लोकतंत्र की शक्तिशाली आवाज़ है विद्यार्थी आन्दोलन

इतिहास इस बात का गवाह है कि समय-समय पर भारत में युवाओं के अनेक आन्दोलनों ने समाज और शासन को एक नई दिशा दी है। जब भी युवाओं ने अपने अधिकारों और न्याय के लिए आवाज़ बुलंद की है, उसकी गूंज सत्ता के गलियारों तक पहुंची है और उसने बदलाव का एक नया इतिहास रचा है। 1979-85 का असम आन्दोलन, 1990 के मंडल विरोधी प्रदर्शन, इंडिया अगेंस्ट करप्शन अभियान, 2019 का सीएए-एनआरसी विरोधी आन्दोलन, निर्भया आन्दोलन और उससे पहले 1974-75 का जे.पी. आन्दोलन—इन सभी का नेतृत्व मुख्य रूप में विद्यार्थियों और युवाओं ने किया था। यूनिवर्सिटियों और कॉलेज के कैंपस लोकतांत्रिक असहमति के सबसे अहम केन्द्र बन गए।
कॉकरोच पार्टी ने नेतृत्व में नीट-यू.जी. प्रश्न-पत्र लीक के विरोध और शैक्षणिक प्रणाली में सुधार की मांग के लिए चलाया गया युवा आन्दोलन भी ऐसा ही एक ऐतिहासिक आन्दोलन था। इसकी आवाज़ देश के कोने-कोने तक पहुंची। इस आन्दोलन को कुचलने के उद्देश्य से प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर पुलिस द्वारा किया गया लाठीचार्ज न सिर्फ  लोकतांत्रिक असहमति के प्रति सत्ता की असहिष्णुता को बेनकाब करता है, बल्कि आज़ाद भारत के इतिहास में एक बहुत ही दुखद और अफसोसजनक घटना के तौर पर भी याद किया जाएगा।
सीजेपी आन्दोलन का जन्म इसका स्पष्ट उदाहरण है। जिस हिम्मत, थैर्य और दृढ़ विश्वास के साथ युवाओं ने मुश्किल हालात का सामना किया और सरकार को अपनी मांगें मानने के लिए मजबूर किया, वह उनकी एकता और दृढ़ का जीवंत परिणाम है। यह इस सच्चाई को भी पुष्ट करता है कि किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करना बहुत ज़रूरी है। भारत की आत्मा न्याय, समानता और लोकतंत्र में दृढ़ विश्वास से ही परिभाषित होती है।
इसलिए रैलियों, धरनों और प्रदर्शनों के ज़रिये शांतिमयी ढंग से अपना विरोध दर्ज कराने का अधिकार संविधान द्वारा दिया गया एक पवित्र मौलिक अधिकार है और अभिव्यक्ति की आज़ादी का अटूट हिस्सा भी है। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी उतना ही ज़रूरी है कि शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठ और विरोध-प्रदर्शन अपनी संवैधानिक और नैतिक सीमाओं का उल्लंघन न करें। किसी भी व्यक्ति द्वारा, किसी भी वजह से, बोलने या काम के ज़रिये की गई हिंसा आखिरकार और हिंसा को जन्म देती है। 
जंतर-मंतर पर हुआ यह सफल आन्दोलन इस बात का जीवंत सबूत है कि कोई भी सरकार अपने नागरिकों के मौलिक मानवीय और संवैधानिक अधिकारों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती। इसने एक बार फिर सिद्ध किया है कि लोकतंत्र की असली ताकत लोगों की आवाज़ में निहित होती है और इसकी रक्षा नागरिकों की जागरूकता, एकता और मज़बूत इच्छा-शक्ति पर निर्भर करती है। जब लोगों द्वारा चुनी गई सरकारें अपने सिद्धांतों और लोकतांत्रिक मूल्यों से भटकने लगती हैं, तो शांतिपूर्ण जन-आन्दोलन लोकतंत्र को सही दिशा देने तथा उसे और मज़बूत करने का सबसे उचित माध्यम बन जाता है। युवा हमेशा ऊंचे आदर्शों, सिद्धांतों और प्रगतिशील बदलाव से प्रेरित रहते हैं। उनके मन में समाज और देश के लिए कुछ बड़ा और अर्थपूर्ण करने का जज़्बा होता है। यही कारण है कि भारत की आज़ादी की लड़ाई में छात्रों और युवाओं ने बहुत अहम और ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी। इतिहास यह भी बताता है कि युवाओं और सत्ता में बैठे लोगों के बीच विचारों के अंतर हमेशा रहे हैं।
मेरे पिता लाहौर में एक छात्र नेता थे। आज़ादी के आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण उन्हें 1930, 1936 और फिर 1942 से 1945 के बीच कई बार गिरफ्तार किया गया और जेल भी जाना पड़ा। वह अक्सर अपने कॉलेज के प्रिंसिपल ई. डी. लुकास से जुड़ी एक घटना सुनाना करते थे। उस समय वह लाहौर के फॉर्मन क्रिश्चियन कॉलेज में ग्रेजुएशन के विद्यार्थी थे।
वह बताते थे कि जब भी पुलिस उन्हें कॉलेज कैंपस से गिरफ्तार करने आती थी, तो प्रिंसिपल लुकास सबसे पहले एक पुलिस अधिकारी की मौजूदगी में उनका वज़न करवाते थे। इसके बाद वह गिरफ्तार करने वाले अधिकारी से यह आश्वासन लेते थे कि हिरासत के दौरान उनके विद्यार्थी के साथ न तो कोई दुर्व्यवहार किया जाएगा और न ही किसी भी तरह की शारीरिक या मानसिक यातना दी जाएगी। यह घटना सिर्फ एक अध्यापक की अपने विद्यार्थी के प्रति ज़िम्मेदारी और मानवता की भावना को ही नहीं दिखाती, बल्कि यह भी याद दिलाती है कि सबसे मुश्किल और दमनकारी दौर में भी मानवीय सम्मान और संवेदनशीलता के लिए जगह बनी रह सकती है। भारत के युवा बेटे-बेटियों के खिलाफ कंटीली लाठियां और पेलेट गनों के इस्तेमाल को उचित ठहराने के लिए अधिकारियों द्वारा बाद में गढ़ा गया बयान न सिर्फ भारत की आज़ादी की लड़ाई की विरासत का, बल्कि मानवीय सम्मान, न्याय और समानता पर आधारित व्यवस्था के उस वायदे का भी मज़ाक उड़ाता है, जिस पर हमारे गणतंत्र की नींव रखी गई थी।
जंतर-मंतर का यह आन्दोलन हमें यह संदेश देता है कि लोकतंत्र तभी मज़बूत होती है, जब सरकार और जनता के बीच संवाद, आपसी सम्मान और विश्वास कायम रहे। इस आन्दोलन ने एक बार फिर सिद्ध किया है कि वही सरकारें स्थायी साबित होती हैं और आगे बढ़ती हैं, जो समय पर लोगों की आवाज़, उनके गुस्से और उनकी भावनाओं को समझती हैं और उनके ज़ख्मों पर मरहम लगाने का यत्न करती हैं। इस विरोध-प्रदर्शन ने इस सोच को और मज़बूत किया है कि लोकतंत्र वास्तव में जटिल और विवादित प्रश्नों का न्यायपूर्ण समाधान ढूंढने की एक निरन्तर प्रक्रिया है। इसने हमें पुन: याद करवाया है कि गणराज्य के सशस्त्र पुलिस बलों द्वारा भारत के युवा बेटे-बेटियों पर कंटीली लाठियों और पेलेट गनों का इस्तेमाल एक बहुत दुखद और अमानवीय दृश्य सरकार की नैतिक वैधता को कमज़ोर करता है।


-पूर्व केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री
(इस लेख में व्यक्त गए विचार लेखक के निजी विचार हैं।)
-मो. 99585-34440

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