अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता- फिल्म ‘सतलुज’
‘सतलुज ’ फिल्म की चर्चा पंजाब में हर जगह है। इस फिल्म को निर्देशित किया है हनी त्रेहन ने। इसके निर्माताओं में दो प्रसिद्ध नाम हैं रॉनी स्क्रूवाला और अभिषेक चौबे। फिल्म का सीधा संबंध जसवंत सिंह खालड़ा से है जो मानवाधिकार संबंधी अभियान से जुड़े थे। उन्हें 6 सितम्बर, 1995 को झब्बाल पुलिस (तरनतारन) द्वारा झूठा पुलिस मुकाबला बनाकर मार दिया गया और उनका शव हरिके के निकट सतलुज में फैंक दिया गया। इसीलिए फिल्म का नाम ‘सतलुज’ रखा गया है। फिल्म में मुख्य भूमिका दिलजीत दोसांझ ने निभाई, जोकि आज कला के कई शिखर छू चुके हैं।
बताया जाता है कि यह फिल्म ‘पंजाब 1995’ के टाइटल के साथ चार वर्ष पहले ही 2022 में बन कर तैयार हो गई थी, लेकिन सेंसर बोर्ड ने सिनेमाघरों में दिखाने के लिए ज़रूरी सर्टीफिकेट प्रदान नहीं किया था। फिर सेंसर बोर्ड ने फिल्म निर्माताओं को 100 से ज्यादा कट लगाने को कह दिया। फिर निर्माताओं ने इस फिल्म को जी-5 के ओ.टी.टी. प्लेटफार्म पर कुछ दिन पहले रिलीज कर दिया। ओ.टी.टी. पर रिलीज होने वाली फिल्मों के लिए चलन के मुताबिक, सेंसर बोर्ड से अनुमति नहीं लेनी पड़ती। लेकिन जल्द ही इस फिल्म संबंधी भारत सरकार के आदेशानुसार जी-5 ओ.टी.टी. प्लेटफार्म ने भारत में दिखाने के लिए मना कर दिया। पंजाबियों में इसकी तीखी प्रतिक्रिया होनी ही थी। पंजाब तथा विदेश में बसे पंजाबी हैरान रह गए। पंजाबी महसूस कर रहे थे कि यह फिल्म पंजाब के काले दिनों से संबंधित है, जिसे सिनेमाघरों में दिखाया जाना चाहिए था। पंजाब में उन दिनों अनेक अनचाहे घटनाक्रम सामने आए। जहां लोगों को बसों से उतारकर मारे जाने की घटनाएं घटी, वहीं पुलिस तथा सुरक्षा बलों द्वारा उस समय कानून के दायरे से बाहर जाकर झूठे पुलिस मुकाबले बनाए गए, जिसे बेनकाब करने वाली फिल्म ‘सतलुज’ तैयार हुई।
वर्तमान समय में सूत्रों के अनुसार पता चल रहा है कि भारत सरकार ने इस फिल्म को स्वीकृति देने या न देने के लिए एक समिति का गठन किया है, जिसकी आने वाले दिनों में रिपोर्ट आ सकती है।
1950 से 1977 तक पंजाब को काला समय देखना पड़ा, जिसने इसकी प्रगति को बुरी तरह प्रभावित किया। 1982 में शिरोमणि अकाली दल द्वारा सतलुज-यमुना लिंक नहर के विरुद्ध ज़िला पटियाला से आन्दोलन शुरू किया था, परन्तु फिर जल्द ही इस मोर्चे को शिरोमणि अकाली दल द्वारा हरिमंदिर साहिब समृद्ध अमृतसर में परिवर्तित कर दिया गया। इसको पंजाब के सिख भाईचारे की कुछ अन्य मांगों से जोड़ दिया गया और इस मोर्चे का नाम धर्म युद्ध मोर्चा रख दिया गया। यह मोर्चा लम्बे समय तक चला और सिखों की मांगों संबंधी केन्द्र सरकार के साथ शिरोमणि अकाली दल की एकाधिक बैठकें हुईं, परन्तु कोई परिणाम निकल नहीं पाया।
मोर्चे के साथ-साथ दु:खद रूप से पंजाब में हिंसक घटनाएं होने लगीं। जब केन्द्र सरकार और पंजाब सरकार कोई समुचित हल निकालने में असफल रही और पंजाबियों को एक संकट में धकेल दिया गया। दिल्ली में इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई, जिसे गलत तरीके से परिभाषित किया गया और दिल्ली तथा कानपुर जैसे शहरों ने काला नवम्बर के रूप में सिख नरसंहार के रूप में देखा गया। हिंसा और कत्लेआम का यह दौर 1997 तक चला। इसी समय में खाड़कुओं के रूप में विचरण करते लोगों द्वारा निर्दोष लोगों की हत्या कर दी गई, जिसे खालिस्तान आन्दोलन का नाम दिया गया। फिल्म अगर कुछ फैक्ट सामने ला रही है तो उसे रोकना नहीं चाहिए। हर फिल्म से छवि को नुकसान नहीं होता। केन्द्र सरकार के सही फैसले को लोग आशा से देख रहे हैं।

