आखिर क्यों बढ़ रहे चीनी के दाम ?
देश में चीनी की कीमतों में इन दिनों काफी बढ़ोत्तरी देखने को मिल रही है और चीनी के प्रति किलो के दाम लगभग 70 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गये हैं। चीनी की कीमतों में अचानक हुई बढ़ोतरी चिंता का विषय ज़रूर है, लेकिन फिलहाल स्थिति बहुत गंभीर नहीं है। त्योहारी सीजन को देखते हुए सरकार ने 31 अक्तूबर तक 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। इससे बाज़ार में चीनी की उपलब्धता बढ़ेगी और कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। अच्छी बात यह भी है कि सरकार ने जमाखोरी और कालाबाजारी रोकने के लिए भंडारण सीमा भी सख्त की है।
यहां पर यह सवाल ज़रूर उठता है कि जब देश में चीनी की कमी नहीं है, तो कीमतें इतनी तेज़ी से क्यों बढ़ रही हैं। इसके पीछे गन्ने के उत्पादन में कमी, गन्ने का अधिक हिस्सा एथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होना या गन्ने की खेती का पर्याप्त विस्तार न होना जैसे कारण हो सकते हैं। वास्तव में देश में चीनी उत्पादन में कमी, खराब मौसम और कम बारिश, त्योहारी सीजन में मांग बढ़ना, भंडार में कमी और जमाखोरी की आशंका, वैश्विक बाज़ार में आपूर्ति का दबाव तथा गन्ने से एथेनॉल बनाने की नीति को भी चीनी कीमतों की चर्चा में प्रमुखता मिली है, जिसके कारण चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। हालांकि केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि मौजूदा कीमत वृद्धि का मुख्य कारण एथेनॉल के लिए चीनी का डायवर्जन नहीं है।
पाठक जानते होंगे कि हमारे देश में गाड़ियों में एथेनॉल का इस्तेमाल मुख्यत: पेट्रोल में मिलाकर किया जा रहा है। इसे एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (ईबीपी) कहा जाता है। हमारे देश में स्थिति की बात करें तो ई-20 पेट्रोल यानी 20 प्रतिशत एथेनॉल तथा 80 प्रतिशत पेट्रोल अब भारत में पेट्रोल का प्रमुख मानक मिश्रण है। जानकारी के अनुसार वर्ष 2025-26 में औसत एथेनॉल मिश्रण लगभग 20 प्रतिशत तक पहुंच गया है। अप्रैल 2026 से बीएस-6 वाहनों के लिए ई-20 उत्सर्जन मानकों को पूरा करना अनिवार्य किया गया है। वास्तव में एथेनॉल मिश्रण का उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना, विदेशी मुद्रा बचाना, किसानों के लिए अतिरिक्त बाज़ार उपलब्ध कराना और कार्बन उत्सर्जन घटाना है। सरकार के अनुसार ईबीपी कार्यक्रम से अब तक लगभग 1ण्97 लाख करोड़ रुपये की विदेशी की मुद्रा बचत हुई है। संक्षेप में कहें तो हमारे देश भारत पेट्रोल वाहनों को धीरे-धीरे एथेनॉल आधारित ईंधन की ओर ले जा रहा है। आज की स्थिति में ई-20 सामान्य पेट्रोल व्यवस्था का हिस्सा है। ऐसे में कृषि और पेट्रोलियम मंत्रालय को मिलकर इन पहलुओं की समीक्षा ज़रूर करनी चाहिए। एथेनॉल की बढ़ती मांग को देखते हुए गन्ने का उत्पादन भी बढ़ाना जरूरी है, ताकि चीनी और एथेनॉल दोनों की ज़रूरत पूरी हो सके और किसानों को भी बेहतर लाभ मिले।
भारत दुनिया के प्रमुख चीनी उत्पादक देशों में शामिल है। 2025-26 चीनी सत्र में भारत का चीनी उत्पादन लगभग 306 लाख टन रहने का अनुमान है, जो शुरुआती अनुमान से करीब 11 प्रतिशत कम है। उत्पादन में कमी का असर घरेलू बाज़ार में चीनी की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ा है। इस बीच एथेनॉल उत्पादन के लिए भी गन्ने से प्राप्त चीनी का एक हिस्सा इस्तेमाल किया जाता है।उक्त संदर्भ में यहां पर यह भी उल्लेखनीय है कि देश में गेहूं, चावल, सब्ज़ी, फल और दूध जैसे कई खाद्य पदार्थों के उत्पादन में आत्म-निर्भरता बढ़ी है, लेकिन दाल और खाद्य तेल के मामले में अभी भी आयात पर निर्भरता है। दालों की बढ़ती मांग और खाद्य तेल की लगभग आधी ज़रूरत ही देश में पूरी होना चिंता का विषय है। इसलिए सरकार को केवल मौजूदा महंगाई नियंत्रित करने पर ही नहीं, बल्कि इन आवश्यक खाद्य पदार्थों का उत्पादन बढ़ाने पर भी ध्यान देना चाहिए। जमाखोरी और कालाबाज़ारी पर कड़ी नज़र के साथ अफवाहों को रोकना भी जरूरी है, क्योंकि कई बार अफवाहों के कारण भी बाज़ार में अनावश्यक महंगाई बढ़ जाती है। साथ ही लोगों को भी ज़रूरत के मुताबिक ही खरीदारी और खपत करनी चाहिए। इस संबंध में चीनी के विकल्प को भी तलाश किया जाना चाहिए। (एजैंसी)

