पर्यटकों को लुभाती हैं मारवाड़ की कलात्मक जूतियां

कलात्मकता के साथ ही अपनी मजबूती के लिए प्रसिद्ध मारवाड़ की जूतियों को बनाने वाले कारीगर अपनी बारीक तथा उच्च किस्म की कशीदाकारी, मजबूत सिलाई तथा अच्छे चमड़े के कारण जोधपुर की जूतियों ने विशेष प्रसिद्धि पाई है। केवल भारत तक ही यह प्रसिद्धि सीमित नहीं है बल्कि ये जूतियां विदेशी पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। बावजूद जोधपुर की जूतियों की एक अलग ही पहचान है। बारीक सिलाई, हाथ की सफाई व अनेक डिजायनों में हल्की व मुलायम जैसी विशेषताओं के कारण मारवाड़ का जूती व्यवसाय बस अपने ही दम-खम पर टिका हुआ है।
यहां बनने वाली जूतियों में मुड्डा, स्लीपट खाड़ा, मोजड़ी, नोकदार पंजाबी व जनानी तथा ऐम्बरोइड्री प्रमुख हैं। लोकप्रियता में ऐम्बरोइड्री जूती का प्रचलन ज्यादा है। क्योंकि इस पर की गई कशीदाकारी सभी को आकर्षित करती है। जूती बनाने वाले कारीगर सारी नाप जोख अंगुलियों पर ही करते हैं। ये सात अंगुल से 18 अंगुल तक की बनाई जाती हैं। अंगुल शब्द स्थानीय व देशी शब्दावली है। वैसे यह धंधा काफी मुनाफे का है क्योंकि एक जूती निर्माता कम से कम एक जोड़ी में कीमत का आधा भाग मुनाफे के रूप में कमा लेता हैं। जोधपुर में बनने वाली यह जूतियां उदयमंदिर, प्रतापनगर व सिवांची गेट में बनाई जाती है जहां अनेकों परिवार वर्षों से बसे अपने पुश्तैनी काम को कर रहे हैं। इन जूतियों के निर्माण में सफेद व रंगीन धागा व रंगों का मखमल तथा रंग वगैरह सामग्री काम में लाई जाती है। सबसे पहले ये कारीगर जूतों का ऊपरी भाग तैयार करते हैं, जिसे देशी भाषा में ‘पंजा’ कहते है। ये पंजा जिसे ‘पाना’ भी कहा जाता है, स्त्रियां घर में ही तैयार करती हैं। ‘पाना’ पर सलमा-सितारा, मोती व बारीक तथा मनमोहक कशीदाकारी कर उसे मनमोहक रूप प्रदान करती है।
पंजे के आकार के आधार पर ही पुरुष कारीगर जुती का निर्माण करता है। जूती का तलिया बनने पर कारीगर द्वारा इसे जोड़ दिया जाता है बस दोनों पांवों की जूती तैयार है। यह ज़रूरी नहीं है कि इन कारीगरों की जूतियां रोज बिके, लेकिन ये रोज माल तैयार करते हैं। यूँ भी एक जोड़ी जोधपुरी जूती बनाने में डेढ़ दिन खप जाता है।
जूती बनाने का धंधा यूं तो समूचे मारवाड़ में फैला हुआ है। लेकिन सर्वाधिक इस व्यवसाय से जुड़े परिवार जोधपुर में ही है जैसे भीनमाल की जूतियों का भी कोई जवाब नहीं है। मारवाड़ के अलावा जयपुर से 50 कि.मी. दूर रामजीपुरा कला के भी अधिकांश परिवार इसी व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। जो कि ग्राहक की पसंद के अनुरूप जूतियों तैयार करते हैं। जयपुर के आस-पास बनने वाली चौफुला सिलाई को जूतियां जिसमें 150 धागे डाले जाते हैं। इन जूतियों पर पॉलिश की ज़रूरत नहीं होती, ये कपड़े से झाड़ने पर ही चमक जाती है।
जूती व्यवसाय से जुड़े कारीगरों की दास्तान भी आर्थिक तंगी से जुड़ी हुई हैं। इन कारीगरों का दर्द यह है कि आजकल मार्केट में जब से सिंथेटिक कुर्म का प्रचलन बढ़ा है तब से इस लेदर से बनने वाली जूतियों ने हमारे चर्म उद्योग को ठप कर दिया है, क्योंकि आज चमड़ा 800 रुपए से लेकर 1000 रुपए किलो तक में मिलता है।
खैर, जूतियां बनाने का धंधा अब परिवार के उन्हीं पुराने लोगों के हाथ में है, जो अब कोई दूसरा हुनर जानते ही नहीं हैं। मारवाड़ व आस-पास बनने वाली जूतियों की मांग पड़ोसी राज्यों में है, जिनमें पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश प्रमुख हैं। कुछ माल का 40 प्रतिशत राज्य से बाहर चला जाता है। कुल मिलाकर संकट से जूझ रहे जूती व्यवसाय को लघु उद्योग का दर्जा अवश्य मिला हुआ है लेकिन चलते हालातों में परिवर्तन की आंधी ने जूतियों की खपत अवश्य घटा दी है। इसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि कल तक यहां छोटे बच्चों से लेकर बूढ़ों तक के पांवों में जूतियां शोभित होती थीं, अब उनका स्थान रबड़ व प्लास्टिक के फैशनेबल जूते-चप्पलों ने ले लिया है।
फिलहाल, जूती बनाने वाले कारीगरों में अधिकांश परिवार अपना यह पुश्तैनी धंधा छोड़ने को बाध्य हो रहे हैं, क्योंकि नई पीढ़ी के युवक यह कार्य नहीं अपनाना चाहते हैं। यदि राज्य सरकार जरा भी इन जूती व्यवसायियों के प्रति गंभीर है व इस लघु उद्योग को जीवित रख यहां की जूतियों का आकर्षण बरकरार रखना चाहती है तो उन्हें इस व्यवसाय से जुड़े कारीगरों का दर्द समझना होगा, तभी मारवाड़ का चरमराता जूती उद्योग बच पाएगा। (सुमन सागर)

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