गठबंधन के कयास

शिरोमणि अकाली दल (ब) के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलने का समय मांगने के बाद शुक्रवार को संसद भवन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यालय में एक संक्षिप्त बैठक हुई, जिसकी राजनीतिक गलियारों में व्यापक स्तर पर चर्चा हो रही है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि कुछ महीने बाद पंजाब में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। अलग-अलग पार्टियां इसके लिए अपनी-अपनी नीति बनाने में जुटी हुई हैं। अकाली दल (ब) और भाजपा का बहुत लम्बे समय तक साथ बना रहा था, चाहे पिछले लोकसभा और विधानसभा के चुनाव इन दोनों पार्टियों ने अलग-अलग लड़े थे। 
इन दोनों ही चुनावों में दोनों पार्टियों की निराशाजनक हार हुई थी, जिससे यह परिणाम निकाला जाने लगा था कि यदि दोनों पार्टियां एकजुट होकर चुनाव लड़तीं तो पिछले परिणाम बेहतर आ सकते थे। प्रधानमंत्री मोदी के स्वर्गीय स. प्रकाश सिंह बादल के साथ हमेशा अच्छे संबंध रहे थे। स. बादल ने ही वर्ष 1997 में भाजपा के साथ गठबंधन के लिए हाथ आगे बढ़ाया था। उसके बाद पंजाब में वर्ष 1997, 2007 और 2012 में अकाली-भाजपा सरकारें बनी थीं और दोनों पार्टियों के अच्छे संबंध बने रहे थे। अकाली दल भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का सदस्य रहा था। वर्ष 2020 में केन्द्र द्वारा बनाए गए कृषि कानूनों के विरोध में अकाली दल ने भाजपा से रिश्ता तोड़ लिया था। उसके बाद से ही दोनों पार्टियों के संबंधों में दूरियां बनी रही हैं, जो आज तक भी जारी हैं। इस समय में अकाली दल बादल में सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व को लेकर बड़ा विद्रोह खड़ा हो गया था, जिसके बाद अकाली दल (पुनर सुरजीत) अस्तित्व में आया था। इस समय के दौरान ही ‘अकाली दल वारिस पंजाब दे’ का अलग अस्तित्व भी बना। यह नया दल भी राजनीतिक क्षेत्र में बहुत सक्रिय हुआ दिखाई देता है।
जहां तक भाजपा का संबंध है इसने प्रदेश में वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव अकेले रूप में लड़े थे, जिसमें संसद की 13 सीटों में से भाजपा को कोई भी सीट प्राप्त नहीं हुई थी, परन्तु इसकी मत प्रतिशतता 18 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। पिछले समय से प्रदेश के चुनाव लड़ने के लिए भाजपा गम्भीरता से तैयारी करती दिखाई देती रही है, जिस तरह यह यहां विचरण करती रही है और जैसे इसने अपने क्षेत्र और प्रभाव को बढ़ाया है और दो बड़ी पार्टियां अकाली दल और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल किया है, उन्हें अहम पदों से नवाज़ा है, उससे इसकी निरन्तर सक्रियता का पता चलता है। सुनील जाखड़ जैसे कांग्रेस के प्रदेश के प्रमुख नेता को लम्बे समय तक पार्टी अध्यक्ष बनाए रखा। अब कभी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे केवल सिंह ढिल्लों को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। उससे भी लगातार यह प्रभाव मिलता रहा है कि पार्टी पंजाब में प्रत्येक स्तर पर और प्रत्येक क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए बेहद यत्नशील है। उसकी इन गतिविधियों से यह बात भी छुपी नहीं रही, कि वह आगामी चुनावों में पंजाब की सभी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।
विगत अवधि में केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने भी अपने पंजाब के दौरों में स्पष्ट रूप में यह बयान दिए थे कि उनकी पार्टी अकेले ही प्रदेश की सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी। नए प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने भी पिछले दिनों में बार-बार यह दोहराया है कि पार्टी सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी। जिस तरह वह सभी क्षेत्रों में अपनी ज़िला स्तरीय टीमें तैयार कर रही है और उनके नाम की घोषणा कर रही है, उससे भी उसके उद्देश्य का पता चलता है। क्रियात्मक रूप में सभी ज़िलों के अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं का ताना-बाना जैसे वह बढ़ा रही है तो उस कारण अब उसके लिए किसी अन्य पार्टी से सीटों का लेन-देन करना बेहद मुश्किल होगा, क्योंकि अन्य पार्टियों से गए नेताओं की भी यह इच्छा होगी कि उन्हें चुनाव लड़ने के लिए टिकटें दी जाएं। पहले ही पार्टी ढांचे को विस्तार देने के कारण उसके भीतर नाराज़गी और गिले-शिकवे उभरने शुरू हो गए हैं, जिनकी ओर ध्यान देना उसके लिए ज़रूरी होगा। ऐसी स्थिति में किसी अन्य पार्टी के साथ गठबंधन को व्यवहारिक रूप देना उसके लिए बेहद मुश्किल सिद्ध होगा, जो पार्टी के भीतर उठ रही आलोचना को और भी बढ़ाने का कारण बनेगा। इसलिए कहा जा सकता है कि राजनीति में चाहे कई तरह की सम्भावनाएं बनी रहती हैं, परन्तु अकाली-भाजपा गठबंधन को सफल बनाना अब पहले जितना आसान नहीं है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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