लाल किला से प्रधानमंत्री ने पेश की विकसित राष्ट्र की रूप-रेखा

लाल किला से अपने लगातार 13वें संबोधन में अब तक का चौथा सबसे छोटा भाषण देते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अतीत की उपलब्धियों का तो लंबा ब्योरा दिया ही, परन्तु सबसे ज्यादा देर तक देर तक 21 साल बाद आने वाली आज़ादी कि 100वीं वर्षगांठ (साल 2047) पर बोले, जब उनके मुताबिक भारत विकासशील से विकसित देश बन जायेगा। अपने 76 मिनट के भाषण में प्रधानमंत्री लगभग 27 मिनट से ज्यादा 2047 पर बोले और एक तरह से देश की दिशा तय करने की कोशिश की। प्रधानमंत्री मोदी ने विकसित भारत के लिए विकास के लक्ष्य को एक नई संरचना ‘सप्तधारा’ से जोड़ते हुए उत्पादन, कृषि-खाद्य प्रसंस्करण, तकनीक-नवाचार, गति शक्ति, रक्षा, हरित-नीली अर्थव्यवस्था और सॉफ्ट पावर को भारत की भावी ताकत के सात आधार बताया।
उन्होंने आह्वान के स्वर में कहा, ‘अब भारत को छोटे लक्ष्य नहीं, बड़ी छलांग के लिए तैयार होना होगा।’ उनके इस संबोधन में सेमीकंडक्टर से परमाणु ऊर्जा तक, युवाओं के एआई कौशल से वैश्विक कंपनियों तक और आत्म-निर्भरता से रणनीतिक सुरक्षा तक स्पष्ट लक्ष्य दिखे। अपने  भाषण के इस हिस्से में मोदी 2047 के भारत की अर्थव्यवस्था और सामर्थ्य की एक पूर्ण तस्वीर खींचते दिखे। उनके संबोधन में साफ लगा देश अब अपनी अगली मंज़िल को 2047 की समय-सीमा में देख रहा है। हालांकि ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य उनके भाषणों में पहली बार नहीं आया है, लेकिन इस बार उन्होंने इसे सात धाराओं की स्पष्ट रणनीति से जोड़ा और बाकायदा इसका खाका पेश किया। हालांकि सवाल है कि क्या ये सात धाराएं भारत को अगले 21 वर्षों में उस मुकाम तक पहुंचा सकती हैं, जिसे प्रधानमंत्री ने विकसित राष्ट्र के रूप में परिभाषित किया है?
इसमें कोई दो राय नहीं कि 1947 में  राजनीतिक स्वतंत्रता हासिल करने वाला भारत वर्ष 2026 तक आते दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह बना चुका है। ऐसे में 2047 में विकसित राष्ट्र बनने की महत्वाकांक्षा हवा-हवाई नहीं है, लेकिन पिछले 18-19 महीनों में जिस तरह हम दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था बनते बनते फिर पांचवें स्थान में खिसक गये हैं, उसे देखते हुए लक्ष्य थोड़ा परेशान भी करता है। मगर शायद उन्हें इस हिचक की आशंका थी इसीलिए उन्होंने आत्म-निर्भरता को इस यात्रा का अनिवार्य आधार बताया और कहा कि भारत 21वीं सदी में पिछली सदी के नियमों के सहारे आगे नहीं बढ़ सकता। इसलिय उनके ‘विकसित भारत’ का नारा  महज भावनात्मक भाषण नहीं रह जाता। लेकिन यह भी है कि इसकी सफलता का वास्तविक पैमाना होगा—प्रति व्यक्ति आय में तेज़ वृद्धि, उच्च उत्पादकता वाले रोज़गार, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य, आधुनिक बुनियादी ढांचा, तकनीकी आत्म-निर्भरता तथा नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता।
यह लक्ष्य इसलिए भी काल्पनिक उड़ान नहीं लगती क्योंकि विश्व बैंक भी भारत की 2047 की महत्वाकांक्षा को उच्च-मध्य आय वाले देश की दिशा में आगे बढ़ने से जोड़ता है। उसके अनुसार 2000 के बाद भारत की अर्थव्यवस्था वास्तविक अर्थों में लगभग चार गुना हुई है और प्रति व्यक्ति आय लगभग तीन गुना हुई है, लेकिन यह भी याद रखना होगा कि आंकड़ों जितनी सुनहरी तस्वीर हकीकत में इसलिए नहीं है क्योंकि पिछले डेढ़ दशकों में अमीरों और गरीबों में अंतर हाल के दशकों में सबसे ज्यादा बढ़ा है। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री ने कहा है कि अगले पांच से सात वर्षों में वह हासिल करने का प्रयास होगा, जो पिछली पांच-सात दशकों में नहीं हो पाया। इसका अर्थ है कि अगले पांच से सात वर्षों में ही इस लक्ष्य की नींव तैयार करनी होगी। यही वजह है कि प्रधानमंत्री के भाषण का एक बड़ा हिस्सा दीर्घकालिक लक्ष्य से ज्यादा तत्काल क्षमता निर्माण पर केंद्रित दिखाई दिया।
विकसित भारत के लक्ष्य को साधने के लिए हमारा केवल बड़ी अर्थव्यवस्था होना पर्याप्त नहीं होगा। हमें बड़े पैमाने पर ऐसी वस्तुएं बनानी होंगी जिन्हें दुनिया खरीदे। इसलिए निर्माण क्षेत्र का मज़बूत होना निर्णायक है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि पहली तिमाही में 7.72 प्रतिशत और दूसरी तिमाही में 9.13 प्रतिशत रही। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं के तहत 14 क्षेत्रों में सितम्बर 2025 तक 2 लाख करोड़ से अधिक का वास्तविक निवेश आकर्षित हुआ और 12.6 लाख से अधिक रोज़गार सृजित हुए। लेकिन असली चुनौती केवल ‘मेड इन इंडिया’ नहीं, बल्कि ‘मेड इन इंडिया, वैश्विक गुणवत्ता’ है। यदि हम 2047 तक विकसित राष्ट्र बनना चाहते हैं तो हमें कम लागत वाले निर्माता से आगे बढ़ कर उच्च गुणवत्ता, डिजाइन, ब्रांड और तकनीक का वैश्विक केन्द्र बनना होगा। साथ ही दूसरा बड़ा मोर्चा चिप से रणनीतिक आत्म-निर्भरता तक की होगी। प्रधानमंत्री के भाषण में सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिजों पर ज़ोर इस बात का संकेत है कि आत्म-निर्भरता की परिभाषा बदल रही है। 
प्रधानमंत्री ने कहा है कि भारत में तीन सेमीकंडक्टर संयंत्रों में उत्पादन शुरू हो चुका है और आगामी वर्षों में पांच से आठ और संयंत्र आने की संभावना है। आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत सेमीकंडक्टर मिशन के तहत लगभग 1.60 लाख करोड़ रुपये के निवेश वाले 10 प्रोजेक्ट आगे बढ़ा चुका है।
यदि 2047 का भारत ज्ञान, तकनीक और नवाचार का वैश्विक केंद्र बनना चाहता है तो स्कूल से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय से उद्योग तक पूरी कौशल-श्रृंखला को बदलना होगा। इसमें ऊर्जा सुरक्षा भी बहुत महत्वपूर्ण पहलू है क्योंकि विकसित अर्थव्यवस्था को लगातार और भरोसेमंद ऊर्जा चाहिए। इसलिए परमाणु ऊर्जा और वैकल्पिक ऊर्जा पर प्रधानमंत्री का ज़ोर भी 2047 की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऊर्जा आत्म-निर्भरता अब केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय भी है। कुल मिलाकर जहां 2047 के विकसित भारत का सपना जितना सुखद लगता है इसे हकीकत का रूप देने में परीक्षा उतनी ही कठिन होगी। 
तेज़ जीडीपी वृद्धि तो ज़रूरी ही है, उससे भी ज्यादा ज़रूरी यह सुनिश्चित करना होगा कि विकास का लाभ गांवों, छोटे शहरों, महिलाओं, किसानों, श्रमिकों और मध्यम वर्ग तक पहुंचे। साथ ही रोज़गार की गुणवत्ता, शिक्षा, स्वास्थ्य, न्यायिक सुधार, शहरीकरण और कृषि उत्पादकता पर समान गंभीरता ज़रूरी होगी। अगर हमने ये कसौटियां साध लीं तो 2047 में हमें विकसित देश बनने से कोई नहीं रोक सकता।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर

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