स्वतंत्रता आन्दोलन में पंजाबियों का योगदान

कम्पनी सरकार महाराजा रणजीत सिंह के समय ही ब्रिटिश शासन की सीमा दर्शाती लाल लकीर को सतलुज से आगे दरिया अटक तक ले जाने के लिए लार टपका रही थी, परन्तु अंग्रेज जानते थे कि महाराजा के सामने उनकी दाल नहीं गलेगी। फलस्वरूप उन्होंने खासला राज के कुछ दरबारियों के साथ सांठ-गांठ कर संतोष कर लिया। फिर ऐसे नमक हराम दरबारियों की गद्दारी के कारण ही लाहौर दरबार के साथ हुई जंग जीती और 9 मार्च, 1846 को हुई भैरोवाल की संधि के परिणामस्वरूप लाहौर में पैर रखने के लिए स्थान बना लिया। अंग्रेजों ने आम पंजाबियों की आंखों में धूल झौंकने के लिए राज-गद्दी का मालिक बालक दलीप सिंह को प्रवान कर लिया, पर इससे पंजाबियों के मन में कवि शाह मुहम्मद द्वारा बताई गई ‘तीसरी जाति’ के खिलाफ ऩफरत और विरोधी भावनाओं को देखते हुए ब्रिटिश रैज़ीडैंट लारैंस ने 29 मई, 1847 को गवर्नर जनरल के सचिव को संबोधित पत्र में लिखा, ‘समय व्यतीत होने से जब धीरे-धीरे निकट भूत की हारों की याद मध्यम पड़ गई, यदि ऐसा अवसर बना, सिख चरित्र मध्य की प्रवानित आज़ादी इस समूह को विदेशी गुलामी से मुक्ति के यत्न के रास्ते पर डाल सकती है।’ वह नहीं जानता था कि सिख पहले ही इस रास्ते पर चल रहे हैं, जिसका परिणाम ‘प्रेमा साजिश’ था जो कुछ गद्दारों की जासूसी के कारण सफल न हो सकी।
प्रमुख शहीद
ब्रिटिश गुलामी के विरोध में जूझने वाले पहले शहीद निहंग गंडा सिंह और उसके दो गुमनाम साथी थे, जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के साथ टक्कर लेने का ऐलान कर जत्थे के 6 और साथियों के साथ 28 जनवरी, 1846 को श्री दरबार साहिब के निकट बुंगा रामगढ़ीया के एक मिनार में डेरा लगाया। सरकार पक्षीय सिख प्रमुखों द्वारा उनको आत्म समर्पण करने की प्रेरणा काम न आई तो किला गोबिंदगढ़ से और फिर लाहौर से भेजी सैन्य टुकड़ियों ने मिनार की घेराबंदी की, परन्तु अकालियों द्वारा की गई गोलीबारी में सैनिक टुकड़ी का सूबेदार मारा गया और कई सिपाही घायल हुए। और कोई बस न चला तो शासकों ने मीनार की नींव में बारूद भर कर उसको उड़ा देने की योजना बनाई। यह सूचना गंड़ा सिंह और उसके साथियों को मिली तो उन्होंने अपनी जान से ज्यादा अपनी विरासत को मूल्यवान समझते हुए आत्मसमर्पण कर दिया। 9वां अकालियों को लाहौर लाकर गंडा सिंह और उसके 2 साथियों को फांसी और अन्य 6 को डंडे बेड़ी सहित 7 वर्ष कैद की सज़ा सुनाई गई। फांसी की सज़ा 19 अप्रैल 1848 को कड़ी सुरक्षा प्रबंधों में अमल में लाई गई। ऐसे निहंग गंडा सिंह और उसके दो साथियों ने मातृ-भूमि को विदेशी गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए जो मार्ग दर्शन किया, अगली पूरी सदी पंजाबी उन पर बेखोफ चलते रहे।
मार्च 1849 में सिख सेना को दूसरी बार हरा कर अंग्रेज़ों ने पंजाब में अपने राज को लम्बे समय तक बनाने और बिना किसी मुश्किल के चलाने के लिए लाहौर दरबार की सेना में शामिल सैनिकों से उनकी तलवारें लेकर तुरंत सेवामुक्त कर दिया और घरों में पड़ी तलवारों और अन्य हथियारों को ज़बत कर लिया। ऐसे ब्रिटिश हुकूमत निश्चिंत हो गए, परन्तु उनकी यह बेफिक्री लम्बे समय तक न चल सकी। बाबा राम सिंह ने धर्म कर्म में पूरे रहितवान और चरित्रवान सिख समाज का निर्माण कर ब्रिटिश सरकार के साथ लड़ाई मोल लेने की योजना बनाकर 12 अप्रैल 1857 को कूका सम्प्रदाय की स्थापना की।
पंजाब में 19वीं शताब्दी की अंतिम चौथाई दौरान ब्रिटिश हुकूमत को कुछ सांस लेने का मौका मिला, परन्तु यह सागर में तूफान आने से पहले वाली शांति सिद्ध हुई। 20वीं सदी आरम्भ होते पंजाबी देश भक्तों का राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय आज़ादी संग्रामी श्री बाल गंगाधर तिलक के साथ सम्पर्क हुआ, जिनकी विचारधारा से प्रभावित स. अजीत सिंह द्वारा 1907 में चलाए बार के किसान आंदोलन ने पंजाबियों को बड़े स्तर पर साम्राज्य सरकार विरोधी कतारों में लाकर खड़ा किया और देश वासियों को सामूहिक बल द्वारा सरकार को झुकाने का विश्वास दिलाया।
तार से तार जुड़ती गई
केवल देश में ही नहीं, विदेशों में बैठे पंजाबियों ने भी आज़ादी संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाई। पहले विश्व युद्ध के समय ़गदर लहर के बुलावे पर अमरीका, कनाडा और अन्य पूर्वी टापूओं से देश वापिस पहुंचे पंजाबियों ने ब्रिटिश साम्राज्य के साथ जो टकराव पैदा किया वह किसी से छुपा नहीं हुआ। पंजाब सरकार द्वारा ़गदरी ब़गावत से संबंधित विभिन्न मुकद्दमों में 36 ़गदरियों को फांसी और 70 को उम्र कैद काले पानी की सज़ा सुनाए जाने से ़गदरी ब़गावत की विशालता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। इससे केवल पांच वर्ष बाद पंजाबियों ने रॉलेट एक्ट विरोधी आंदोलन में शामिल होकर पंजाब सरकार के नाक में दम किया, जिससे बौखलाए पंजाब सरकार के लैफ्टीनैंट गवर्नर माइकल ओडवायर की मिलीभुगत के साथ जनरल डायर ने 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला ब़ाग में कई सैंकड़ों शांतमयी निहत्थे व्यक्तियों को गोलियां मारने की कार्रवाई की। इस अमानवीय और असभ्य कार्रवाई के खिलाफ पंजाबियों के भारी रोष को दबाने के लिए अमृतसर और लाहौर सहित पांच ज़िलों में मार्शल लॉ लगाया गया और सरकार के विरुद्ध ब़गावत करने या भड़काने के आरोप में 108 व्यक्तियों को फांसी और 265 को उम्रकैद काले पानी की सज़ा सुनाई गई। चाहे इतनी कड़ी सज़ाओं के खिलाफ देश भर में हुए विरोध के कारण सरकार को सज़ाओं में संशोधन करना पड़ा। पंजाबियों के इस मौके बहे खून ने समूचे देश की राजनीति को नई दिशा दी। फिर चाहे महात्मा गांधी की 1921 वाली ना-मिलवर्तन लहर थी, चाहे 1931 की सिविल ऩाफरमानी लहर, चाहे 1942 का ‘भारत छोड़ो आंदोलन’, हर मौके पंजाबी देशवासियों के कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हुए।
वास्तव में अकाली लहर का यह लड़ाकू लक्षण उन देश भक्तों की देन थी, जो ़गदर पार्टी द्वारा 1914 में देश की आज़ादी के लिए की हथियारबंद ब़गावत की असफलता के पीछे अकाली लहर को उचित मंच मानकर इसमें शामिल हुए थे। शिरोमणि अकाली दल की राजनीति सक्रियता कम हुई तो जहां धर्म-निपेक्षता के धारणी बाबा खड़क सिंह, ज्ञानी गुरमुख सिंह, मास्टर सुंदर सिंह लायलपुरी आदि कांग्रेस के साथ जुड़ गए वहां इससे भी आगे बढ़कर समाजवादी विचारधारा को समर्पित देशभक्तों ज्ञानी हीरा सिंह ‘दर्द’, सोहन सिंह ‘जोश’, सरदारा सिंह ‘यूथप’ आदि ने भाई संतोख सिंह के साथ मिलकर कीर्ति-किसानों को संगठित करने का नया राजनीतिक मंच बना लिया, जिसका बाद में कम्युनिस्ट पार्टी के साथ मिलाप हुआ। 1947 में देश को आज़ादी मिलने तक इस जत्थेबंदी ने ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाई धर्म-आधारित राजनीति का विरोध करते हुए आर्थिक मुद्दों को आधार बनाकर संघर्ष किया। स. भगत सिंह के नेतृत्व में सक्रिय नौजवान भारत सभा और हिन्दोस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन भी इसी सोच को समर्पित संगठन थे।
़गदरी नेताओं करतार सिंह सराभा, विष्णु गणेश पिंगले आदि ने मेरठ, आगरा, बनारस, फैज़ाबाद, इलाहाबाद आदि कई छावनियों में सेना के साथ सम्पर्क बनाया जिनमें से लाहौर छावनी के 23वें रसाले और 26वीं पंजाबी ने उनका डटकर साथ दिया। दूसरे विश्व युद्ध के समय कीर्ति नेताओं के सम्पर्क में आये ‘सैंट्रल इंडिया हारस’ और आर.आई.ए.एस. कम्पनी की ब़गावत, जो अभी अनदेखी है, स्वतंत्रता संग्राम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सेवा कर रहे सैनिक भी संघर्ष में पीछे नहीं रहे। बब्बर अकाली लहर के नेताओं में यह अग्रणी थे। अकाली लहर दौरान गुरु का ब़ाग के मोर्चे दौरान निरोल पूर्व सैनिकों के दो जत्थों ने गिरफ्तारी दी, जैतो से मोर्चे में भाग लेने वाले पूर्व सैनिकों की संख्या भी अधिक नहीं थी।
भारत के गले से साम्राज्य सरकार की गुलामी की जंजीरे उतारने के लिए राजनीतिक दाव पेचों का प्रशिक्षण लेने के लिए पंजाब से छूट कर अमरीका, कनाडा, अर्जेंटीना आदि से लगभग एक सौ पंजाबी, अपने घर-बार और ज़मीन-जायदाद का मोह त्याग कर मास्को गए। इनके बिना ब्रिटिश सरकार की जेल में मरने के स्थान पर विदेश में रह कर साम्राज्य सरकार के विरुद्ध लोक राय लामबंद करने वाले लाला हरदयाल, स. अजीत सिंह और भाई भगवान सिंह ‘प्रीतम’ आदि को कैसे बुलाया जा सकता है।
-मो. 94170-49417

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