नागासाकी के धुएं से उठता शांति का संदेश
9 अगस्त मानव इतिहास का वह दिन है, जिसने युद्ध, विज्ञान और मानवता के संबंधों को हमेशा के लिए बदल दिया। 9 अगस्त 1945 को सुबह 11 बजकर 1 मिनट पर अमरीका के बी-29 बॉम्बर बॉक्सकार से जापान के बंदरगाह नगर नागासाकी पर ‘फैट मैन’ नामक प्लूटोनियम-239 परमाणु बम गिराया गया। कुछ ही सैकेंड में एक जीवंत औद्योगिक और सांस्कृतिक नगर धधकते मलबे में बदल गया। हजारों लोग तत्काल मारे गए और आने वाले वर्षों में विकिरण के कारण हजारों अन्य लोगों ने असमय दम तोड़ दिया। नागासाकी केवल एक शहर नहीं था बल्कि वह क्षण था, जिसने पूरी मानव सभ्यता को यह अहसास कराया कि विज्ञान का दुरुपयोग मानव अस्तित्व को ही संकट में डाल सकता है। आज 81 वर्ष बाद भी जब दुनिया परमाणु हथियारों के विशाल जखीरे, बढ़ती सामरिक प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय युद्धों की आशंकाओं के बीच खड़ी है, तब नागासाकी दिवस केवल एक ऐतिहासिक स्मृति नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए गंभीर चेतावनी है।
नागासाकी की त्रासदी को समझने के लिए द्वितीय विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि पर दृष्टि डालना आवश्यक है। यूरोप में जर्मनी की पराजय के बाद भी प्रशांत क्षेत्र में जापान और मित्र राष्ट्रों के बीच युद्ध जारी था। जापान लगातार सैन्य प्रतिरोध कर रहा था और आत्मसमर्पण के लिए तैयार नहीं था। जुलाई 1945 में पॉट्सडैम घोषणा के माध्यम से मित्र राष्ट्रों ने जापान से बिना शर्त आत्मसमर्पण की मांग की किंतु जापान ने इसे स्वीकार नहीं किया। इसी दौरान अमरीका की मैनहट्टन परियोजना के अंतर्गत विकसित परमाणु हथियारों के प्रयोग का निर्णय लिया गया। अमरीकी प्रशासन का तर्क था कि इस कदम से युद्ध शीघ्र समाप्त होगा और मित्र राष्ट्रों के लाखों सैनिकों का जीवन बचेगा। दूसरी ओर अनेक इतिहासकारों का मानना है कि यह निर्णय केवल सैन्य रणनीति नहीं था बल्कि युद्धोत्तर विश्व व्यवस्था में अमरीकी प्रभुत्व स्थापित करने और सोवियत संघ के सामने अपनी सामरिक क्षमता प्रदर्शित करने का भी प्रयास था। यही कारण है कि नागासाकी की घटना आज भी इतिहास, राजनीति और नैतिक दर्शन के सबसे विवादास्पद अध्यायों में गिनी जाती है।
9 अगस्त 1945 को नागासाकी अमरीका का प्राथमिक लक्ष्य नहीं था। उस दिन अमरीकी बी-29 बमवर्षक विमान ‘बॉक्सिकार’ का पहला लक्ष्य जापान का कोकुरा नगर था लेकिन वहां धुंध, बादलों और धुएं के कारण लक्ष्य स्पष्ट दिखाई नहीं दिया। कई प्रयासों के बादए ईंधन की कमी और वायु-रक्षा के खतरे को देखते हुए विमान ने द्वितीयक लक्ष्य नागासाकी का रुख किया। लगभग 21 किलोटन क्षमता वाले प्लूटोनियम बम ‘फैट मैन’ का विस्फोट धरती से करीब 500 मीटर ऊपर हुआ। विस्फोट के केंद्र के नीचे धरातल का तापमान अनुमानत: 3000 से 4000 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। भीषण दबाव-तरंग, अग्निकांड और विकिरण ने शहर के बड़े हिस्से को तबाह कर दिया। 1945 के अंत तक नागासाकी में लगभग 70 से 75 हजार लोगों की मृत्यु हो चुकी थी, आधिकारिक जापानी अभिलेखों में 73884 मृतकों का आंकड़ा दर्ज है। हजारों मकान, विद्यालय, अस्पताल, कारखाने और धार्मिक स्थल जल गए या ध्वस्त हो गए। शहर के लगभग 40 प्रतिशत भवन पूरी तरह नष्ट या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुए, हालांकि नागासाकी की पहाड़ी भौगोलिक संरचना के कारण विनाश का प्रभाव शहर के सभी हिस्सों में समान नहीं था। यह केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी बल्कि मानव जीवन, संस्कृति और सभ्यता पर ऐसा आघात था, जिसकी प्रतिध्वनि आज भी सुनाई देती है। इस त्रासदी का सबसे भयावह पक्ष तत्काल हुई मृत्यु नहीं बल्कि उसके दीर्घकालिक दुष्प्रभाव थे। विकिरण से प्रभावित लोगों (जिन्हें जापान में हिबाकुशा कहा जाता है) को जीवनभर शारीरिक और मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ी। ल्यूकेमिया, थायरॉयड कैंसर, स्तन कैंसर, फेफड़ों के कैंसर, मोतियाबिंद, प्रतिरक्षा तंत्र की कमजोरी तथा जन्मजात विकृतियों जैसी अनेक गंभीर समस्याएं वर्षों तक सामने आती रही। विकिरण का प्रभाव अगली पीढ़ियों तक महसूस किया गया। हजारों परिवार सामाजिक भेदभाव का भी शिकार बने क्योंकि लोगों में यह भ्रम था कि विकिरण से प्रभावित व्यक्तियों की संतानें सामान्य नहीं होंगी। इस प्रकार नागासाकी की त्रासदी केवल एक युद्धकालीन घटना नहीं रही बल्कि पीढ़ियों तक चलने वाली मानवीय पीड़ा का पर्याय बन गई।
परमाणु बम के प्रयोग की नैतिकता पर विश्व आज भी दो मतों में विभाजित है। कुछ इतिहासकारों का तर्क है कि यदि परमाणु बम का प्रयोग न किया जाता तो जापान पर पारंपरिक सैन्य आक्रमण में लाखों सैनिक और नागरिक मारे जाते तथा युद्ध लंबा खिंचता। इसके विपरीत अनेक विद्वान, शांति कार्यकर्ता और अंतर्राष्ट्रीय कानून के विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी परिस्थिति में निर्दोष नागरिकों को इस स्तर पर निशाना बनाना न्यायोचित नहीं कहा जा सकता। उनके अनुसार नागासाकी यह सिद्ध करता है कि आधुनिक युद्धों में सबसे बड़ी कीमत हमेशा आम नागरिकों को चुकानी पड़ती है। यही कारण है कि नागासाकी आज केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं बल्कि युद्ध की नैतिक सीमाओं पर चल रही वैश्विक बहस का स्थायी प्रतीक बन चुका है।
नागासाकी पर बमबारी के कुछ ही दिनों बाद जापान ने आत्मसमर्पण की प्रक्रिया शुरू कर दी। 15 अगस्त 1945 को सम्राट हिरोहितो ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए युद्ध समाप्त करने की घोषणा की और 2 सितंबर 1945 को औपचारिक आत्मसमर्पण के साथ द्वितीय विश्वयुद्ध का समापन हुआ। युद्ध के बाद जापान ने अपने संविधान के अनुच्छेद 9 के माध्यम से युद्ध का परित्याग किया और शांतिवाद को राष्ट्रीय नीति का आधार बनाया। आज जापान परमाणु निरस्त्रीकरण, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और वैश्विक शांति का सबसे मुखर समर्थक देशों में गिना जाता है। नागासाकी इस परिवर्तन का जीवंत प्रतीक है, जहां विनाश की स्मृति ने शांति की संस्कृति को जन्म दिया। विडंबना यह है कि जिस परमाणु बम से दुनिया को युद्ध समाप्त होने की उम्मीद थी, उसी ने शीत युद्ध और परमाणु हथियारों की वैश्विक होड़ की शुरुआत भी कर दी। अमरीका के बाद सोवियत संघ ने भी अपना परमाणु हथियार कार्यक्रम तेज किया और देखते ही देखते महाशक्तियों के बीच परमाणु प्रतिस्पर्धा आरंभ हो गई।
नागासाकी दिवस केवल शोक का नहीं बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी है। यह दिन उन हजारों निर्दोष लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित करता है, जिन्होंने परमाणु हमले में अपने प्राण गंवाए, साथ ही उन हिबाकुशा की पीड़ा को भी दुनिया के सामने लाता है, जिन्होंने जीवनभर विकिरण के दंश को सहा। नागासाकी की स्मृति संयुक्त राष्ट्र के परमाणु निरस्त्रीकरण प्रयासों, परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी), व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी) और परमाणु हथियार निषेध संधि जैसे वैश्विक प्रयासों के महत्व को भी रेखांकित करती है। यद्यपि पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण अभी दूर का लक्ष्य है, फिर भी संवाद, पारदर्शिता, विश्वास निर्माण और हथियार नियंत्रण ही स्थायी शांति का वास्तविक मार्ग हैं। नागासाकी की राख से उठने वाला सबसे बड़ा संदेश यही है कि युद्ध किसी भी समस्या का अंतिम समाधान नहीं हो सकता। शक्ति का वास्तविक अर्थ विनाश की क्षमता नहीं, मानव जीवन की रक्षा और शांति स्थापित करने की क्षमता है। यदि विश्व ने नागासाकी की त्रासदी से सबक नहीं सीखा तो भविष्य का कोई भी परमाणु संघर्ष किसी एक देश का नहीं, पूरी मानव सभ्यता का अंत सिद्ध हो सकता है। नागासाकी दिवस वह दिन है, जो हमें बार-बार याद दिलाता है कि मानवता का सुरक्षित भविष्य हथियारों के विस्तार में नहीं, विश्वास, संवाद, सह-अस्तित्व और स्थायी विश्वशांति की स्थापना में निहित है।





