सज़ा-य़ाफ्ता लोगों की पैरोल संबंधी दोहरे मापदंड क्यों ?
मैंने इस बात में बिल्कुल नहीं पड़ना कि भाई जगतार सिंह हवारा की पैरोल के मामले में कौन-कौन क्या-क्या सियासत खेल रहा है। सिर्फ न्याय के तकाज़े की बात करूंगा। भाई हवारा बेअंत सिंह हत्याकांड में लगभग 31 वर्ष से जेल में हैं। उनकी बेहोशी की हालत में पड़ी 80 वर्ष से अधिक उम्र की गम्भीर बीमार मां को मिलने देने का मामला राजनीति का शिकार हो रहा है। जबकि दूसरी तरफ दुष्कर्म तथा हत्या के आरोपों में कैद सिरसा डेरा प्रमुख को सिर्फ 6 वर्षों में ही 16 बार पैरोल या फरलो दी जा चुकी है। वह 436 दिन बाहर रहा है। कथित बापू आसा राम से भी ऐसा ही व्यवहार हो रहा है, परन्तु भाई हवारा को मानवीय हमदर्दी के नाम पर अपनी मां को मिलने के लिए पैरोल देने संबंधी दोहरे मापदंड अपनाए जा रहे हैं। सिर्फ भाई हवारा ही नहीं, अन्य सिख बंदियों, यहां तक कि सज़ा पूरी कर चुके सिख बंदियों के प्रति भी यही व्यवहार भारतीय लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है। कैसे हो सकता है कि एक अकेला व्यक्ति जो 30 वर्ष से अधिक समय से जेल में बंद है, यदि कुछ दिनों के लिए पुलिस पहरे में बीमार मां को मिलने के लिए आता है तो उससे देश की सुरक्षा को खतरा हो जाता है। क्या सरकार इतनी ही कमज़ोर है? याद रखें, देश की आज़ादी में सिखों तथा पंजाबियों ने अपनी आबादी के लिहाज़ से सबसे अधिक कुर्बानियां दीं, सबसे अधिक जेल काटी और सबसे अधिक आर्थिक नुकसान सहन किया, परन्तु हमें यह एहसास करवाना कि हमारे लिए न्याय का तकाज़ा और है, किसी अन्य के लिए और, तो यह अच्छी बात नहीं।
जब चमन को लहू की ज़रूरत पड़ी,
सब से पहले हमारी ही गर्दन कटी,
अब ये कहते हैं हम से सभी एक ज़ुबां,
ये चमन है हमारा तुम्हारा नहीं।
—लाल फिरोज़पुरी
राजस्थान को नोटिस
हक-ए-हकदारों को हक लेने से फिर रोकेगा कौन,
आह! ’़गर ज़िंदा है सोचों में सदाकत का फितूर।
—लाल फिरोज़पुरी
ताज़ा समाचार है कि आखिर पंजाब सरकार ने राजस्थान को 1 लाख 44 हज़ार करोड़ रुपये की पानी की रायल्टी का बकाया 30 दिन में अदा करने का नोटिस भेज दिया है। नि:संदेह इसे अब 2027 के विधानसभा चुनावों से जोड़ कर देखा जा रहा है और चाहे विरोधी इसे एक राजनीतिक स्टंट ही कहें, परन्तु फिर भी यह कदम स्वागतयोग्य है। चाहे पंजाब सरकार ने यह नोटिस किसी राजनीतिक मसलहत के कारण ही दिया हो, परन्तु इस नेटिस ने पंजाब के पानी पर पंजाब की मालिकी की बात को और उभारा है। पंजाब विधानसभा पहले ही इस बारे प्रस्ताव पारित कर चुकी है। हालांकि हमारे हिसाब से राजस्थान को 1960 से 2026 तक गए पानी की रायल्टी इस राशि से कई गुना अधिक बनती है, परन्तु फिर भी इस नोटिस का स्वागत इसलिए करना बनता है कि यह इस बात का सबूत है कि पंजाब ने अभी पानी पर अपना अधिकार नहीं छोड़ा और जो लोग, जो कौमें या राज्य अपने अधिकार याद रखते हैं, वे कभी न कभी लेने में सफल भी हो जाते हैं, परन्तु इस मामले में केन्द्र की सभी सरकारें चाहे वे जवाहर लाल नेहरू से लेकर डा. मनमोहन सिंह तक की कांग्रेस सरकारें, चाहे वे संयुक्त सरकारें जिनमें एक पंजाबी इन्द्र कुमार गुजराल की सरकार भी शामिल थी और चाहे वह अटल बिहारी वाजपेयी तथा वर्तमान में नरेन्द्र मोदी की भाजपा सरकार है, किसी ने भी पंजाब के साथ सिर्फ पानी के मामले में ही नहीं, अपितु लगभग प्रत्येक मामले में या तो अन्याय किया है, या फिर हो चुके अन्याय को दूर न करने का ‘गुनाह-ए-अज़ीम’ ज़रूर किया है। सबसे बड़ा उदाहरण तो इंदिरा गांधी के समय 1966 के पंजाब पुनर्गठन एक्ट में धारा 78, 79 तथा 80 शामिल करने का है, जो अन्य किसी भी राज्य के विभाजन के समय नहीं किया गया। इन धाराओं ने ही पंजाब से पानी तथा अन्य मामलों में धक्केशाही की शाह-राह बनाई थी। राजस्थान को दिए गए नोटिस का आधार 1920 का शिमला समझौता बनाया गया है, जिसमें सतलुज नदी का पानी बीकानेर नहर के ज़रिये 6 रुपये 50 पैसे प्रति एकड़ की रायल्टी से दिया गया था और जो बाकायदा 1960 तक पंजाब को मिलता भी रहा। उल्लेखनीय है कि 1920 में भारत में सोने की कीमत 25 रुपये प्रति 10 ग्राम थी और पंजाब में औसतन कृषि योग्य ज़मीन की कीमत 100 रुपये से 300 रुपये प्रति एकड़ थी। आश्चर्य की बात है कि नदियों की बाढ़ नुकसान तो पंजाब का करती है, परन्तु पानी एवं बिजली में मुफ्त के मालिक हरियाणा तथा राजस्थान हैं। किसी को विश्व भर में लागू रिपेरियन कानून के अनुसार पंजाब को न्याय देने में कोई दिलचस्पी ही नहीं है।
केन्द्र करे न्याय
वास्तव में राजस्थान ने आसानी से कोई भुगतान तो करना नहीं। यदि पंजाब अदालत में भी गया तो विवाद लम्बा ही चलेगा। अच्छी बात तो यह हो कि केन्द्र पंजाब के साथ न्याय करे और पंजाब पुनर्गठन एक्ट में धक्के से डाली गई 78, 79 तथा 80 धाराएं रद्द करे या फिर कम से कम पंजाब तथा पड़ोसी राज्यों में पानी की रायल्टी, पानी की मात्रा, पंजाब की पानी की ज़रूरत तथा रख-रखाव के खर्च बारे एक नया तथा न्यायपूर्ण समझौता करवाए। हालांकि केन्द्र सरकार से ऐसी उम्मीद करना अभी तो मुश्किल प्रतीत होता है।
दिल परेशां है क्या किया जाए,
अक्ल हैरां है क्या किया जाए।
—जॉन एलिया
एफ.सी.आर.ए. संशोधन विधेयक-2026
अकबर इलाहाबादी का एक शे’अर है :
ज़िंदा हूं म़गर जीस्त की लज़्ज़त नहीं बाकी,
हर चंद कि हूं होश में होशियार नहीं हूं।
जिसका भाव है कि जीवित तो हूं, परन्तु जीने का मज़ा नहीं बचा और चाहे होश में तो हूं परन्तु होशियार नहीं हूं। बिल्कुल ऐसी ही स्थिति पंजाबियों तथा सिख नेताओं की है। हमारे सामने ताज़ा उदाहरण 12 अगस्त, 2026 को लोकसभा में पेश विदेशी योगदान (रैगुलेशन) संशोधन विधेयक-2026 (एफ.सी.आर.ए.) की है। भाजपा के पास संसद में स्पष्ट बहुमत के बावजूद उसे विधेयक संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजना पड़ा है। कोई माने या न माने, परन्तु यह स्पष्ट रूप में भारतीय ईसाई लाबी के दबाव का परिणाम है। यदि यह विधेयक इसी तरह ही पारित हो जाता तो यह सिर्फ ईसाई संस्थाओं के लिए ही नहीं, अपितु अन्य अल्पसंख्यक संस्थाओं तथा कुछ बहुसंख्यक संस्थाएं भी इसके निशाने पर आ जातीं, परन्तु हैरानी की बात है कि पंजाब का एक भी सांसद या सिख राजनीतिक या धार्मिक नेता इसके खिलाफ खुल कर नहीं बोला।
इसको रोकने में कैथोलिक बिश्प’स कांफ्रैंस ऑफ इंडिया, नैशनल कौंसिल ऑफ चर्चिस इन इंडिया, अन्य ईसाई संस्थाओं तथा सिविल सोसाइटी के साथ-साथ मिज़ोरम, मेघालय तथा नागालैंड के मुख्यमंत्रियों के अतिरिक्त कांग्रेस, एस.पी., टी.एम.सी. तथा डी.एम.के. आदि पार्टियों का दबाव तथा ईसाई नेताओं की गृह मंत्री अमित शाह से की गई मुलाकातें प्रभावी हुई हैं।
नि:संदेह यह विधेयक विदेश से आ रहे पैसे से ईसाई धर्म के प्रसार को रोकने के नाम पर ही लाया जा रहा था, परन्तु इसका प्रभाव सिख संस्थाओं पर भी पड़ेगा। शिरोमणि कमेटी तथा दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी के अतिरिक्त अन्य सिख संस्थाएं भी एफ.आर.सी.ए. के तहत पंजीकृत हैं। नि:संदेह धार्मिक संस्थाओं को तो अधिक खतरा नहीं होगा, परन्तु इस कानून के इसी तरह स्वीकार होने से सिख शैक्षणिक एवं चैरीटेबल संस्थाएं भी प्रभावित हो सकती हैं, क्योंकि नये संशोधन में स्पष्ट है कि यदि एफ.सी.आर.ए. रजिस्ट्रेशन रद्द हो जाती है या नवीनीकरण नहीं किया जाता तो विदेशी सहायता से बनी सम्पत्तियां अस्थायी या स्थायी रूप में सरकारी कब्ज़े में चली जाएंगी। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर लाए गए इस संशोधन की कुछ धाराएं अल्पसंख्यकों को मिलती आर्थिक सहायता रोकने वाली तथा पहले आई सहायता से बनी संस्थाओं पर सरकारी कब्ज़े का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं।
हम समझते हैं कि इस उदाहरण से पंजाब और विशेषकर सिख नेताओं को समझ आ जानी चाहिए कि यदि अक्ल और एकता से विरोध किया जाए तो गर्म-गर्म नारों से कौम को ‘जलती के मुंह’ देने की हर समय ज़रूरत नहीं होती और न ही हर समय किसी मोर्चे की ही ज़रूरत होती है। नरेन्द्र मोदी जैसी सरकार को भी बातचीत और अक्ल से अपनी बात मनवाने के लिए मजबूर किया जा सकता है। सिख नेता हमेशा ही बातचीत की मेज़ पर हारते रहे हैं। हमारे सामने ईरान का उदाहरण भी है। बातचीत की मेज पर अमरीका जैसी महाशक्ति ईरान से लगातार हार रही है। उल्लेखनीय है कि ईरानियों का ‘आई क्यू लेवल’ विश्व में चौथे स्थान पर है। अमरीकियों का 18वें स्थान पर और भारतीयों का अलग-अलग नमूनों में 40वें से लेकर 128वें स्थान पर माना जाता है। इसमें पंजाबियों तथा सिखों के ‘आई क्यू लेवल’ का पैमाना पता नहीं। खैर, बात स्पष्ट है कि अपनी बात मनवाने के लिए अक्ल की अधिक ज़रूरत है। हर बार ज़रूरी नहीं कि मह़िफल में दार-ओ-रस्न अर्थात सूली एवं फांसी की बात चले तो सिखों ने ही उठ कर आगे आना है, अपितु होश एवं एकता की बातचीत भी बड़ी उपलब्धियां दे सकती है।
जब उसकी बज़्म में दार-ओ-रसन की बात चली,
मैं झट से उठ गया और आगे आके बैठ गया।
—ज़ुबैर अली ताबिश
-मो. 92168-60000



