मुक्केबाजी में भारत अब बड़ी ताकत बनकर उभरा

रिंग में अब भारत सिर्फ मुक्के नहीं बरसाता बल्कि दुनिया को अपनी मजबूत ताकत का भी एहसास कराता है। हाल में राष्ट्रकुल खेल (ग्लासगो-2026) में भारतीय मुक्केबाजों ने जिस तरह का शानदार प्रदर्शन किया है, उससे इस बात पर पक्की मुहर लग गई है। यह अकारण नहीं है कि ग्लासगो में सम्पन्न 23वें राष्ट्रकुल खेलों में भारत ने 14 मुक्केबाजों का दल भेजा था, जिसमें से 10 मुक्केबाज पदक लेकर लौटे हैं और इन पदकों में से 7 स्वर्ण पदक हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत मुक्केबाजी में अब कितनी दमदार उपस्थिति दर्ज करा रहा है। जिस खेल में कभी हमारी उम्मीदें कुछ चुनिंदा खिलाड़ियाें तक ही सीमित हुआ करती थीं, आज उसी खेल में हर भार वर्ग में भारतीय खिलाड़ी न सिर्फ पदक जीतने की क्षमता रखते हैं बल्कि आम तौर पर सोने के तमगे पर ही हाथ साफ करते हैं।
इसलिए माना जा रहा है कि ग्लासगो में भारतीय मुक्केबाजों की सफलता केवल पदकों तक सीमित नहीं है बल्कि यह भारतीय खेलों की बदलती तस्वीर का ट्रेलर है। भारतीय मुक्केबाजी की इस यात्रा को समझने के लिए हमें लगभग दो दशक पीछे जाना होगा, जब वर्ष 2008 में विजेंद्र सिंह ने ओलंपिक कांस्य पदक जीतकर देश के युवाओं में मुक्केबाजी के प्रति नई दिलचस्पी पैदा कर दी थी। उससे पहले महिला मुक्केबाजी में मैरी कॉम लगातार विश्व चैंपियन बनकर भारत का नाम रोशन कर चुकी थीं। इन दोनों खिलाड़ियों ने नये खिलाड़ियों में यह विश्वास जगाया कि भारतीय मुक्केबाज इस क्षेत्र में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों को चुनौती दे सकते हैं। इसी के बाद लवलीना बोरगोहेन, निखत जरीन, अमित पंघाल, शिव थापा, साक्षी चैधरी, निशांत देव और नई पीढ़ी के कई मुक्केबाजों ने इस विरासत को बखूबी आगे बढ़ाया।
हाल में सम्पन्न ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में भारतीय मुक्केबाजों ने जिस आत्मविश्वास के साथ रिंग में कदम रखा, वो उनकी मानसिक मजबूती का प्रमाण था। पहले भारतीय खिलाड़ी अकसर बड़े मुकाबलों में दबाव में आ जाते थे। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। आज भारतीय मुक्केबाज शुरुआत से ही मुकाबले को अपने नियंत्रण में करने की कोशिश करते हैं। उनका फुट वर्क तेज है, पंच सटीक हैं और डिफेंस पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत दिखायी देता है। यही कारण है कि अब विदेशी खिलाड़ी भी भारतीय मुक्केबाजों को हल्के में लेने की भूल नहीं करते। भारतीय मुक्केबाजी की सबसे बड़ी ताकत आज उसकी महिला ब्रिगेड है। मैरी कॉम ने जिस रास्ते की शुरुआत की थी, उसे निखत जरीन, लवलीना बोरगोहेन और नई पीढ़ी की महिला मुक्केबाजों ने बहुत मजबूती से आगे बढ़ाया है। चाहे विश्व चैंपियनशिप हो, चाहे एशियाई खेल हों, चाहे राष्ट्रमंडल खेल हों या अन्य अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं हों। भारतीय महिला मुक्केबाजों का प्रदर्शन लगातार बेहतर होता गया है।
यही वजह है कि अब भारत किसी भी बड़े टूर्नामैंट में विशेषकर महिला वर्ग में हर समय कई पदकों का मजबूत दावेदार माना जाता है। पुरुष वर्ग में भी तस्वीर तेजी से बदली है। विजेंद्र सिंह के बाद अमित पंघाल, शिव थापा और नई पीढ़ी के मुक्केबाजों ने साबित किया है कि एक या दो स्टार खिलाड़ियों पर भारत की मुक्केबाजी की ताकत निर्भर नहीं हैं। आज लगभग हर वर्ग में भारत के पास ऐसे मजबूत खिलाड़ी हैं, जो विश्व के किसी भी खिलाड़ी को चुनौती दे सकते हैं। यह किसी भी खेल महाशक्ति की सबसे बड़ी पहचान होती है। भारत की सफलता का एक महत्वपूर्ण कारण खेल विज्ञान यानी स्पोर्ट्स साइंस का बढ़ता उपयोग है। पहले खिलाड़ी केवल अभ्यास पर निर्भर रहते थे, लेकिन अब उनके प्रशिक्षण में वीडियो विश्लेषण, बायोमैकेनिक्स, स्पोर्ट्स साइकोलॉजी, न्यूट्रिशन और रिकवरी साइंस का व्यापक इस्तेमाल किया जा रहा है। भारतीय खेल प्राधिकरण, राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र और विदेशी प्रशिक्षकों के सहयोग ने खिलाड़ियों के प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार किया है। 
अब भारतीय मुक्केबाज केवल ताकत के बल पर नहीं बल्कि अपनी तकनीक की बदौलत भी मुकाबले जीत रहे हैं। ग्रास रूट स्तर पर मुक्केबाजी का विस्तार हुआ है। हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, असम और मणिपुर जैसे राज्यों में बॉक्सिंग अकादमियों का मजबूत नेटवर्क तैयार हुआ है। भारतीय सेना, रेलवे और विभिन्न सार्वजनिक उपक्रम भी प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को रोजगार और प्रशिक्षण उपलब्ध करा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के खिलाड़ी भी अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने लगे हैं। हालांकि चुनौतियां अभी समाप्त नहीं हुई हैं। देश के अनेक हिस्सों में आज भी विश्वस्तरीय बॉक्सिंग रिंग, आधुनिक उपकरण और प्रशिक्षित कोचों की कमी है। कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी पर्याप्त आर्थिक सहयोग न मिलने के कारण खेल छोड़ देते हैं। साथ ही प्रोफेशनल बॉक्सिंग का ढांचा अब भी भारत में उतना मजबूत नहीं है, जितना की यूरोप या अमरीका में है। यदि इन कुछ खामियों को छोड़ दें, तो भारतीय मुक्केबाजी दुनियावी मुक्केबाजी के सामने जबर्दस्त मजबूत दिखती है। 
आने वाले वर्षों में भारत की निगाहें मुक्केबाजी में लॉस एंजेल्स ओलंपिक में पदक जीतना है और अगर भारतीय मुक्केबाजों ने अमरीका में अपने पंच का जलवा बिखरने में सफल रहे, तो हम विश्व मुक्केबाजी में एक नई इबारत लिख सकते हैं।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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