बूढ़ा हो रहा अमानत गिल लाहौर

सीमा पार लाहौर में मेरा एक धर्म पुत्र रहता है, अमानत गिल मुसाफर। वह मुझे बापू जी कहता है। किसी न किसी ज़रिये अपनी खबर मुझे पहुंचा कर मेरा हाल-चाल पूछता रहता है। मैं 92 साल का हूं, लेकिन उसकी नई रचना से ऐसा लगता है कि वह मुझसे अधिक बूढ़ा होने की दौड़ में हैं। पेश हैं कुछ अंश :
‘इंसान की ज़िन्दगी का हर दौर अपनी अहमियत रखता है, लेकिन बुढ़ापा वह पड़ाव है जहां दौलत से ज़्यादा प्यार, ताकत से ज़्यादा सहारे और शोहरत से ज़्यादा अपनेपन की ज़रूरत होती है। इस उम्र में अगर अपने ही बेगाने हो जाएं, सम्मान की जगह बेरुखी मिले और ध्यान की जगह अकेलापन नसीब तो ज़िंदगी नर्क के समान हो जाती है।’
‘हर इंसान अपनी जवानी के सुनहरे साल अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए समर्पित करता है। वह अपनी इच्छाओं की कुर्बानी देता है, रातों को जागता है, मुश्किलें झेलता है और हर दुख को मुस्कुराकर सहन करता है। उनकी सारी मेहनत के पीछे बस एक ही सपना होता है कि उनकी संतान उनकी ज़िंदगी के आखिरी हिस्से में उनका सहारा बनेगी। लेकिन बदलते सोशल रूझानों, व्यस्त जीवन और खुदगज़र्ी ने कई परिवारों में इस सपने को तोड़ दिया है। नतीजा यह है कि जिन माता-पिता ने घर बसाये, वही अपने घरों में अजनबी बनकर रह जाते हैं।’
पता नहीं क्यों गिल जवानी में ही ऐसा डर क्यों भोगने लग पड़ा है। और पढ़े :
‘जो समाज अपने बुज़ुर्गों को बोझ समझना शुरू कर देता है, असल में अपनी तहज़ीब की नींव को हिलाना शुरू कर देता है। आज के दौर में ओल्ड होम्स की संख्या बढ़ती जा रही है। यह पारिवारिक ढांचे के कमज़ोर होने की निशानी है। हो सकता है वहां इलाज, आराम और सुविधाएं मौजूद हों, परन्तु संतान का प्यार, नाती-पोतों की हंसी और अपने घर की गर्माहट का कोई विकल्प नहीं है। इंसान की सबसे बड़ी भूख रोटी की नहीं, बल्कि ध्यान और अपनेपन की होती है।’
‘यह याद रखना चाहिए कि बुढ़ापा किसी एक इंसान की किस्मत नहीं, बल्कि हर जीवित इंसान का भविष्य है। आज जो जवान है, कल उसके बाल भी सफेद होंगे, उसके कदम लड़खड़ाएंगे और उसके दिल को भी किसी अपने से दो प्यार भरे शब्दों की ज़रूरत होगी। प्रकृति का नियम बहुत सादा है : आज हम जो बीज बोएंगे, कल हमें उसका फल मिलेगा। इसलिए माता-पिता की सेवा सिर्फ धार्मिक या नैतिक ज़िम्मेदारी समझ कर निभाना काफी नहीं, बल्कि इसे अपनी संस्कृति का बुनियादी सिद्धांत बनाना होगा।’
‘समाज की तरक्की ऊंची इमारतों, आधुनिक तकनीक या आर्थिक खुशहाली से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह अपने बुज़ुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है। बुज़ुर्गों को समय, सम्मान और प्यार दें, क्योंकि उनका आशीर्वाद ही परिवार की असली दौलत और आशीर्वाद है।’
मुझे बापू जी कहने वाले तेरी चिन्ता उल्लेखनीय है। लेकिन तुझे पता होना चाहिए कि ज़माना बदल रहा है। तुम्हारे बच्चों ने ज़माने के पदचिन्हों पर चलना है। अगर आपने उन्हें जन्म दिया है, तो उनसे ज़्यादा उम्मीदें न रखें। हो सके तो कम बच्चे पैदा करें और उन्हें अपने रास्ते जाने दें। उन्हें समय का आनंद लेने दें और अपने लिए कोई व्यस्तता तलाशें। अगर और कुछ नहीं, तो अपने दोस्तों के साथ ताश ही खेलें, चिंता मत करें।
उल्टा पड़ गया जीना पहाड़ों का जीना
एक दोस्त की सलाह पर मैंने चंडीगढ़-शिमला मार्ग पर धर्मपुर के पास गर्मियां बिताने के लिए दो कमरों का ठिकाना बनवाया, लेकिन यह रास नहीं आया। हर साल मानसून में सड़कें पानी में डूब जाती हैं, पहाड़ खिसक जाते हैं और गांवों का मुख्य मार्ग से कट जाना सामान्य बात हो गई है। साथ ही एक और संकट जो चाहे चुपचाप आती है, लेकिन उतना ही खतरनाक होता है, वह है पानी से होने वाली बीमारियों का फैलना। इसके अलावा शिमला में पीलिया, दस्त, हैजा और टाइफाइड को लेकर जारी की गई चेतावनी को महज़ मौसमी परेशानी नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक तत्काल और गंभीर खतरा समझना चाहिए। भारी बारिश ने पूरे हिमाचल में सड़कें, बिजली और पानी की सप्लाई प्रभावित कर दी। ऐसे नाज़ुक हालात में मासूम बच्चे, बूढ़े और दूर-दराज के पहाड़ी गांवों में रहने वाले लोग इस मुसीबत का सबसे बड़ा शिकार बनते हैं। प्रशासन ने पानी के स्रोतों की जांच करने, पाइपलाइन का निरीक्षण करने के बाद लोगों को पीने का पानी उबालकर पीने की सलाह दी है। लेकिन ये उपाय लंबे समय तक मज़बूत और टिकाऊ नहीं हो सकते। आम लोगों की कुछ सावधानियां—जैसे पानी उबाल कर पीना, हाथों की सफाई रखना और समय पर मेडिकल मदद लेना कई कीमती जानें बचाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
पांच-भाषी कवि दरबार
12 अगस्त, 2026 को चंडीगढ़ साहित्य अकादमी ने एक अनोखा कवि दरबार आयोजित किया गया, जिसमें पंजाबी, हिंदी और उर्दू भाषाओं के कवियों ने समय बांधा। फारसी की जगह संस्कृत की हाज़िरी ने मुझे यह भी याद दिलाया कि ऐसा क्यों हुआ। सिर्फ  इसलिए कि पाकिस्तान के अस्तित्व में आने पर फारसी उनकी होकर  गई, है कि न गलत बात।
अंतिका
(दानिश अमीरी)
जो उर्दू का मुसाफिर है,
 यही पहचान है उसकी,
जिधर से भी गुज़रता है 
सलीका छोड़ जाता है।

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