केवल आज़ादी का उत्सव नहीं, आत्म-मंथन का संकल्प बने 15 अगस्त
15 अगस्त भारत के लिए केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं बल्कि वह दिन है, जब एक लंबे, कठिन और रक्त-रंजित संघर्ष के बाद भारत ने विदेशी शासन की बेड़ियां तोड़ी थी। यह उन लाखों ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों की तपस्या, त्याग और बलिदान की स्मृति है, जिन्होंने अपने वर्तमान को राष्ट्र के भविष्य के लिए न्योछावर कर दिया। इसलिए स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा देखकर आंखों में गर्व आना स्वाभाविक है, राष्ट्रगान सुनकर हृदय में देशभक्ति का ज्वार उठना भी स्वाभाविक है। लेकिन क्या स्वतंत्रता का अर्थ केवल इतना ही है कि हम हर वर्ष ध्वजारोहण करें, देशभक्ति के गीत गाएं और कुछ घंटों के लिए राष्ट्र-प्रेम की भावना से सराबोर हो जाए, शायद नहीं। स्वतंत्रता दिवस उत्सव का पर्व अवश्य है लेकिन उससे कहीं अधिक आत्ममंथन का अवसर है। 15 अगस्त को स्वतंत्रता के 79 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इन 79 वर्षों में भारत ने ऐसी उपलब्धियां हासिल की हैं, जिन्हें कभी असंभव माना जाता था। एक निर्धन और विभाजन की त्रासदी से जूझते देश ने लोकतंत्र को न केवल अपनाया बल्कि उसे लगातार जीवित भी रखा। कृषि में आत्मनिर्भरता से लेकर परमाणु शक्ति बनने तक, अंतरिक्ष अनुसंधान से लेकर डिजिटल क्रांति तक, सड़क, रेल, संचार, शिक्षा, चिकित्सा और उद्योग से लेकर स्टार्टअप और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक भारत ने लम्बी छलांग लगाई है। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव तक पहुंचने वाला भारत आज दुनिया की प्रमुख वैज्ञानिक और तकनीकी शक्तियों में अपनी जगह बना चुका है।
हालांकि किसी राष्ट्र की वास्तविक सफलता केवल उसकी आर्थिक वृद्धि, ऊंची इमारतों, मिसाइलों, उपग्रहों और डिजिटल सुविधाओं से तय नहीं होती। राष्ट्र की असली ताकत इस बात से तय होती है कि उसके सबसे कमज़ोर नागरिक को कितना सम्मान, सुरक्षा, न्याय और अवसर प्राप्त है। इसी कसौटी पर स्वतंत्रता के 79 वर्षों का मूल्यांकन करते समय तस्वीर पूरी तरह चमकदार नहीं दिखाई देती। सबसे बड़ा सवाल हमारे लोकतांत्रिक चरित्र को लेकर है। संविधान ने हमें लोकतंत्र दिया, लेकिन लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और सरकार बनाने का नाम नहीं है। लोकतंत्र विचारों के सम्मान, असहमति की स्वीकार्यता, संस्थाओं की स्वतंत्रता, कानून के शासन, जवाबदेही और जनहित में निर्णय लेने की व्यवस्था है। संसद और विधानसभाएं लोकतंत्र के वे मंदिर हैं, जहां देश और राज्यों के भविष्य पर गंभीर बहस होनी चाहिए। वहां सत्ता पक्ष को अपने निर्णयों का तर्क देना चाहिए और विपक्ष को सरकार से सवाल पूछने चाहिए। असहमति लोकतंत्र की कमज़ोरी नहीं उसकी शक्ति है, लेकिन जब असहमति संवाद के बजाय नारेबाजी, हंगामे और कार्यवाही बाधित करने का माध्यम बन जाए तो लोकतांत्रिक मर्यादा कमज़ोर होती है।
संसद की कार्यवाही बाधित होने का अर्थ केवल कुछ घंटे की राजनीतिक खींचतान नहीं है। इसके पीछे जनता का समय, सार्वजनिक धन और महत्वपूर्ण विधायी अवसर भी नष्ट होते हैं। देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था में यदि गंभीर चर्चा के स्थान पर आरोप-प्रत्यारोप और राजनीतिक प्रदर्शन हावी हो जाएं तो यह केवल सांसदों की नहीं, पूरी राजनीतिक संस्कृति की समस्या है। दूसरी बड़ी चुनौती राजनीति के अपराधीकरण और भ्रष्टाचार की है। लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनती है कि वे उसकी आवाज़ बनें, न कि इसलिए कि वे सत्ता को निजी प्रभाव और लाभ का साधन बना लें। जब गंभीर आपराधिक आरोपों से घिरे लोग चुनावी राजनीति में प्रभावशाली बने रहते हैं, जब धनबल और बाहुबल चुनावी समीकरणों को प्रभावित करते हैं और जब सार्वजनिक पद को निजी प्रतिष्ठा या लाभ का माध्यम समझा जाने लगता है, तब लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है। यह भी उतना ही चिंताजनक है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध कानून और संस्थाएं होने के बावजूद आम नागरिक को कई बार अपने जायज़ काम के लिए भी अनावश्यक देरी, जटिल प्रक्रियाओं और सिफारिश के दबाव का सामना करना पड़ता है। भ्रष्टाचार केवल रिश्वत लेने-देने तक सीमित समस्या नहीं है। यह व्यवस्था में भरोसे को खा जाने वाला दीमक है। जब किसी व्यक्ति को लगता है कि बिना पैसे या पहुंच के उसका काम नहीं होगा, तब उसके भीतर कानून और संस्थाओं के प्रति सम्मान कमज़ोर होता है। स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ तभी स्थापित होगा, जब सामान्य नागरिक को अपने अधिकार के लिए किसी प्रभावशाली व्यक्ति की चौखट पर न जाना पड़।
महिलाओं की सुरक्षा का प्रश्न भी स्वतंत्र भारत की आत्मा को झकझोरता है। हर बार किसी महिला या बच्ची के साथ दुष्कर्म, हत्या अथवा अमानवीय हिंसा की घटना सामने आती है तो समाज कुछ दिनों के लिए आक्रोशित होता है, मोमबत्तियां जलती हैं, कठोर कानूनों की मांग होती है और फिर धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता है। हमें इस चक्र को तोड़ना होगा। कानून की कठोरता ज़रूरी है लेकिन उससे भी अधिक ज़रूरी है कानून का निश्चित, तेज और निष्पक्ष क्रियान्वयन। अपराधी को यह भरोसा नहीं होना चाहिए कि राजनीतिक संरक्षण, धन, प्रभाव या व्यवस्था की कमज़ोरी उसे बचा सकती है। कानून का भय तभी पैदा होगा, जब कानून का शासन वास्तव में दिखाई देगा। सामाजिक विभाजन भी लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती है। जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा और समुदाय के नाम पर समाज को बांटने की कोशिशें लोकतंत्र को कमज़ोर करती हैं। महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता भी स्वतंत्रता की सार्थकता से सीधे जुड़े प्रश्न हैं। आर्थिक विकास के आंकड़े तभी सार्थक होंगे, जब विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी गंभीर विमर्श आवश्यक है। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करने, सवाल पूछने और असहमति व्यक्त करने का अधिकार नागरिक की शक्ति है लेकिन स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में अंतर है।
स्वतंत्रता की 79 वर्षों की यात्रा पर गर्व करना हमारा अधिकार है, लेकिन आत्मसंतोष हमारा अधिकार नहीं। हमें उपलब्धियों का उत्सव मनाने के साथ कमियों को स्वीकार करने का साहस भी दिखाना होगा। आने वाले दो दशकों में हमें यह तय करना है कि 2047 का भारत केवल आर्थिक और तकनीकी रूप से शक्तिशाली होगा या नैतिक, लोकतांत्रिक और मानवीय रूप से भी मज़बूत होगा। असली परीक्षा यही है।
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