नटखट टिन्नी
टिन्नी की शरारतों से तंग, उसकी मां बोली, ‘टिन्नी तुम कभी शान्त भी बैठ सकती हो या नहीं!’
बस, बिना कुछ उत्तर दिए टिन्नी चुपचाप बैठ गई खाट पर।
मां उस समय रसोई में खाना बना रही थीं। अचानक टिन्नी जोर से चीखी ‘मां बचाओ, मेरी उंगली।’ मां बाहर आयी-देखा टिन्नी ने अपनी उंगली खाट की रस्सियों के बीच फंसा ली थी। वह जोर लगा रही थी किन्तु उंगली नहीं निकल रही थी। मां ने एक डंडी की सहायता से रस्सी अलग-अलग की और टिन्नी की उंगली बाहर आ गई।
उंगली दबने से उसमें बहुत दर्द हो रहा था। मां ने दवाई लगाई और उसे अपने पास रसोई में ही बिठा लिया।
टिन्नी ने रसोई में रखा गैस लाइटर उठाया और उसे चलाकर चटर-पटर करने लगी। अचानक लाइटर की चिंगारी उसी जगह लगी जहां अभी दवाई लगाई थी, वह फिर रोने लगी।
टिन्नी तीन साल की प्यारी सी नटखट लड़की है। नटखट इतनी कि हर समय शैतानी के नए-नए काम करती रहती है।
कल की ही बात लो। उसने सोते हुए अपने पापा की नाक में धागा डाल दिया। अचानक जोर की छींक के साथ पापा जाग उठे। वह अब मां को डांट रहे थे- पकड़ नहीं सकती हो इसे। सोने भी नहीं देती।
ऐसे ही एक दिन टिन्नी ने फर्श पर रेंगते हुए मकोड़े को पकड़ लिया। मकोड़ा उसकी हथेली पर कभी आगे कभी पीछे चक्कर काटता रहा। जब वह ज्यादा परेशान हुआ तो उसने काट लिया। टिन्नी रोने लगी। उसने मकोड़े को दूसरे हाथ से मसल दिया।
उसकी शैतानी के बहुत किस्से हैं। वह है तो छोटी किन्तु शैतानी बड़ी-बड़ी करती है। पड़ोस वाली आंटी अपने घर ले गईं तो उनके कुत्ते के कान खींचने लगी। पिंजरे में बैठे मिट्ठू की पूंछ खींच डाली।
उस दिन तो ज्यादा ही शरारत कर बैठी जब दादी मां ने तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाया और टिन्नी नज़र बचाकर वह दीपक गिरा आई। पास ही रखे भूसे के ढेर ने आग पकड़ ली।
वो तो मां ने देख लिया, आग बुझा दी गई वरना बहुत बड़ा नुकसान हो जाता। पापा ने तो खूब डांटा उसे परन्तु दादी मां ने अपने आंचल में छिपा लिया था टिन्नी को।
आज जब टिन्नी की उंगली खाट में भिंच गई फिर लाइटर से खेलते जली तो दादी ने भी आंखें दिखाई टिन्नी को। क्यों री, शैतान की नानी, बाज नहीं आएगी हरकतों से। देख मान जा वरना...। वरना कहकर दादी चुप हो गई।
नन्हीं टिन्नी वरना सुन सन्न रह गई। जब से उसने देखा कभी दादी ने नहीं डांटा। आज की डांट और ‘वरना’ ने उसे हैरान कर दिया।
दोपहर का समय था। दादी धूप सेंक रही थी। टिन्नी ने पूछा ‘वरना’ क्या दादी? ‘मैं तेरी दादी नहीं बनूंगी टिन्नी।’ दादी ने तुरन्त कहा।
अच्छा मैं शरारत नहीं करूंगी दादी, कहते हुए टिन्नी उनकी गोद में बैठ गई। फिर थोड़ी देर शांत रही और अचानक चीखी-दादी ‘छिपकली’। दादी चौंक पड़ी। टिन्नी गोदी से उठकर ताली बजाने लगी- दादी डर गई, दादी डर गई। दादी ने उसे पकड़ा और कमर पर धौल जमाते हुए उसे पुचकारा। नटखट टिन्नी। अब दोनों हंस पड़े। टिन्नी अपना दर्द भूल गई। (उर्वशी)



