नये कानून से विदेशी फंड देने और लेने वालों पर लगेगा अंकुश
पैसे के नियामक हर कानून आखिरकार दो सवालों का जवाब देता है, किसे देने की इजाज़त है और किसे (जो मिलता है) उसे रखने की इजाज़त है। भारत का विदेशी योगदान (विनियमन) संशोधन (एफ सीआरए) विधेयक-2026, जिसे मार्च में लोकसभा में पेश किया गया था और 12 अगस्त को संसद में विचार-विमर्श के लिए तय किया गया है, दोनों सवालों का जवाब बहुत ज़्यादा सख्ती से देता है। यह सिर्फ दानदाताओं से यह बताने के लिए नहीं कहता कि उनका पैसा कहां जाता है, बल्कि यह पाने वालों से हमेशा के लिए यह साबित करने के लिए कहता है कि वे अभी भी इसे रखने के हकदार हैं, और यह एक सरकारी अधिकार सृजित करता है जिसे दान का पैसा ले लेने का अधिकार है, और अगर वे ऐसा नहीं कर सकते तो उससे बने स्कूल, अस्पताल और चर्च सम्पत्ति को भी।
यही इस विधेयक में असली नवाचार है, और इसीलिए दिल्ली में बहस एनजीओ पारदर्शिता पर आम बहस से कहीं आगे बढ़कर एक ज़्यादा मुश्किल सवाल पर आ गई है। जब सरकार खुद को धन के हस्तांतरण में स्थायी तीसरे पक्ष के तौर पर शामिल कर लेती है, तो दान दाता और प्राप्त कर्ता के बीच के रिश्ते का क्या होता है? दाताओं—ओहायो में एक फाउंडेशन, दुबई में एक डायस्पोरा मलयाली, रोम में एक डायोसीज के लिए एफ सीआरए कभी भी कोई बड़ी रुकावट नहीं रहा है। यह अधिनियम भारतीय दान प्राप्तकर्ताको विनियमित करता हैए विदेशी भेजने वाले को नहीं। लेकिन वर्तमान संशोधनपरोक्ष और शक्तिशाली तरीके से धन देने के गणित को बदल देता है।
आज एक दानकर्ता जो किसी भारतीय ट्रस्ट को चेक लिख रहा है, वह सिर्फ एक हॉस्पिटल विंग या बाढ़ राहत अभियान को फंड नहीं कर रहा है। वे एक ऐसी सम्पदा को फंड कर रहे हैं, जिसे अगर प्राप्तकर्ता संगठन कभी अपना एफ सीआरए लाइसेंस खो देता है या उसका नवीकरण करने में विफल हो जाता है — लापरवाही, कागजी काम में चूक या राजनीतिक रूप से असुविधाजनक स्थिति के कारण, तो सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकृत अधिकारी को स्थायी तौर पर दिया जा सकता है। पीआरए विधायी अनुसंधान विश्लेषण इस बिंदु पर साफ है—एफ सीआरए प्रणाली से असल में कोई साफ निकासी नहीं है, क्योंकि समर्पण करने या निबंधन खोने पर वही सम्पदा-नष्ट होना नतीजा होता है जो गलत काम करने पर सीधे रद्द करने पर होता है। एक फाउंडेशन जिसने दशकों तक एक ग्रामीण अस्पताल बनाया, वह इसे प्रशासनिक गलती के कारण राज्य के अधीन जाते हुए देख सकता है, अपराध के कारण नहीं।
यह जोखिम दान दाता के व्यवहार को बदल देता है। पश्चिमी फाउंडेशन, जो कभी भारत को फि लैंथ्रोपिक कैपिटल के लिए एक स्थिर, कानून का राज वाला न्याय क्षेत्र मानते थे, अब तेज़ी से वही राजनीतिक जोखिम का विश्लेषण कर रहे हैं जो वे कमज़ोर राज्यों पर लागू करते हैं, न सिर्फ यह पूछ रहे हैं कि क्या कोई अनुदान आज वैध है, बल्कि यह भी कि क्या पाने वाले का सम्पदा आधार एक दशक बाद सुरक्षित रहेगा? पाने वाले के लिएए दांव ज़्यादा तुरंत और ज़्यादा निजी हैं। विधेयक मुख्य कार्य प्रभारियों—न्यासी, निदेशक और कार्यसमिति के सदस्य, की परिकल्पना लाता है, जिन्हें अब विदेशी पैसे के इस्तेमाल के तरीके के लिए व्यक्तिगत रूप से ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है, जिससे अनुपालन का बोझ और बढ़ जाता है जो पहले ज़्यादातर संस्था पर पड़ता था। अब केस चलाने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी ज़रूरी है, जिसे सरकार राज्य स्तर पर बहुत ज़्यादा परेशान करने से बचाने के लिए एक सुरक्षा कवच के तौर पर देखती है, लेकिन आलोचक इसे इस तरह देखते हैं कि यह तय करने का अधिकार केंद्र के पास है कि किसे बचाया जाए और किसे सताया जाए।
सरकार का तर्क, जिसे गृह मंत्री अमित शाह ने बार-बार कहा है, यह है कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा की ज़रूरत है, चैरिटी या दान पर हमला नहीं। गृह मंत्रालय के अंदर चिंता खास है कि विदेशी चंदा कई बार कट्टर नेटवर्क, अलगाववादी आंदोलनों और ऐसे संगठनों की ओर मोड़ा गया है जो असल में विदेशी हितों के अनिबंधिक एजेंट के तौर पर काम करते हैं। मार्च के आखिर तक लगभग 21,933 संगठनों ने अपने एफ सीआरए लाइसेंस खो दिए थे, जिनमें ज़्यादातर वे थे जो अल्पसंख्यक अधिकारों, बोलने की आज़ादी और पर्यावरण समर्थन पर काम कर रहे थे—एक ऐसा रूझान जिसे सरकार काम करने का सुबूत मांगना मानती है, और आलोचक इसे असहमति पर डरावने असर का सुबूत मानते हैं।
पाकिस्तान का ‘इकोनॉमिक अफेयर्स डिवीज़न’ पैसा जारी होने से पहले हर विदेशी ग्रांट की सुरक्षा और अलग-अलग एजेंसियों से मंजूरी लेता है। बांग्लादेश का ‘एनजीओ अफेयर्स ब्यूरो’ संवैधानिक संस्थाओं के बारे में ‘अपमानजनक’ बयान देने पर निबंधन रद्द कर सकता है, जो भारतीय कानून के किसी भी प्रावधान की तुलना में बहुत ज़्यादा व्यापक और मनमाना आधार है। कुल मिलाकर बात यह है कि यह कानून सिर्फ पैसे के लेन-देन को नियंत्रित करने के बजाय भरोसे को नए सिरे से परिभाषित करता है। दान देने वालों को अब ऐसे संस्थागत जोखिमों पर भी विचार करना होगा जिनके बारे में उन्हें पहले कभी नहीं सोचना पड़ा था। दान लेने वालों को निबंधन नवीकरण की हर समय-सीमा को केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व से जुड़ी बात मानना होगा।
विधेयक की किसी भी एक धारा से ज़्यादा, यही सवाल तय करेगा कि भारत में विदेशी परोपकारी गतिविधियां बढ़ेंगी या चुपचाप सिमट जाएंगी। (एजेंसी)



