पाक, तुर्की और सऊदी अरब समझौते पर भारत का पक्ष
हालांकि सऊदी अरब व तुर्की अमरीका के सहयोगी हैं, लेकिन दोनों के बीच प्रतिद्वंद्विता व खराब संबंध 1814 यानी उस्मानिया खिलाफत से ही चले आ रहे थे और पश्चिम एशिया में अपने-अपने प्रभाव के विस्तार के चक्कर में इस कटुता में विस्तार ही हुआ, विशेषकर इसलिए कि तुर्की ने 2010-2011 के अरब बसंत प्रदर्शनों का समर्थन किया, जिसे सऊदी अरब ने राजनीतिक स्थिरता के लिए खतरा माना। दोनों देशों के संबंधों में अतिरिक्त खटास इस वजह से भी आयी कि 2018 में इस्तांबुल स्थित सऊदी दूतावास में विद्रोही पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या की गई और फिर अनेक क्षेत्रीय टकरावों, खासकर लीबिया व सीरिया से संबंधित, में सल्तनत व गणराज्य ने एक-दूसरे को आमने-सामने वाली बेंचों पर पाया। लेकिन हाल के वर्षों में प्रतिद्वंद्विता की यह बर्फ पिघलने लगी है; क्योंकि पश्चिम एशिया में संतुलन में परिवर्तन होने लगा है।
इस पृष्ठभूमि में सऊदी अरब व तुर्की ने 7 अगस्त, 2026 को अपने संबंधों में एक नया अध्याय जोड़ा, औपचारिक रूप से त्रिपक्षीय रक्षा समझौता करके, जिसमें तीसरा पार्टनर पाकिस्तान है। पवित्र शहर मक्का में किये गये मक्का समझौते पर सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैय्यब इर्दोगान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने हस्ताक्षर किये हैं। तीनों देशों ने आपस में ‘सामूहिक रक्षा’ व ‘सामूहिक प्रतिरोध’ को मज़बूत करने का वायदा किया है और साथ ही एक पर किये गये हमले को तीनों पर किये गये हमले के रूप में देखा जायेगा। नाटो-शैली का यह सामूहिक सुरक्षा समझौता तीन प्रमुख मुस्लिम-बहुल देशों को साथ लाया है— एक परमाणु हथियारों से लैस दक्षिण एशिया का देश है, एक तेल से भरी फारस की खाड़ी की सल्तनत है और एक नाटो का सदस्य है, जो पश्चिम एशिया व यूरोप के बीच की कड़ी भी है। पश्चिम एशिया ने इस किस्म का समझौता पहले कभी नहीं देखा है।
गौरतलब है कि सितम्बर 2025 में पाकिस्तान व सऊदी अरब ने स्ट्रेटेजिक म्यूच्यूअल डिफेंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किये थे, जिसके तहत एक पर हमले को दोनों पर हमला माना जायेगा। सऊदी-पाकिस्तान समझौता दो स्पष्ट संकेत दे रहा था- एक, सऊदी अरब की स्ट्रेटेजिक कमज़ोरी गहरी होती जा रही है। दो, पाकिस्तान विस्फोटक क्षेत्र में बड़ी सुरक्षा भूमिका निभाने का इच्छुक है। अब इसमें तुर्की को शामिल करके स्ट्रेटेजिक गहराई और सैन्य ताकत में अतिरिक्त मज़बूती लाने का प्रयास है। दरअसल, समझौते में शामिल हर सदस्य अपनी-अपनी ताकत और कमज़ोरी साथ लेकर आ रहा है। पाकिस्तान मुस्लिम संसार की एकमात्र परमाणु शक्ति है, लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था तैरते रहने के लिए संघर्ष कर रही है। सऊदी अरब संसार के सबसे बड़े तेल निर्यातकों में से एक है। उसके पास पैसा है, लेकिन उसके समक्ष ज़बरदस्त सुरक्षा चुनौती है, विशेषकर ईरान व हूती संगठन से। तुर्की ने बहुत तेज़ी से अपने सैन्य औद्योगिक बेस का विस्तार किया है, जिनमें एडवांस्ड ड्रोन-उत्पादन क्षमताएं भी शामिल हैं, लेकिन उसे पड़ोस में इज़रायल की बढ़ती सैन्य ताकत की चिंता है।
सऊदी अरब 1940 के दशक से ही अमरीका का करीबी सहयोगी है। अपनी सुरक्षा के लिए वह अमरीका पर निर्भर है, जबकि बदले में वह अबाधित तेल सप्लाई का वायदा किये हुए है। लेकिन हाल के वर्षों में इस समझौते की बुनियाद हिल गई क्योंकि पूर्वी एशिया में चीन के निरंतर बढ़ते कदमों के कारण अमरीका ने पश्चिम एशिया को वरीयता देना कम कर दिया है। जब 2019 में ईरान-समर्थित हूतियों ने सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हमला किया तो अमरीका की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। इसने सऊदी अरब को अमरीकी सुरक्षा छाते से इतर देखने के लिए मजबूर किया। चीन की मध्यस्थता से सऊदी अरब ने 2023 में ईरान से अपने संबंध सामान्य करने का समझौता किया लेकिन सऊदी अरब की सुरक्षा चिंताएं बढ़ने लगीं जब इज़रायल ने 2023 में ही गाज़ा में नरसंहार करना और लेबनान पर बमबारी करनी शुरू कर दी। फिर अमरीका व इज़रायल ने 28 फरवरी, 2026 को ईरान के खिलाफ बेमतलब व बेमकसद का युद्ध छेड़ दिया और वह भी ऐसे समय जब अमरीका व ईरान जिनेवा में समझौता करने के बहुत करीब थे। जवाब में तेहरान ने सऊदी अरब सहित खाड़ी के सभी अरब देशों में स्थित अमरीकी सैन्य बेसों पर हमले करने शुरू कर दिये। चूंकि अमरीका अपने ही बेस नहीं नहीं बचा पा रहा था, इसलिए रियाद को यकीन हो गया कि वाशिंगटन की सुरक्षा गारंटी में कोई खास दम नहीं है। उसे अपनी सुरक्षा की व्यवस्था स्वयं ही करनी होगी।
तुर्की लम्बे समय से पश्चिम एशिया में बड़ी सुरक्षा भूमिका निभाने का इच्छुक रहा है। उसने कतर से गहरे संबंध स्थापित किये हुए हैं, जहां उसके सैनिक भी तैनात हैं। सऊदी अरब से समझौता करके अंकारा को इस क्षेत्र में विस्तृत स्ट्रेटेजिक स्पेस मिल जायेगी। तुर्की की अपनी सुरक्षा चिंताएं भी हैं। इज़रायल एयर स्ट्राइक्स व घुसपैठ के ज़रिये अपनी भूमिका का विस्तार करने में लगा हुआ है, जिसकी वजह से अंकारा का मानना है कि भविष्य के आशंकित टकराव के लिए उसे तैयार रहना चाहिए। हालांकि तुर्की नाटो का सदस्य है, लेकिन अंकारा को शक है कि अमरीका के सबसे करीबी सहयोगी इज़रायल से टकराव की स्थिति में नाटो की सामूहिक सुरक्षा गारंटी कोई काम आयेगी। मक्का समझौते का तीसरा एक्टर पाकिस्तान अपने साथ भारत से ‘दुश्मनी’ को लेकर आता है। पहलगाम में आतंकी हमले के बाद मई 2025 में पाकिस्तान व भारत के बीच संक्षिप्त हवाई युद्ध हुआ था। नई दिल्ली का कहना है कि उसकी धरती पर जो आतंकी वारदातें होती हैं, उनके लिए पाकिस्तान ज़िम्मेदार है।
बहरहाल, त्रिपक्षीय समझौते व उसके सामूहिक सुरक्षा प्रावधान का अर्थ आवश्यक रूप से यह नहीं है कि पाकिस्तान ईरान या हूती से युद्ध करने लगेगा या भविष्य के भारत-पाक टकराव में तुर्की कूद जायेगा। जब सितम्बर 2025 में सऊदी-पाक समझौता हुआ था तो उसके बाद अनेक बार पाकिस्तान का तालिबान-शासित अफगानिस्तान से टकराव हुआ, जबकि सऊदी अरब पर हूती व ईरान के हमले हुए, लेकिन किसी भी देश ने दूसरे की तरफ से सैन्य हस्तक्षेप नहीं किया। इसलिए इस समझौते के सामूहिक रक्षा वायदे की व्यवहारिकता पर हमेशा प्रश्न खड़े रहेंगे। जब इन तीनों देशों के बीच रक्षा व सैन्य सहयोग बढ़ेगा तो पश्चिम एशिया में अमरीका का प्रभाव कम हो जायेगा। ऐसे में पश्चिम एशिया में तुर्की व पाकिस्तान का दखल बढ़ जायेगा। इससे अन्य छोटे राज्य भी इसमें शामिल होने के लिए प्रेरित हो सकते हैं। दूसरी ओर संतुलन हेतु भारत, यूएई, इज़रायल व ईरान भी अपनी-अपनी ऐसी अलग व्यवस्थाएं कर सकते हैं। इस सबको देखते हुए पश्चिम एशिया की सुरक्षा संरचना में इस समझौते से ज़बरदस्त बदलाव आना संभव है।
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