दिमाग के इलाज की ज़रूरत

आज तक तो हम यही मान कर चलते रहे कि इस देश के रोगी शरीर को इलाज की बहुत ज़रूरत है। पेट को इलाज़ की ज़रूरत है क्योंकि वह भूखा रह कर इतना थक गया है कि अब मुफ्तखोरी ही उसके लिए परम धर्म बन गई है। इस मुफ्तखोरी को भद्र कवच ओढ़ा दिए गए हैं। उसके लिए तोरण द्वारा सज गये हैं, कि दया धर्म का मूल है। इस सूत्र को बहुत शास्त्र सम्मत माना जा रहा है, क्योंकि हम राजा हरिशचन्द्र की कहानियों की घुट्टी पर पले हैं। न्यायपीठ लाख कहता रहे कि ‘भाईजान, देश से यथोचित काम करवाइए और रेवड़ियां बांटने का यह अन्तहीन कार्यक्रम’ बंद कर दीजिये। क्योंकि यह कार्यक्रम अब यह सिद्ध करने पर तुल गया है कि यह देश बड़ा महान, इसकी अपनी ही शान है। करो यहां हरदम दया का यशोगान, पूरे होंगे सब काम।
अनुकम्पा ने सांस्कृतिक चोला धारण कर लिया है और घोषणा कर दी है कि हम रिकार्ड होल्डर हैं। यानी अस्सी करोड़ जनता को मुफ्त या नाममात्र कीमत पर राशन प्रदान करते हैं, और इसे जन-सेवा या जन-कल्याण की उपाधि प्रदान करते हैं। इस महाविस्तृत स्तर के उपाधि वितरण ने चाहे किसी को भूख से नहीं मरने देने की गारण्टी तो दे दी लेकिन इसी फेर में देश के युवाओं की बाजुओं की मछलियां गायब हो गई। नित्य नई संस्कृतियां रचते रहते हैं हम लोग, इसलिए इस कार्यहीन संस्कृति के माहौल में, हमारे नौजवानों की बाजुओं की मछलियां घुल गई। यहां चीज़ों को लापता हो जाने की बीमारी है। जैसे यहां मौसमों का निश्चित चेहरा गुम हो गया, ऐसे ही नौजवानों के बाजुओं की मछलियां भी गुम हो गईं।  अब यहां तेज़ी से जवानी गुम होने लगी है, और नौनिहाल सीधा अधेड़ावस्था को प्राप्त होने लगे हैं। बीच की जवानी अहिल्या के इंतज़ार जैसी लम्बित हो गई है। अब इस देश को निठल्ले अधबूढ़ों का देश भी कह लीजिये, तो कोई शिकवा नहीं। ‘आराम हराम है कि जगह काम हराम है’ का मूल मंत्र चल निकला और दुनिया की जल्दी ही तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बन जाने वाला देश भारत, सकल घरेलू उत्पादन या आय की पैमाइश में छठे स्थान पर चला गया। वास्तविक आय या खुशहाली का मापक पैमाने लेकर चले तो पता चला कि हम तो दुनिया क्या, एशिया की भी निचली पायदान पर दुबके बैठे हैं। हमारे अड़ोसी-पड़ोसी जिनका आर्थिक दीवाला निकल जाने का हम दिन-रात प्रचार करते हैं, खुशहाली और सुखद जीवन जीने के स्तर पर हमसे ऊपर बैठे हैं।
यह सूचकांक की निचली सीढ़ी पर दुबक जाने की भूख। हमारे नेता भ्रष्टाचार को शून्य स्तर पर राजपाट चलाने की घोषणा करके गद्दी सम्भालते हैं। जब उनकी पारी खत्म होती है तो उनकी जेबें काले नोटों से भरी रहती है। भ्रष्टाचार के सूचकांक पर हमारी वही शोभनीय अवस्था है। कैसे कहें? तेरी चाल बेढंगी, जो पहले थी वह अब भी है। तगमे वरण करने का हमें बड़ा शौक है तो सुन लीजिये महाभ्रष्टाचारी होने का अलंकरण हम कल भी वरण करते थे और आज भी करते हैं। हां भ्रदजन का नकाब पहनना हमें बहुत प्रिय हो गया है। इसे हम आज भी वरण करते हैं, कल कर रहे थे, और शायद कल भी करते रहेंगे। ‘भ्रष्टाचारी और सब चलता है’ का नारा लगाने वाले दलाल बंधुओं के बावजूद। लेकिन अधिक न सोचिये, क्योंकि सच की तलाश में अधिक खोजबीन करेंगे तो आपको भी दिमाग का बुखार हो सकता है। इस देश के लोगों को मसनदों पर बैठ कर खाली चित्त हुक्का गुड़गुड़ाने की आदत है। यही लोग किन्तु परन्तु करने लगें, तो फिर इनका शरीर तो पस्त है ही, दिमाग भी बीमार हो जाएगा और उसे हमें अपने मीर कारवां की तज़र् पर ‘दिमागी नक्सली’ कह सकते हैं।
यह कौन होता है दिमागी नक्सली? यह वह जीव हैं जो कर्ताधर्ता बन कर देश की चिंता करता रहता है, बस इससे आगे नहीं। हटेगा नहीं तो उसका चिन्ह भी अपनी इस धरती से मिटा दिया जाएगा। खुदा न करे कि आप दिमागी नक्सली हो जाएं। काम-धाम की तलाश की जगह ‘त्रुटि विचार’ के महत्त्वपूर्ण कार्य को संभाल लें। जी नहीं दिमागी बुखार से पीड़ित इन लोगों को खत्म नहीं करना, उन्हें केवल अपने नुमाइश घरों में सजा दो। यह करते धरते तो कुछ है नहीं, देश की दुरावस्था की केवल चिंता करते रहते हैं। बन्धु क्यों नहीं, चिंता चिता समान होती है। कितनी चिताएं पहले जल रही हैं, बेईमानी की, महंगाई की, भ्रष्टाचार की, शार्टकट संस्कृति की। एक और चिता जला लो दिमागी बुखार की। लेना-देना कुछ नहीं गिलास तोड़ा बारह आना, क्योंकि इसकी जगह कर्त्तव्य पालन की निष्ठा और आस्था, परिश्रम और अध्यवसाय की कंदील जला लें, लेकिन ऐसी कंदील जलाने में क्या लाभ? देश का नवनिर्वाचन होने लगेगा, इसलिए आओ इस दिमागी रोग की अय्याशी पाले। जो है सब बुरा है कहने का रोग और यहां बदलाव नहीं हो रहा, यथास्थितिवाद के साये हैं, इस चिंता में दुबले होने लगे।

#दिमाग के इलाज की ज़रूरत