सरकार शिक्षा के क्षेत्र में सुधारों की ज़रूरत को समझे

अब एक नया शब्द आ गया— दिम़ागी नक्सल। वैसे तो संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजिजू ने सफाई दे दी है कि प्रधानमंत्री के निशाने पर विपक्षी पार्टियां नहीं हैं लेकिन ये साफ नहीं किया गया है कि क्या इन शब्दों को जंतर मंतर आंदोलन के संदर्भ में गढ़ा गया है? इसमें कोई दो राय नहीं कि मोदी सरकार ने नक्सलवाद को काफी हद तक खत्म कर दिया है। मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री बनने के बाद नक्सली हिंसा को देश की सबसे बड़ी समस्या बताया था। एक रणनीति पर काम शुरू किया था, उस रणनीति को अंतिम अंजाम तक मोदी सरकार ने पहुंचाया। प्रधानमंत्री अब कह रहे हैं कि जंगलों में हिंसक नक्सली खत्म हो गये लेकिन दिम़ागी नक्सल देश में हिंसा और अराजकता फैलाना चाहते हैं। 
इसके पहले प्रधानमंत्री मोदी ने अर्बन नक्सल शब्द की खोज की थी। 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान उन्होंने अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को अर्बन नक्सल कह कर बुलाया था और कहा था कि इनकी जगह जंगलों में है। ‘आप’ ने मोदी की राजनीति को तब सबसे तगड़ी चुनौती दी थी। और दिल्ली में 70 में से 67 सीटें जीत कर मोदी को उनके जीवन की सबसे बड़ी हार उपहार में दी थी। ऐसे में अर्बन नक्सल, अराजक जैसे शब्दों का इस्तेमाल आप को बदनाम करने के लिये किया गया था। मुझे कोई भ्रम नहीं है कि अब दिम़ागी नक्सल शब्द का प्रयोग कॉकरोच आंदोलन को बदनाम करने के लिये किया जायेगा। 
मुझे नहीं मालूम कि कॉकरोच आंदोलन का क्या होगा लेकिन इतना ज़रूर पता है कि इस आंदोलन ने मोदी सरकार के खौफ के साम्राज्य को नोच कर फेंक दिया है और हर घर में एक कॉकरोच पैदा कर दिया है। ये कॉकरोच राजनीति के घटियापन को पसंद नहीं करते। वो देश में सांप्रदायिकता की जगह शिक्षा को बड़ा मुद्दा बनाना चाहता है। उसे हिंदू मुसलमान के बीच नफरत फैलाना अच्छा नहीं लगता है। वो एक ऐसे देश की परिकल्पना करता है जहां सब बराबर हैं, जहां धार्मिक नफरत के लिये जगह नहीं है, जो चाहता है कि सबको शिक्षा का बराबर अधिकार मिले, किसी के साथ धर्म, जाति, लिंग, भाषा, क्षेत्र आदि के आधार पर भेदभाव न किया जाये। उसे धार्मिक कर्मकांड के दिखावे की जगह आधुनिकता की चमक पसंद है, वो अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सबसे प्रतिभाशाली लोगों से प्रतिस्पर्धा करना चाहता है। वो वैश्विक नागरिक होना चाहता है, उसे अपने धर्म से प्यार है लेकिन वो धर्म का बंदी नहीं है। उसे विचारों की स्वतंत्रता चाहिये, उसके लिये असहमति को दबाना अपराध है। वो खुली हवा में सांस लेना चाहता है।
मोदी सरकार की सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि वो अभी भी पुराने ख्यालों की पार्टी है जो अतीत से बदला लेने की रणनीति बनाती रहती है। वैसे भी अतीतजीवी से भविष्यजीवी होने की कल्पना करना बेकार है। ऐसे में भाजपा व उनकी सरकार कॉकरोच आंदोलन को सही संदर्भ नहीं देखने की बड़ी गलती कर रही है। इस आंदोलन का जवाब बदनामी की रणनीति से नहीं दिया जा सकता है। इसका एकमात्र जवाब शिक्षा के तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन है। लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री ये कह कर छात्रों का दिल जीतना चाहते हैं कि सरकार आनलाइन कोचिंग शुरू करेगी। वो भूल रहे हैं कि कोचिंग संस्थान ही भारतीय शिक्षा की सबसे बड़ी दिक्कत है। भारतीय शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी सुधार की ज़रूरत है। तीन बुनियादी उपाय करने की आवश्यकता है। 
महंगी नहीं सस्ती शिक्षा : शिक्षा का स्वरूप पिछले कई दशकों में सरकारी तंत्र से निकल कर निजी हाथों में चला गया है जिन्होंने शिक्षा को गरीबों की पहुंच से बहुत दूर कर दिया है। जैसे पुराने जमाने में जाति व्यवस्था की वजह से शिक्षा समाज के बहुत बड़े तबके के लिये नहीं थी, उसे समाज के प्रभुत्ववादी तबके तक ही सीमित कर दिया गया था। आज संविधान लागू होने के बाद शिक्षा को जाति प्रथा के जंजाल से तो निकाल दिया गया है लेकिन निजीकरण ने अमीर गरीब की नई खाई खड़ी कर के नई जाति व्यवस्था को जन्म दिया है। जिसके पास पैसा है, वो महंगे और अच्छे स्कूल, कालेज व विश्वविद्यालय में अपने बच्चे को पढ़ा सकता है, उसे सबसे बेहतरीन शिक्षा दिला सकता है लेकिन गरीब का बच्चा ऐसे स्कूलों में जाने के लिये मजबूर है जहां शिक्षा के नाम पर मजाक हो रहा है। कहीं बिल्डिंग नहीं है तो कहीं टीचर नहीं। पूरी शिक्षा भगवान भरोसे है। ऐसे स्कूलों से निकला बच्चा कैसे अमीरों के बच्चों से प्रतिस्पर्धा कर सकता है? 
फिर पैसे वाले अपने बच्चों को कोचिंग सेंटर्स में भेजते हैं, प्राइवेट ट्यूशन दिलाते हैं, यानी पैसे से शिक्षा को खरीदा जा रहा है और गरीब परिवार का बच्चा इसलिये अच्छी शिक्षा नहीं ले पाता क्योंकि वो पैसे से शिक्षा नहीं खरीद सकता। ये बंद होना चाहिये। अमीर हो या गरीब एक तरह की शिक्षा सबको मिलनी चाहिये। कोचिंग सेंटर्स बंद हों, प्राइवेट ट्यूशन बंद हो, फाइव स्टार स्कूल बंद हों, अंग्रेजी और भाषाई स्कूल की जगह एक तरह के स्कूल हों, अमीर हो या गरीब सबके बच्चों को मुहल्ले के स्कूल में ही पढ़ाया जाये। टीचर बनने को बड़े कैरियर के तौर पर पेश किया जाये। उनकी सैलरी कई गुना बढ़नी चाहिये। जब सबको एक जैसी शिक्षा मिलेगी तो प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और जो बेस्ट होगा वो आगे बढ़ेगा। 
तीन घंटे की जगह सृजनात्मक टैलेंट हंट : हमारी शिक्षा व्यवस्था की दूसरी सबसे बड़ी दिक्कत परीक्षा प्रणाली है। ज़िंदगी में एक बार तीन घंटे की परीक्षा पास करने वाला देश का कर्णधार बन जाता है। बच्चों और छात्रों की प्रतिभा को तीन घंटे के चक्रव्यूह से निकाल कर पूरे साल टैलेंट की पहचान का खाका बनाना चाहिये। शिक्षा व्यवस्था ऐसी हो कि हर छात्र की प्रतिभा किस विषय में है इसकी पड़ताल प्राथमिक स्तर पर ही हो जाये। छात्र विशेष को उस विषय या स्किल की तरफ प्रेरित किये जाने का सिस्टम हो जिसमें उसका मन लगता है या जिस विषय में उसकी स्वाभाविक रुचि है और उस विषय में बाकी की तुलना में अच्छा कर सकता है। ताकि शिक्षा की शुरुआत में ही उसे पता चल जाये कि किस काम को वो दूसरे की तुलना में बेहतर कर सकता है। ऐसा होगा तो हर विषय में बेस्ट टैलेंट मिल पायेगा। अभी तो बच्चों को क्या पढ़ना है ये माता-पिता तय करते हैं। बच्चे का मन भले ही फिज़िक्स या गणित में न लगे लेकिन वो पढ़ता है क्योंकि माता-पिता ऐसा चाहते हैं। और फिर वो फेल होता है। हो सकता है वही बच्चा आर्ट्स सब्जेक्ट में बहुत अच्छा हो। अगर ये विषय वो पढ़ता तो संभव है वो स्कूल टाप करता। 
रिसर्च और नवाचार पर फोकस : हमारी शिक्षा की एक और कमी है रिसर्च, इन्नोवेशन पर ज़ोर नहीं होना। अमरीका दुनिया में इतनी बड़ी ताकत इसलिये बना है कि वहां विश्वविद्यालयों में रिसर्च और नये विचारों पर काम करने पर जोर दिया जाता है। अमरीका की सबसे बड़ी ताकत उनके विश्वविद्यालय हैं। इन विश्वविद्यालयों को निजी निवेश का काफी समर्थन हासिल है। अमरीका की देखा देखी चीन ने भी पिछले चालीस सालों में अपने विश्वविद्यालयों को काफी मज़बूत किया है और इन्नोवेशन पर काफी ज़ोर दिया है। ये इस कोशिश का नतीजा है कि चीन ने इलेक्ट्रिक वाहनों, एआई, सेमीकंडक्टर और ग्रीन एनर्जी में अमरीका और यूरोप की हालत खराब कर रखी है। भारत भी कर सकता है लेकिन यहां विश्वविद्यालयों में फोकस सिर्फ डिग्री लेने पर है, कुछ नया करने पर नहीं। हमारी इंडस्ट्री भी सिर्फ पैसा कमाने की मशीन है, वो रिसर्च और डेवलपमेंट को पैसा बर्बाद करने का ज़रिया मानते हैं। इसलिये भारत के बड़े-बड़े उद्योगपति पैसा तो कमाते हैं लेकिन कोई बड़ा वैश्विक ब्रांड या प्रोडक्ट नहीं बना पाते। इंडस्ट्री और विश्वविद्यालयों की मानसिकता जब तक नहीं बदलेगी तब तक बातें भले ही बड़ी-बड़ी कर लें, भारत विश्वगुरु नहीं बन सकता। 
इस वक्त एक और बड़ी समस्या खड़ी हो गई है। भारत के विश्वविद्यालयों व कालेजों को विचारधारा का नया दीमक लग गया है। विचारधारा के नाम पर ‘पर्ची और खर्ची’ का बोलबाला है। विचारधारा का विस्तार करने की कोशिश में दूसरी विचारधारा के टैलेंटेड लोगों को सिस्टम से बाहर किया जा रहा है और ऐसे लोगों को भर्ती किया जा रहा है जो किसी स्कूल में टीचर बनने के भी लायक नहीं। ऐसे लोग प्रोफेसर बन रहे हैं जो एक पेज नहीं लिख सकते। पूरा ज्ञान तंत्र खत्म होने के कगार पर पहुंच गया है। 
जंतर मंतर पर जो छात्र और युवा आये, वो इस सड़े गले तंत्र से नाराज़ हैं। अफसोस इस आंदोलन से सबक ले शिक्षा सुधार करने की जगह दिम़ागी नक्सल जैसे शब्द इजाद किये जा रहे हैं। ऐसे में भारत कैसे आगे बढ़ेगा और कैसे एक बड़ी ताकत बन कर उभरेगा?

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