करियर को लेकर विद्यार्थियों पर दबाव न बनाया जाए

सरकार तय करती है कि क्या पढ़ाया जाएगा और किन परीक्षाओं के ज़रिए उसे परखा जाएगा, माता-पिता तय करते हैं कि उस पढ़ाई का अंत किस मुकाम पर होना चाहिए और विद्यार्थी वह व्यक्ति है जिसे इन दोनों के फैसलों के बीच अपनी पूरी जीवन व्यतीत करना होता है। यह व्यवस्था उस मशीन की तरह है जिस पर कन्वेयर बेल्ट चलती है। एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक जाने के अतिरिक्त कुछ नहीं। ऐसे समझिए, स्कूल से एक धारा निकलती है, प्रवेश परीक्षा तक पहुंचती है और किसी ‘सम्मानजनक’ डिग्री तक ले जाती है। उसमें से निकलती है नौकरी या एंटरप्रेन्योरशिप ताकि उसका ज़िक्र रिश्तेदार शादी-ब्याह, घरवाले पारिवारिक समारोहों और नेताजी सार्वजनिक मंचों से दिए भाषणों में गर्व से कर सकें। यह ऐसी कसरत या दौड़ है जिसमें युवाओं की जिज्ञासा, योग्यता और स्वभाव चुपचाप पीछे छूट जाते हैं और विडंबना यह कि अगले 40-50 या अधिक साल समाज के बनाये ढर्रे में बीत जाते हैं और जीवन खत्म हो जाता है।
प्रश्न यह है कि फैसला किसका होना चाहिए—विद्यार्थी का, माता-पिता का या शिक्षक का? इसका उत्तर किसी नारे या एक लाइन में नहीं दिया जा सकता। शिक्षक सैकड़ों घंटों तक किसी बच्चे को सोचते, सवाल करते और अपनी बात रखते हुए देखता है जिसे माता-पिता नहीं देख पाते। वे अक्सर घर पर बच्चे को थका हुआ, परेशान, बेचैन और एक अनजान भय से डरा हुआ देखते हैं। बच्चा भी सीख चुका होता है कि घर में अपने मन की उथल-पुथल के कौन-से हिस्से को दिखाना है और चाहे वह जवानी की दहलीज़ पर कदम रख चुका हो, मन की बात नहीं कर पाता। इसके विपरीत शिक्षक उस बच्चे की प्रतिभा समझते हुए भी कुछ प्रकट नहीं होने देता। होता यह है कि जो बच्चा कक्षा में वाद-विवाद या बहस के दौरान वाहवाही लूटता है, परीक्षा के नाम पर घबरा जाता है।
मतलब यह कि शिक्षक ही विद्यार्थी को प्रशिक्षित करता है कि उसे कैसे परीक्षा देनी है। मगर शिक्षक पर ही सारी ज़िम्मेदारी डाल दी गई तो यह अन्याय होगा शिक्षक आमतौर पर विद्यार्थी को एक विषय, एक कक्षा और एक शैक्षणिक वर्ष के दायरे में जानता है। वह पूरे व्यक्ति को नहीं जानता, न उसके परिवार की आर्थिक स्थिति को, न उसके घर के माहौल को और न यह कि घंटी बजने के बाद वह बच्चा वास्तव में क्या करता है। भारत की पचास से सौ सवा सौ विद्यार्थियों वाली कक्षा में तो इतना समय ही नहीं होता कि वह हर विद्यार्थी को गहराई से समझ सके।
शिक्षक की सलाह पर कोई बच्चा किसी विशेष विषय को चुनता है और कुछ वर्षों बाद उसे अपने पैरों पर खड़ा होने में मुश्किल आती है तो भविष्य की चिंता शिक्षक नहीं, बल्कि परिवार करता है। फिर वास्तव में कौन फैसला कर रहा है। एक करियर-गाइडेंस सर्वेक्षण में 60 प्रतिशत ने कहा कि उनके करियर के फैसले को माता-पिता ने प्रभावित किया, शेष लोगों को ऐसे व्यक्ति से सलाह मिली जिसे उस क्षेत्र का वास्तविक अनुभव था। एक चौंकाने वाला तथ्य यह कि 14 से 21 वर्ष की उम्र के 93 प्रतिशत भारतीय विद्यार्थी केवल सात करियर विकल्पों से परिचित हैं, जबकि आज 250 से अधिक मान्यता प्राप्त करियर के रास्ते मौजूद हैं। यह केवल कुछ नया और अलग करने की चाह रखने वाले किशोरों की कहानी नहीं है। यह उन दरवाज़ों की कहानी है, जिनके बारे में उन्हें कभी बताया ही नहीं गया। अक्सर माता-पिता भी अपने बच्चों के सामने उन्हीं क्षेत्रों को रखते हैं जिन्हें वे स्वयं जानते हैं। उम्र बढ़ने के साथ निर्णय का फैसला विद्यार्थी के हाथ में होना चाहिए।
तुलना करना ज़रूरी है : भारत की तुलना विदेशों की शिक्षा व्यवस्था से करना यह समझने का एक तरीका है कि अलग-अलग शिक्षा प्रणालियां विद्यार्थियों को निर्णय लेने की कितनी आज़ादी देती हैं। अमरीका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और पश्चिमी यूरोप के कई हिस्सों में शिक्षा की संरचना ही इस तरह बनाई गई है कि विद्यार्थी अपने फैसले स्वयं करता है। कई विदेशी विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी बिना किसी निश्चित विषय को घोषित किए कॉलेज में प्रवेश ले सकते हैं। वे एक-दो साल अलग-अलग विभागों को समझने के बाद अपना मुख्य विषय चुन सकते हैं। डिग्री के दौरान दो-तीन बार विषय बदलना असामान्य नहीं माना जाता। 
करियर के फैसले भारत में परिवार के फैसले बन जाते हैं, खासकर संयुक्त परिवारों में। कई परिवारों ने किसी एक परीक्षा की तैयारी के लिए वर्षों की कमाई को कोचिंग में लगा दिया होता है। फिर वही पैसा बच्चे पर एक तरह का अदृश्य दबाव बन जाता है कि ‘इतना खर्च कर दिया है, अब यही करना पड़ेगा।’ इसमें बच्चे की वास्तविक रुचि या योग्यता का कोई हिसाब नहीं होता। सिर्फ  इतना मायने रखता है कि अब तक कितना पैसा और समय लगाया जा चुका है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार भारत में 2023 में विद्यार्थियों की आत्महत्या  के 13,892 मामले दर्ज किए गए, जो पिछले दशक की तुलना में 65 प्रतिशत अधिक थे। 2024 में विद्यार्थियों की आत्महत्या की संख्या बढ़कर 14,488 हो गई। इसलिए संकट वास्तविक है और बढ़ रहा है, लेकिन उसकी जड़ें सिर्फ  विषय या करियर के गलत चुनाव में नहीं हैं। यह परिवार, मानसिक दबाव, सामाजिक अपेक्षाओं और भावनात्मक रिश्तों की एक बड़ी तस्वीर का हिस्सा है। परिवार बच्चे के  फैसले को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ना बंद करें।
समाधान क्या है : आज काम की दुनिया इतनी तेज़ी से बदल रही है कि 16 वर्ष की उम्र में किया गया करियर का फैसला विद्यार्थी के स्नातक होने तक उसी रूप में मौजूद ही न रहे! ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (ए.आई.) काम के पूरे-पूरे क्षेत्रों को बदल रहे हैं। ऐसे समय में बहुत कम उम्र में किसी एक क्षेत्र में खुद को पूरी तरह बांध देना खतरनाक हो सकता है। इसलिए छात्र, माता-पिता और शिक्षक—इन तीनों में से किसी एक को भी इस निर्णय पर एकतरफा अधिकार नहीं मिलना चाहिए और सबसे ज़रूरी समाज को यह स्वीकार करना होगा कि करियर बदलना असफलता नहीं है। जब जीवन विद्यार्थी का है तो आखिरी फैसला भी उसी का होना चाहिए। 

#करियर को लेकर विद्यार्थियों पर दबाव न बनाया जाए