वंदे मातरम् विवाद के पीछे की ह़क़ीकत और फसाना
राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के 150 साल पूरे होने के अवसर पर 2026 के नये सरकारी प्रोटोकॉल के अनुसार गृह मंत्रालय द्वारा जारी नए दिशा-निर्देशों के तहत सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगान से पहले वंदे मातरम् बजाना और सभी के लिए सम्मान में खड़ा होना अनिवार्य कर दिया गया है। साथ ही औपचारिक अवसरों पर इसके सभी छह छंदों को गाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। विपक्ष सहित कुछ अन्य संगठन इस अनिवार्य प्रोटोकॉल को संविधान के अनुच्छेद 25 अर्थात व्यक्तिगत और धार्मिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बताते हैं। बहरहाल इन सबके बावजूद वंदे मातरम् को संसद में और स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर पर प्रधानमंत्री की मौजूदगी में लाल किले पर गाया गया। बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा 1875 में मूल रूप से बांग्ला और संस्कृत भाषा में लिखे इस गीत के शब्द काफी कठिन हैं। 6 छंदों पर आधारित यह गीत काफी लम्बा भी है। चूंकि आमतौर पर केवल इसके पहले दो छंदों को ही आधिकारिक तौर पर गाया जाता रहा है, इसलिए देश के अधिकांश राजनेताओं और आम नागरिकों को भी इसके बाद के 4 छंद कंठस्थ याद नहीं होते हैं लेकिन भाजपा के मामले में यह विवाद इसलिए भी बड़ा हो जाता है क्योंकि वह अन्य दलों पर राष्ट्रगीत के अपमान का तो आरोप लगाती है, जबकि खुद उसके अपने नेता इसे सही ढंग से प्रस्तुत करने में चूक जाते हैं।
समय-समय पर भाजपा के नेताओं की इस गीत को लेकर अज्ञानता कैमरे पर भी उजागर हुई है। एक टेलीविज़न लाइव डिबेट के दौरान, जब भाजपा के एक प्रवक्ता दूसरों को वंदे मातरम् गाने की चुनौती दे रहे थे तो एंकर ने उनसे स्वयं इसे गाने को कह दिया। वह अपने मोबाइल फोन में देखने के बावजूद गीत की गलत पंक्तियां गाने लगे और धुन भी पूरी तरह भूल गए। इसी तरह उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार के एक पूर्व मंत्री से जब पत्रकारों ने ‘वंदे मातरम्’ की कुछ पंक्तियां सुनाने को कहा, तो वह बेहद असहज हो गए। उन्होंने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उन्हें इस समय पूरा याद नहीं है। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जयपुर में भाजपा के मुख्य स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान, मंच पर राष्ट्रगीत गाते समय गलत धुन और गलत वर्जन बज गया। कांग्रेस द्वारा इस बड़ी चूक पर हमला किए जाने के बाद राजस्थान भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी। कोटा, मेरठ और ग्वालियर जैसे कई शहरों में भाजपा के स्थानीय विधायकों और सांसदों के ऐसे अनेक वीडियो सामने आ चुके हैं, जहां वे वंदे मातरम् और राष्ट्रगान (जन गण मन) के बीच अंतर करने में भ्रमित हो गये या गीत की पंक्तियों को आपस में मिला दिया गया। हाल ही में गुज़रे संसद के मॉनसून सत्र के दौरान जब ‘वंदे मातरम्’ को लेकर नया कानून और राष्ट्रगीत विवाद गरमाया, तो विपक्ष ने भाजपा को घेरते हुए कहा कि जिन्होंने ‘वंदे मातरम्’ को लेकर कड़े कानून बनाये हैं, हकीकत यह है कि उनके अपने नेताओं और मंत्रियों को भी यह गीत पूरा याद नहीं है।
उधर मुस्लिम समुदाय के भीतर इस गीत को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण और विचार हैं। हालांकि समग्र मुस्लिम समाज ‘वंदे मातरम्’ गायन का विरोध नहीं करता है परन्तु समाज के कुछ लोग या कुछ धार्मिक संगठन इसके पूरे पाठ या कुछ विशिष्ट छंदों का विरोध करते हैं जबकि अनेक अन्य मुस्लिम नागरिक, प्रतिष्ठित लोग और कलाकार इसे देशभक्ति के प्रतीक के रूप में सहजता से गाते भी हैं। दरअसल मुसलमानों के एक वर्ग के वंदे मातरम् का विरोध करने के पीछे मुख्य रूप से धार्मिक, साहित्यिक और ऐतिहासिक कारण हैं। जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसे धार्मिक संगठनों का मानना है कि अल्लाह के अलावा किसी भी अन्य सत्ता, भूमि या मूर्ति के सामने झुकना या उसकी पूजा करना उनके धार्मिक सिद्धांतों के विरुद्ध है।
कुछ इतिहासकारों और मुस्लिम विचारकों का मानना है कि इस उपन्यास की पृष्ठभूमि और कुछ अंशों में मुस्लिम विरोधी भावनाएं निहित थीं, जिससे इस गीत को लेकर ऐतिहासिक रूप से एक संशय पैदा हुआ। कई मुस्लिम नेताओं और कानूनी विशेषज्ञों का यह तर्क भी है कि भारत का संविधान अनुच्छेद 19 और 25 नागरिकों को अभिव्यक्ति और धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। उनका कहना है कि देशभक्ति साबित करने के लिए किसी को भी ऐसा गीत गाने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए जो उनकी धार्मिक आस्था से टकराता हो। हालांकि इस विषय पर मुस्लिम समाज भी एकमत नहीं है। कुछ उलेमाओं का मानना है कि इसके छंदों में मूर्तिपूजा और देवी स्वरूप की स्तुति शामिल है, इसलिए वे इसे गाने से परहेज़ करते हैं।
यही वजह रही कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वर्ष 1937 में कांग्रेस ने मुस्लिम समुदाय की आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए इस गीत के केवल शुरुआती दो छंदों को ही राष्ट्रगीत के रूप में अपनाया था। पहले दो छंदों में देश की प्राकृतिक सुंदरता (सुजलां सुफलां) का वर्णन है, जिस पर कई प्रगतिशील मुस्लिम संगठनों को कोई आपत्ति नहीं है। कई उदारवादी मुस्लिम, आम नागरिक और कलाकार इसे बिना किसी धार्मिक चश्मे के केवल अपनी मातृभूमि के प्रति सम्मान और प्रेम के रूप में देखते हैं। जैसे कि संगीतकार ए.आर. रहमान द्वारा गाया गया ‘मां तुझे सलाम’ ‘वंदे मातरम्’ बेहद लोकप्रिय है। ऐतिहासिक रूप से भी स्वतंत्रता संग्राम जैसे कि 1905 के स्वदेशी आंदोलन के दौरान मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे महान मुस्लिम नेताओं ने इस गीत और नारे का खुलकर समर्थन किया था। इसलिए वर्तमान में भी यह मुद्दा पूरे मुस्लिम समाज का नहीं, बल्कि व्यक्तिगत धार्मिक प्राथमिकताओं और आस्था से जुड़ा हुआ मुद्दा है।
आज जब देश का बड़ा वर्ग खासकर युवा शिक्षा की होती दुर्गति, पेपर लीक, अथाह बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, दयनीय स्वास्थ सेवाओं, बेतहाशा बढ़ती मंहगाई, मंदिर दान चोरी आदि से दुखी होकर सड़कों पर उतर रहा है, आज जब भारत में बाल कुपोषण की यह स्थिति है कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार हर दूसरा भारतीय बच्चा कुपोषित है, देश का गरीब व्यक्ति और गरीब होता जा रहा है, खुद सरकारी दावों के अनुसार 80 करोड़ लोग सरकार के 5 किलो मुफ्त राशन पर आश्रित हैं। ऐसे में क्या वंदे मातरम विवाद से लोगों को बेहतर ज़िन्दगी मिल सकेगी और उनका जीवन स्तर ऊपर उठ सकेगा? या फिर राजनीतिक दल इसे अपने राजनीतिक स्वभाव के अनुरूप मात्र हिन्दू-मुस्लिम के बीच का भावनात्मक मुद्दा बनाकर उछालना चाह रहे हैं? दरअसल प्रेम प्रदर्शन और विरोध के पीछे की हकीकत कुछ और तथा फसाना कुछ और बताया जाता है।



