डीपफेक और डिजिटल ठगी बनी बड़ी चुनौती

वर्तमान में समय के साथ साइबर अपराध का चेहरा तेजी से बदला है। कभी फोन पर बैंक अधिकारी बनकर ठगी की जाती थी तो अब अपराधी पुलिस, सीबीआई, ईडी या अदालत के अधिकारी बनकर वीडियो कॉल करते हैं और सामने वाले को कथित ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ का डर दिखाकर लाखों रुपये ऐंठ लेते हैं। अक्तूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट के सामने ऐसा ही एक मामला आया, जिसमें एक बुजुर्ग दंपती को फर्जी अधिकारियों और अदालत के दस्तावेजों के जरिए डराकर करीब 1.5 करोड़ रुपये ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया गया। यह घटना बताती है कि डिजिटल तकनीक ने जहां जीवन को आसान बनाया है, वहीं अपराधियों के हाथ में पहुंचकर यही तकनीक कितनी खतरनाक हो सकती है।
आज इसी खतरे का एक और बड़ा रूप डीपफेक और एआई से तैयार फर्जी डिजिटल कंटेंट के रूप में सामने आ रहा है। किसी व्यक्ति के चेहरे को किसी दूसरे वीडियो में लगाना, उसकी आवाज की हूबहू नकल करना, किसी नेता, अधिकारी या आम नागरिक के नाम से फर्जी बयान तैयार करना और फिर उसे सोशल मीडिया पर तेजी से फैलाना अब पहले की तुलना में बहुत आसान हो गया है। समस्या सिर्फ इतनी नहीं है कि कोई नकली वीडियो बना सकता है। असली चुनौती यह है कि आम व्यक्ति के लिए असली और कृत्रिम सामग्री में अंतर करना लगातार कठिन होता जा रहा है। इसी चुनौती को देखते हुए केंद्र सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत सिंथेटिकली जनरेटेड इन्फॉर्मेशन यानी एआई से तैयार सामग्री को लेकर जवाबदेही और स्पष्ट लेबलिंग पर जोर दिया है। 
डीपफेक को सरल भाषा में समझें तो यह ऐसी डिजिटल सामग्री है, जिसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से इस तरह तैयार या बदला जाता है कि वह देखने और सुनने में वास्तविक लगे। किसी व्यक्ति का चेहरा दूसरे शरीर पर लगाया जा सकता है, उसकी आवाज की नकल की जा सकती है या उसके नाम से ऐसा बयान तैयार किया जा सकता है, जो उसने कभी दिया ही नहीं। यही तकनीक मनोरंजन और रचनात्मक कार्यों में उपयोगी हो सकती है लेकिन जब इसका इस्तेमाल धोखाधड़ी, चरित्र हनन, अफवाह, ब्लैकमेल, चुनावी भ्रम, सांप्रदायिक तनाव या आर्थिक ठगी के लिए होने लगे तो यह गंभीर सामाजिक खतरा बन जाती है।
सरकार की चिंता केवल डीपफेक वीडियो तक सीमित नहीं है। एआई की मदद से तैयार तस्वीर, ऑडियो और लिखित सामग्री भी गलत सूचना फैलाने का माध्यम बन सकती है। किसी अधिकारी की नकली आवाज में फोन करके पैसे मांगना, किसी रिश्तेदार का फर्जी वीडियो बनाकर आपात स्थिति का बहाना करना या किसी प्रतिष्ठित संस्था के नाम से नकली संदेश जारी करना अब साइबर अपराध की नई रणनीतियां हैं। इसलिए डिजिटल सुरक्षा का सवाल केवल तकनीकी नहीं रह गया है, बल्कि यह नागरिकों की आर्थिक सुरक्षा, प्रतिष्ठा, निजता और सामाजिक विश्वास से भी जुड़ गया है।
इसके लिए सरकार ने डिजिटल प्लेटफॉर्म और मध्यस्थ कंपनियों की जिम्मेदारी बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं। फरवरी 2026 में सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने एआई प्लेटफॉर्म समेत मध्यस्थों को कानून और नियमों के तहत उचित सावधानी बरतने की सलाह दी। मंत्रालय ने एआई से तैयार या बदली गई सामग्री के संबंध में पारदर्शिता और जिम्मेदारी की आवश्यकता पर जोर दिया है।  इसका मूल उद्देश्य यह है कि इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री को देखकर उपयोगकर्ता को यह समझने में मदद मिले कि वह वास्तविक है या कृत्रिम रूप से तैयार की गई है।
हालांकिए सख्ती के साथ संतुलन भी ज़रूरी है। इंटरनेट पर हर गलत या विवादित सामग्री को अपराध मान लेना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए समस्या पैदा कर सकता है। एआई तकनीक शिक्षाए चिकित्सा, शोध, मनोरंजन, पत्रकारिता और कारोबार के लिए बेहद उपयोगी है। इसलिए नियम ऐसे होने चाहिए जो गलत इस्तेमाल पर रोक लगाएं लेकिन वैध नवाचार और रचनात्मकता को अनावश्यक रूप से बाधित न करें। सरकार की ओर से भी डिजिटल सुरक्षा व नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना बड़ी जिम्मेदारी है।
साइबर अपराध व डीपफेक के खिलाफ सबसे मजबूत सुरक्षा केवल सरकारी नियम नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक भी हैं। किसी वीडियो को देखकर तुरंत विश्वास करना, अनजान व्यक्ति के कहने पर पैसे भेजना, ओटीपी या बैंक संबंधी जानकारी साझा करना अथवा पुलिस और अदालत के नाम पर घबराकर भुगतान कर देना खतरनाक हो सकता है। याद रखना चाहिए कि वास्तविक कानून-व्यवस्था की प्रक्रिया और अपराधियों द्वारा रची गई ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ की कहानी में अंतर होता है। तकनीक जितनी तेज हो रही है, हमारी सावधानी भी उतनी ही तेज होनी चाहिए।

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