अभी भी जटिल है पश्चिम एशिया की स्थिति
पश्चिम एशिया के क्षेत्र में छिड़ा युद्ध खत्म होने का नाम नहीं ले रहा, बल्कि यहां स्थिति और भी जटिल होती जा रही है। अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, जिन्होंने इज़रायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के साथ मिलकर इस वर्ष 28 फरवरी को ईरान पर हवाई हमले करके उसके सुप्रीम नेता आयतुल्ला अली खामेनेई व अन्य बहुत सारे जरनैलों को मार दिया था, द्वारा अभी भी तबाही का यह सिलसिला लगातार जारी है। ईरान द्वारा इस हमले की प्रतिक्रिया-स्वरुप अमरीका द्वारा खाड़ी देशों में स्थापित किए गये अमरीका के सैन्य अड्डों पर हमले करके जहां उनका नुकसान किया गया, वहीं इन देशों का भी बड़ा नुकसान हुआ और इन देशों के कच्चे तेल का व्यापार प्रभावित भी हुआ।
बहुत सारे तेल के कुओं का नुकसान हो जाने के कारण खाड़ी देशों ने तेल का उद्घाटन बेहद घटा दिया, जिसका प्रभाव भारत सहित पूरी दुनिया के कई देशों पर पड़ा। तेल की कीमतें लगातार बढ़ने से बहुत सारे देशों की आर्थिकता भी डावांडोल हो गई है। इसी समय ईरान द्वारा होर्मुज़ का समुद्री रास्ता बंद किए जाने से बड़ी हलचल पैदा की है। यह रास्ता ईरान के साथ-साथ ओमान को भी लगता है। दोनों देशों में चाहे होर्मुज़ समुद्री रास्ते के प्रबंध संबंधी आपसी समझौता तो हो गया है, परन्तु ईरान द्वारा यह रास्ता इसलिए नहीं खोला जा रहा, क्योंकि अमरीका के साथ हो रही उसकी बातचीत मुकम्मल तौर पर अभी पूरी नहीं हुई। चाहे अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बार-बार यह ब्यान दिए हैं कि यह समझौता पूरा होने के काफी नज़दीक पहुंच गया है और होर्मुज़ का समुद्री रास्ता भी जल्द खुल जाएगा। इस संबंधी अमरीका ने पहली अप्रैल माह में ही युद्धविराम का ऐलान किया था और उसके बाद जून माह में दोनों देशों ने एक मैमोरंडम पर भी हस्ताक्षर किए थे, परन्तु ईरान द्वारा समझौते के लिए अपनी शर्तों को और भी सख्त कर दिया गया। उसने अमरीका द्वारा ईरान को दी जाती धमकियों को रोकने के साथ ही लेबनान, यमन, फिलिस्तीन था इराक के भीतर अपने सहयोगियों तथा भागीदारों पर हमले रोकने की शर्तें भी लगाईं और यह भी मांग की गई कि अमरीका द्वारा समुद्र में ईरान की, की गई घेराबंदी भी खत्म की जाए और दूसरे देशों में उसकी ज़ब्त की गई सम्पत्तियों को भी वापस किया जाए। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प की ओर से ये सभी शर्तें मानने से हिचकिचाहट दिखाई जा रही है, क्योंकि इससे उनकी बड़ी हेठी होती है। ईरान द्वारा यह भी कहा गया है कि अमरीका उस पर किए गए हमलों से हुए नुकसान की भरपाई भी करे।
आज डोनाल्ड ट्रम्प की उनके द्वारा ईरान के प्रति अपनाई गई हमलावर नीतियों के कारण विश्व भर में कड़ी आलोचना हो रही है। अमरीका में अधिकतर लोग उनके खिलाफ हो चुके हैं और वहां जगह-जगह प्रदर्शन किए जा रहे हैं। नि:संदेह इस 6 माह के युद्ध में ईरान का बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। देश में इसका आधारभूत ढांचा एक तरह से तबाह हो चुका है। उसकी अर्थ-व्यवस्था पूरी तरह डावांडोल हो चुकी है, परन्तु तबाही के बावजूद ईरान द्वारा अमरीका के आगे झुकने से इन्कार किया जा रहा है। इससे यह अवश्य प्रतीत होता है कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प यह युद्ध हार चुके हैं, क्योंकि इज़रायल जो उनका भागीदार बना रहा है, वह भी डोनाल्ड ट्रम्प की सभी नीतियां मानने को तैयार नहीं हो रहा। विशेष रूप में नेतन्याहू ने ट्रम्प की गाज़ा योजना को मानने से इन्कार कर दिया है और कहा है कि हमास की ओर से पूरी तरह हथियार डालने के बिना वह उससे समझौता नहीं करेगा और उसके द्वारा यह भी कहा गया है कि वह फिलिस्तीन के अलग आज़ाद देश के रूप में अस्तित्व को स्वीकार नहीं करेगा। ऐसी स्थिति में इस युद्ध के और भी उलझ जाने तथा गम्भीर होने के हालात बनते दिखाई दे रहे हैं, जो विश्व के लिए तो एक बुरा समाचार है ही, परन्तु भारत के लिए भी यह बड़ी चिन्ता का विषय बनता जा रहा है, क्योंकि इस युद्ध के जारी रहने से उसे आर्थिक रूप में और भी बड़ा नुकसान सहन करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

