ब्रिटिश हुकूमत ने प्रतिबंधित कर दी थी सुभद्रा कुमारी की तीन कविताएं

सुभद्रा कुमारी चौहान का नाम सुनते ही उनकी विख्यात कविता ‘झांसी की रानी’ की ये पंक्तियां ज़बान पर आ जाती हैं- ‘बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी/खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।’ लेकिन महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में शामिल होकर कोर्ट अरेस्ट होने वाली पहली सत्याग्रही महिला सुभद्रा कुमारी, जो ब्रिटिश शासन का विरोध करने के लिए 1923 व 1942 में दो बार जेल गयीं, का काव्य संसार केवल इस एक कविता तक सीमित न था। इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के निहालपुर गांव में 16 अगस्त 1904 को राजपूत परिवार में जन्मीं सुभद्रा कुमारी ने प्रारम्भिक शिक्षा क्रोस्थवेट गर्ल्स स्कूल में हासिल की, जहां वह महादेवी वर्मा की सीनियर व दोस्त थीं। उन्हें बचपन से कविताएं लिखने का शौक था। बहरहाल, जब 1919 में उन्होंने मिडिल स्कूल पास किया तो 13 अप्रैल, 1919 को जलियांवाला ब़ाग का भयावह नरसंहार हुआ, जिसका सुभद्रा कुमारी के दिलोदिमाग पर इतना गहरा असर हुआ कि उनके जीवन का रुख ही बदल गया। वह न सिर्फ स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका अदा करने लगीं बल्कि देशप्रेम की कविताएं रचने लगीं ताकि युवाओं को गांधी जी के साथ आने के लिए प्रेरित किया जा सके। 
उसी दौरान किसी ने सुभद्रा कुमारी से प्रेम कविता लिखने का आग्रह किया और जवाब में उन्होंने ‘मेरी कविता’ लिखी, जोकि संवाद शैली में है- ‘मुझे कहा कविता लिखने को लिखने बैठी मैं तत्काल/पहले लिखा जलियांवाला, कहा कि बस हो गये निहाल। तुम्हें और कुछ नहीं सूझता ले देकर वही ख़ूनी बाग़/रोने से अब क्या होता है धुल न सकेगा उसका द़ाग। जिसने जलियांवाला ब़ाग में अपना सब कुछ खो दिया था। त्रासदी से वह महिला इतनी आहत है कि रोज़ शाम को वह जलियांवाला ब़ाग जाती है, रात भर वहीं रहती हुई, ‘सूर्य-उदय से पहले ही फिर आती है’, लोग उसे पागल कहते हैं- ‘डायन भी कहते हैं उसको कोई-कोई हत्यारे/उसे देखना किंतु न ऐसी ग़लती तुम करना प्यारे।’ क्योंकि- ‘बाईं ओर हृदय में उसके कुछ धड़कन दिखलाती है/वह भी दिन-प्रतिदिन क्रम-क्रम से धीमी होती जाती है। किसी रोज़ संभव है उसकी धड़कन बिल्कुल मिट जावें/उसकी भोली भाली आंखें हाय सदा को मुंद जावें। उसकी ऐसी दशा देखना आंसू चार बहा देना/उसके दु:ख में दुखिया बनके तुम भी दु:ख मना लेना।’ 
यह कविता जलियांवाला ब़ाग में जो शहीद हुए उनके परिवारों पर क्या गुज़री को बयान करती है और उनके प्रति हमदर्दी की मांग करती है। लेकिन अंग्रेज़ सरकार को यह भड़काने वाली प्रतीत हुई और जब जगन्नाथ प्रसाद गुप्त ने इसे अपने संग्रह ‘जलियांवाला ब़ाग का महात्म्य’ में शामिल किया तो संग्रह को प्रतिबंधित करके ज़ब्त कर लिया गया और जब्तशुदा पुस्तिकाओं को लंदन के इंडिया ऑफिस में पहुंचा दिया गया, जहां वह दशकों तक यूं ही ‘कूड़े का ढेर’ बनी पड़ी रहीं। इस बेशकीमती प्रतिबंधित साहित्य को हरियाणा के अभिलेखागार में निदेशक रहीं डा. राजवंती मान ने खोज निकाला और जो सामग्री जलियांवाला ब़ाग से संबंधित थी, उसे अपनी पुस्तक ‘जलियांवाला ब़ाग की कराहें’ में सम्मिलित किया। जगन्नाथ प्रसाद गुप्त के प्रतिबंधित संग्रह ‘जलियांवाला ब़ाग का महात्म्य’ में सुभद्रा कुमारी की दो अन्य रचनाएं भी शामिल हैं, जिन पर ब्रिटिश शासन ने प्रतिबंध लगा दिया था। 
‘जलियांवाला ब़ाग में बसंत’ में सुभद्रा कुमारी ने नरसंहार के बाद जलियांवाला ब़ाग किस तरह से बसंत में भी उदास था की मार्मिक तस्वीर शब्दों से खींची है- ‘यहां कोकिला नहीं काक हैं शोर मचाते/काले काले कीट भ्रमर का भ्रम उपजाते। कलियां भी अधखिली, मिली हैं कंटक कुल से/वे पौधे, वे पुष्प, शुष्क हैं अथवा झुलसे। परिमल हीन पराग द़ाग सा बना पड़ा है/हा! यह प्यारा बाग़ खून से सना पड़ा है। आओ! प्रिय ऋतुराज! किंतु धीरे से आना/यह है शोक स्थान, यहां मत शोर मचाना।’ सुभद्रा कुमारी चाहती हैं कि जलियांवाला ब़ाग की त्रासदी को कोई भारतीय कभी भूले नहीं, इसलिए वह वायु से कहती हैं कि वह इतनी मंद चले कि ‘दु:ख की आहें संग उड़ाकर’ न ले जाये और कोकिला ‘राग रोने के गाये’ व भ्रमर ‘कष्ट की कथा सुनाएं’। जो लोग इस बाग़ में आएं वह- ‘कुछ कलियां अधखिली, यहां इसलिए चढ़ाना/करके उनकी याद, ओस के अश्रु बहाना। तड़प-तड़पकर वृद्ध मरे हैं गोली खाकर/शुष्क पुष्प कुछ यहां, गिरा देना तुम जाकर। यह सब करना, किंतु बहुत धीरे से करना/यह है शोक स्थान यहां मत शोर मचाना।’
प्रतिबंधित ‘राखी’ कविता में सुभद्रा कुमारी ‘भैया कृष्ण’ को राखी भेजते हुए प्रार्थना करती हैं कि वह अपनी बहनों की रक्षा उसी तरह से करें जैसे उन्होंने द्रौपदी की रक्षा की थी ताकि फिर कभी जलियांवाला जैसा नरसंहार कहीं न हो- ‘बहिनें कई बिलखती हैं हा! उनकी सिसकी न मिट पाई/लाज गंवाई, गोली खाई, तिस पर भी धमकी खाई। डर है कहीं ना मार्शल लॉ का पड़ जावे फिर से घेरा/ऐसे समय द्रौपदी जैसा कृष्ण सहारा है तेरा। बोलो सोच समझकर बोलो क्या राखी बंधवाओगे? भीड़ पड़ेगी, रक्षा करने क्या तुम दौड़े आओगे? यदि हां, तो यह लो इस मेरी राखी को स्वीकार करो/आकर भैया बहिन ‘सुभद्रा’ के कष्टों का भार हरो।’ सुभद्रा कुमारी की कोशिशें रंग लायीं। देश आज़ाद हुआ लेकिन अफसोस! 15 फरवरी 1948 को एक कार दुर्घटना में सिवनी, मध्य प्रदेश, के निकट उनका निधन हो गया। वह मात्र 43 वर्ष की थीं।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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