युवाओं में थकान और तनाव की नई बीमारी
आजकल जिसे देखो वह युवाओं को बढ़-चढ़कर ज्ञान देने लगा है। ज्ञान से युवाओं की समस्याएं खत्म होने वाली नहीं है। ज़रुरत है युवाओं में बढ़ रहे तनाव और थकान की वजह खोजकर समाधान की। युवाओं में तनाव की वजह से कम उम्र में ही युवा अवसाद के शिकार होने लगे हैं। खासतौर से काम करने वाले युवा यानि जो नौकरी कर रहे हैं, उनके अंदर ठहराव, लगन और काम के लिए जोश बहुत कम है। जरा-जरा सी बातों पर तनाव लेने लगते हैं। हाल की में हुए एक अध्ययन में भी ऐसे ही आंकड़े सामने आए हैं, जिनमें 25 साल के युवा कर्मचारियों में से 90 प्रतिशत का मन और दिमाग बेचैन पाया गया है। जिसकी वजह से कई बार अपने आप को हानि पहुंचाने तक के ख्याल इनके मन में आने लगते हैं। तनाव और अवसाद से बचने के लिए सबसे पहले स्वस्थ जीवनशैली अपनाई जानी चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से बचने के लिए अच्छी नींद लेना बहुत ज़रूरी है। रात में 6-8 घंटे की नींद से कई विकारों को दूर किया जा सकता है। ऑफिस आफ नेशनल स्टैटिस्टिक्स (ओएनएस) के ताज़ा सर्वे में देशवासियों को युवाओं में थकान और तनाव को नज़रअंदाज़ करने पर सचेत किया है। सर्वे में यह बात सामने आई है कि आज का युवा वर्ग चिन्ता (एंग्जायटी) का सबसे ज्यादा शिकार है। यह समस्या न केवल व्यक्तिगत खुशियों को छीन रही है, बल्कि इसके कारण अर्थव्यवस्था को भी करोड़ों के कार्य दिवसों का नुकसान हो रहा है। आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम लोग थकान और तनाव को सामान्य मानकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं, लेकिन ओएनएस के ताज़ा सर्वे में बताया गया है कि एक खास पीढ़ी के लगभग आधे लोग एक ही तरह की मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे हैं। ताज़ा आंकड़ों के अनुसार 1997 से 2010 के बीच पैदा हुए लगभग आधे लोग एक ही तरह की मानसिक स्थिति का सामना कर रहे हैं। सर्वेक्षण में पाया गया कि 16 से 29 वर्ष की आयु के लगभग 43 प्रतिशत युवाओं ने चिन्ता के उच्च स्तर की शिकायत की है, जबकि अन्य वयस्कों के लिए यह आंकड़ा 33 प्रतिशत है। इस स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चिन्ता (एंग्जायटी) को कम करने के लिए लोग काम से छुट्टियां ले रहे हैं, जिससे देश भर में लाखों कार्य दिवस का भारी नुकसान हो रहा है।
आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में काम का दबाव और समय का प्रबंधन हम पर इस कदर हावी हो चुके हैं कि हमारा मानसिक स्वास्थ्य गड़बड़ा रहा है। सोशल मीडिया के बारे में यह कहा जाता है यह प्लेटफॉर्म शैक्षिक मनोरंजन और ज्ञान विज्ञानं का बड़ा साधन है। वहीं यह कहने वाले भी कम नहीं है कि सोशल मीडिया की लत से यवा वर्ग मानसिक तनाव, डिप्रेशन, नींद की दिक्कतस गुस्सा जैसी समस्याओं का शिकार हो रहा है। सोशल मीडिया के चलते बच्चों और युवाओं में सामाजिक दिखावे की प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ रही है। अनेक अध्ययनों में यह खुलासा हुआ है कि मानसिक तनाव का एक मुख्य कारक सोशल मीडिया भी है। सोशल मीडिया ने युवाओं को अपनी चपेट में ले लिया है। युवाओं के हाथों में हर समय मोबाइल देखा जा सकता है। दिनभर मोबाइल के प्रयोग से मानसिक स्वास्थ्य गड़बड़ाने लगा है। आज बच्चे से बुजुर्ग तक मानसिक बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं।
मानसिक स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए ज़रूरी है कि शारीरिक रूप से सक्रिय रहें। शारीरिक गतिविधि की कमी के कारण गुड हार्मानसेरोटोनिन का रिलीज़ होना कम हो जाता है, जो सीधे तौर पर मूड को ठीक रखने के लिए आवश्यक है। इसका हमारे शरीर पर बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इससे शरीर में लचीलापन बढ़ता है, रक्त प्रवाह बढ़ता है और इससे मूड सुधरने लगता है। हर दिन केवल 30 मिनट पैदल चलने से आपके मूड को बेहतर बनाने और आपके स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है। काम से समय निकाल कर प्रतिदिन कसरत करें। मन को शांत रखने के लिए योग बेहतरीन अभ्यास है। संतुलित आहार और भरपूर पानी पूरे दिन आपकी एनर्जी और फोकस में सुधार कर सकता है। कोल्ड ड्रिंक या कॉफी जैसे कैफीनयुक्त ड्रिंक्स का सेवन सीमित करें।



