी।
‘यही सोचो, कुम्हार ने सबको समान समझा, तभी तो सब तरह की मूर्तियों की समान कीमत रखी। मूर्तियां ज़रुर कई तरह की बनायीं हैं, मगर सबका मूल्य, सबकी कीमत एक रखी है। अब तुम कह सकते हो कि जब सब मूर्तियां उसकी नज़र में एक सी हैं तो सबको एक जैसा क्यों नहीं बनाया, अलग-अलग क्यों?’ रमई काका ने अपनी बात जारी रखी, ‘अगर सारी मूर्तियां एक ही तरह की होती तो मूर्तिकार की कला कौशल और प्रतिभा का निखार दिखाई नहीं देता। ऐसे में भगवान तो सबसे उच्च कोटि के कलाकार हैं। उसकी कला कृति की खासियत विविधता में एकता प्रस्तुत करना है। है न?’
‘एकदम सही कहा।’ इस बार सबने हामी भरी।
‘और हां, विविधता ज़रुरी भी है।’ रमई काका फिर बोले।
‘मतलब?’ गनेसी उत्सुक हुआ।
‘यों समझो, हमारे हाथ की पांचों अंगुलियों की लंबाई यदि समान हो जाए तो क्या होगा, हमारी सुविधा बढ़ेगी या कठिनाई?’
‘कठिनाई!’ सबने एक स्वर से कहा।
‘इसीलिए भगवान जो कुछ करते हैं, खूब सोच-विचार कर करते हैं। उनमें मीन-मेख निकालना, हमारी अल्पज्ञता है, अज्ञानता है और कुछ नहीं।
‘हां, अब सबने एक साथ रमई काका की बात को स्वीकार कर लिया। (सुमन सागर)



