आगरा की सैर
(क्रम जोड़ने के लिए पिछला रविवारीय अंक देखें)
वहां अगले कुछ सेकंड तक एक बहुत ही अजीब और भारी सन्नाटा पसरा रहा। हवा में जैसे तनाव जमे हुए बर्फ की तरह था। फिर मैंने देखा कि जो लोग अभी तक हमें अपना शिकार समझकर घेरकर खड़े थे, वे धीरे-धीरे अपने कदम पीछे हटाने लगे। उनके चेहरे पर अब पहले जैसा वह जालिम रौब बिल्कुल नहीं था। मूँछों वाला आदमी बिना एक भी शब्द कहे वहां से मुड़ा और तेजी से अंधेरे की तरफ बढ़ गया। उसे जाता देख बाकी के चारों लोग भी बिना कोई आवाज किए उसके पीछे-पीछे अंधेरे में खिसकने लगे। कुछ ही पलों में वे सब उस भयानक सन्नाटे में कहीं गायब हो गए। लेकिन वह गाइड, जो हमें इस मौत के कुएं तक लाया था, वह अब भी हमारे पास खड़ा था। उसकी वह मुस्कान अब पूरी तरह गायब हो चुकी थी और उसके चेहरे पर हवाईयां उड़ रही थीं। मगर वह अपनी जान बचाने के लिए बात को संभालने की कोशिश कर रहा था। वह हकलाते हुए बोला कि अरे साहब आप लोग तो बिल्कुल गलत समझ गए, यहां कोई खतरे वाली बात नहीं थी, हम तो बस आपको ताज दिखाने के लिए लाए थे, वे लोग तो बस ऐसे ही यहां से गुजर रहे होंगे। उसकी कांपती आवाज़ में उसका झूठ और उसकी घबराहट साफ दिखाई दे रही थी। तभी मेरी पत्नी ने मेरा हाथ और भी कसकर पकड़ लिया। उसकी उँगलियां बर्फ की तरह ठंडी पड़ चुकी थीं। वह रोने को हो रही थी और धीरे से फुसफुसाते हुए बोली कि यहां से इसी वक्त चलिए, यहां एक पल भी रुकना बिल्कुल ठीक नहीं है। मैं भी अच्छी तरह समझ गया था कि अब इस धोखेबाज आदमी से बहस करने का मतलब है किसी नए खतरे को दावत देना।
हम तुरंत वहां से मुड़े और बेहद तेज कदमों से नीचे मुख्य सड़क की तरफ उतरने लगे। हमारे भीतर इतना खौफ भरा था कि पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। रास्ते में सूखी पत्तियों की हर आहट और हवा के झोंके पर ऐसा लगता जैसे कोई पीछे से फिर हमारे ऊपर झपटने आ रहा है। वह रास्ता जो आते वक्त बहुत छोटा लगा था, अब खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। अंधेरे में हिलती हुई पेड़ों की परछाइयां भी अब किसी राक्षस जैसी डरावनी लग रही थीं। मेरी पत्नी पूरे रास्ते बिल्कुल चुप रही लेकिन उसकी सांसें बहुत तेज चल रही थीं।
कुछ दूर बेतहाशा चलने के बाद आखिरकार हमें मुख्य सड़क की वह पीली रोशनी दिखाई दी। वहां पहुंचकर हमने देखा कि दो तीन ऑटो रिक्शा खड़े हैं और कुछ लोगों की चहल पहल है। वह रोशनी देखकर हमारी जान में जान आई और दिल की धड़कन थोड़ी सामान्य होना शुरू हुई। हम बिना एक पल गंवाए अपने कार से होटल की तरफ निकल गए।
कार में बैठने के बाद भी मेरी पत्नी का शरीर लगातार कांप रहा था। मैंने उसे अपने करीब किया और उसका हाथ मजबूती से थाम लिया। कुछ देर बाद उसके सब्र का बांध टूट गया और उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। उसने रुंधे हुए गले से मुझसे पूछा कि अगर आज वहां सच में कुछ हो जाता तो हमारा और हमारे बच्चों का क्या होता।
उस खौफनाक सवाल का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैं बस चुपचाप कार की खिड़की से बाहर भागते हुए अंधेरे शहर को देखता रहा। मेरे मन के भीतर बार-बार वही भयानक दृश्य किसी फिल्म की तरह घूम रहा था। वह सुनसान गार्डन, वह चमकती हुई लाठियां, हमें घेरते हुए वे भारी कदम और वह खामोश कर देने वाला मौत का डर।
उस रात होटल के सुरक्षित कमरे में पहुंचने के बाद भी हम दोनों में से किसी को पल भर के लिए भी नींद नहीं आई। बाहर सड़क पर गुजरती हुई गाड़ियों की आवाजें रात भर सुनाई देती रहीं और हर छोटी सी आहट पर हमें ऐसा लगता जैसे कोई हमारे कमरे का दरवाजा खटखटा रहा हो या उसे तोड़ने की कोशिश कर रहा हो।
अगली सुबह जब आसमान में सूरज पूरी तरह से निकला और शहर में रोशनी फैली, तब जाकर हमारे मन का वह खौफ थोड़ा शांत हुआ। हम आखिरकार अपनी योजना के मुताबिक ताजमहल देखने गए। नीले आसमान के नीचे सफेद संगमरमर पर पड़ती हुई सुबह की वह सुनहरी धूप सचमुच बहुत अद्भुत और जादुई लग रही थी। वह नजारा स्वर्ग जैसा था, मगर पिछली रात का वह खौफनाक डर अब भी हमारे भीतर ज़िंदा था। मेरी पत्नी ने काफी देर तक ताजमहल की उस बेदाग खूबसूरती की तरफ देखते रहने के बाद बहुत ही धीमे स्वर में कहा कि ज़िंदगी भी कितनी अजीब है, कभी-कभी इंसान दुनिया की सबसे नायाब खूबसूरती देखने निकलता है और अचानक उसे दुनिया का सबसे घिनौना और डरावना चेहरा देखने को मिल जाता है। मैंने उसकी इस गहरी बात को सुना और पूरी तरह सहमत होते हुए बस चुप रहा।
आज इस भयानक घटना को बीते हुए कई साल हो चुके हैं। हमारी ज़िंदगी फिर से अपनी उसी पुरानी रफ्तार से चल पड़ी है। लेकिन आज भी जब कभी उस रात का जिक्र होता है या वह मंजर याद आता है, तो मेरी रूह भीतर तक कांप उठती है। मैं अक्सर अकेले में बैठकर यह सोचता हूँ कि अगर उस खौफनाक पल में मेरे दिमाग में खुद को फौज से जुड़ा हुआ बताने का वह विचार न आया होता, तो शायद वे बेरहम लोग हमें अपना बहुत आसान शिकार समझकर न जाने हमारा क्या हश्र करते। उस रात मैंने मौत के डर को इतने करीब से नहीं देखा था, जितना यह महसूस किया था कि हमारे देश में भारतीय फौज की वर्दी सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि आम नागरिकों के लिए अटूट विश्वास का दूसरा नाम होता है। यह वह सम्मान है, जिसके सामने अपराधी भी थर्रा उठते हैं। कई बार यही वर्दी किसी बेबस इंसान के लिए सबसे मजबूत, सबसे अभेद्य ढाल बन जाती है। (समाप्त) (सुमन सागर)



