वंदे मातरम् पर विवाद
आज राजनीतिक रूप से देश भर में भाजपा की तूती बोलती है। उसकी बढ़त का स़फर जारी है। दूसरी तरफ राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस अब कुछ राज्यों तक ही सिमट कर रह गई है। कर्नाटक, केरलम, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में ही उसकी सरकारें हैं। बहुमत में होने के कारण राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेतृत्व में भाजपा अपने पहले से निर्धारित एजेंडे को तेज़ी से आगे बढ़ाने में जुटी दिखाई देती है। इसी एजेंडे की एक शृंखला वंदे मातरम् गीत पर उसके द्वारा पैदा किए विवाद को देखा जा सकता है। विगत दिवस कांग्रेस वर्किंग कमेटी की नई दिल्ली में हुई बैठक में पार्टी ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि पार्टी अपने समारोहों में वंदे मातरम् के दो अंतरे ही गाएगी। इस संदर्भ में कमेटी ने वर्ष 1937 की कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक का ज़िक्र करते हुए कहा कि इसमें फैसला लिया गया था कि पार्टी के कार्यक्रमों में इस गीत के दो अंतरे ही गाए जाएंगे। पार्टी नेता के.सी. वेणूगोपाल ने यह भी कहा कि वंदे मातरम् कांग्रेस के लिए भावनात्मक मुद्दा है, जबकि भाजपा के लिए यह राजनीतिक मुद्दा है।
दूसरी तरफ केन्द्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने कांग्रेस के इस फैसले की आलोचना करते हुए इसे असंवैधानिक और निंदनीय कहा है। इसी स्वर में केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के इस फैसले को देश विरोधी और कानून का उल्लंघन तथा तुष्टिकरण की राजनीति करने वाला कहा है। उन्होंने इसे भारत माता का अपमान करार देते हुए कहा कि कांग्रेस का फैसला उन हज़ारों शहीदों का अपमान है, जिन्होंने देश के लिए अपनी जान कुर्बान की। आज भाजपा स्वयं को सबसे बड़ी देश भक्त और राष्ट्रीय हितों को समर्पित पार्टी कहती है और कांग्रेस की इस मुद्दे पर आलोचना कर रही है। जहां तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा की पहली शाखाओं का संबंध है, उन्होंने देश की आज़ादी के लिए कितनी कुर्बानियां दी थीं, इसकी सभी को जानकारी है। दूसरी तरफ कांग्रेस का देश की आज़ादी के लिए क्या योगदान रहा है, वह बात भी किसी से छुपी नहीं है, परन्तु आज की स्थिति यह है कि जिस पार्टी की पहली शाखाओं ने देश की आज़ादी के संघर्ष में कमतर हिस्सा डाला है, वही स्वयं को सच्ची देश भक्त और कांग्रेस को देश भक्ति से विहीन बता रही है।
जहां तक वंदे मातरम् गीत का संबंध है, इसे वर्ष 1950 में भारतीय गणराज्य के स्थापित होने पर राष्ट्रीय गीत घोषित किया गया था। यह गीत बंगाली भाषा में बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1870वें दशक में लिखा था। 1882 में यह गीत चटर्जी के नावल आनंद मट्ठ का एक हिस्सा बना था। मातृ भूमि को नमस्कार करने से शुरू होते इस गीत को इंडियन नैशनल कांग्रेस ने 1905 में अपनाया था, जिसने बाद में भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में अपना अहम योगदान डाला था। इसके पहले दो अंतरे अपनी मातृ भूमि को नमन करने वाले हैं, जिनमें कोई धार्मिक भावना उजागर नहीं होती, बाद के 4 अंतरों में हिन्दू देवियों दुर्गा और लक्ष्मी की प्रशंसा की गई है। स्वतंत्रता के दौरान कांग्रेस द्वारा यह गीत अपनाए जाने के बाद उन समुदायों द्वारा इस पर एतराज़ जताया गया, जो हिन्दू नहीं थे और सिर्फ एक परमात्मा को मानने में विश्वास रखते थे। इनमें भारी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग थे। वर्ष 1937 में कांग्रेस द्वारा वंदे मातरम् के पहले दो अंतरों को राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता दी गई। इसके लिए प्रमुख शख्सियतों की एक समिति बनाई गई थी, जिसमें मौलाना आज़ाद, जवाहर लाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, अचार्या देवा और रविन्द्रनाथ टैगोर आदि शामिल थे। इस समिति ने सभी समुदायों की भावनाओं का ध्यान रखते हुए राष्ट्रीय संघर्ष में इस गीत के पहले दो अंतरों को गाने पर सहमति बनाई थी। उसी समय से ही राष्ट्रीय लहरों में इस गीत के दो अंतरे गाने की परम्परा बनी रही है, जिसे 24 जनवरी, 1950 को संवैधानिक असैम्बली द्वारा भी अपनाया गया था। इस गीत के साथ राष्ट्रीय गान (जन-गण-मन) गाया जाता रहा है, परन्तु मई, 2026 में अपने एजेंडे की पूर्ति के लिए 6 अंतरों के इस पूरे गीत को गाये जाने संबंधी भाजपा सरकार द्वारा कानून बनाया गया, जिस पर पहरा देने के लिए आज भाजपा पूरी तरह उत्सुक हुई दिखाई देती है।
यह बात हमारी समझ से बाहर है कि यदि 90 वर्ष पहले उस समय की उत्तम शख्सियतों द्वारा इस गीत के दो अंतरो को गाने की सहमति बनाई गई थी, तो भाजपा ने अब यह टकराव वाला नया पैंतरा क्यों लिया? वरिष्ठ भाजपा नेता इसे कांग्रेस की तुष्टिकरण वाली नीति कहते हैं परन्तु हम समझते हैं कि भाजपा द्वारा इस गीत पर की जा रही राजनीति समाज में और भी दरार डालने में ही सहायक होगी, चाहे इससे भाजपा राजनीतिक लाभ लेना चाहती है। आज हमारा देश और समाज जिस पड़ाव पर आ खड़ा हुआ है, वहां दरार डालने के स्थान पर भाईचारक साझ को और भी मज़बूत करने की ज़रूरत है। इसी में भारत की बड़ी शक्ति मानी जाती रही है, भारत के लोगों ने धर्म के नाम पर बनाए देशों की भावना को पूरी तरह रद्द करके धर्म-निरपेक्ष मार्ग पर लोकतांत्रिक राष्ट्र का निर्माण किया था। इस भाइचारे और साझ के दीपक का जलते रहना बहुत ज़रूरी है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

