हमारा देश महान

वह कहते हैं, यहां वेतन बहुत मिलता है, आपको? हम आपको आपके पड़ोसी राज्यों से कहीं अधिक वेतनमान देते हैं, इसलिए आपको महंगाई के बारे में नहीं सोचना चाहिए। महंगाई के बारे में उन राज्यों को सोचना चाहिए जिनके वेतमान कम हैं। आखिर समाजवाद है भई, इसलिए तरक्की केवल धनियों के प्रासादों में नज़र आए। गरीब सब एक जैसे रहें। किसी को वेतन अधिक का स्पष्टीकरण देकर महंगाई भत्ता कम कर दो, और किसी को अधिक महंगाई भत्ते की बात कह कर उसका वेतन न बढ़ाओ।
आखिर देश के बहुत से लोगों को अधिक कमाई की ज़रूरत ही क्या है? उन्हें केवल जीना ही तो है। सदियों से उन्हें घास की रोटी खा जीवन रण में डटे रहने वाले राणा प्रताप का उदाहरण दिया जाता है। उन्होंने तो केवल हल्दी घाटी में जूझते हुए घास की रोटी खाई थी, हमने तो इनकी पूरी दुनिया पूरे जीवन को हल्दी घाटी बना कर रख दिया है। वे बस आधा पेट रहते हैं, और जीवन भर चूं नहीं करते।
वह चूं न करें इसलिए उन्हें ऊपर वाले की अर्चना में झांझ और करताल बजाने की शिक्षा दे दी गई है। तनिक देखिये, कितनी तेज धुन में वह झांझ और करताल बजाते हैं। कुछ तो मस्त होकर नाचने भी लगते हैं। जी हां ऐसी अर्चना आयोजित करने वाले के मन में दया धर्म प्रमुख रहता है, इसलिए बाद में मुफ्त का लंगर भी आयोजित कर दिया जाता है। तनिक लंगर प्राप्त करने के लिए लगती हुई कतारों को देखिए। लंगर प्राप्त हो जाने के बाद उनक चमकते हुए चेहरों को देखिये। लंगर खाने के बाद अगर वे परिवार के ़गैर-हाज़िर सदस्यों के नाम पर पोटली में बांध कर लंगर ले जाएं, तो लगता है, उन्होंने अपनी हल्दी घाटी जीत ली। 
धीरे-धीरे लंगर संस्कृति का नीति विस्तार हो गया। पूरा मुफ्त नहीं, तो बाज़ार भर को हैरान कर देने वाले सस्ते भावों पर अनाज बांट सकने की सस्ती दुकान खुल गई। ज्यों-ज्यों देश तरक्की करता जा रहा है, इन दुकानों की उम्र में सरकार वृद्धि करने की घोषणा कर देती है। अब तो आलम यह है कि ज्यों-ज्यों देश के पहले से ऊंची आर्थिक शक्ति बन जाने की घोषणा होती है, सस्ते राशन की इन दुकानों की उम्र बढ़ा दी जाती है। अब हमारा इरादा दुनिया की चौथी सबसे ताकतवर आर्थिक शक्ति से तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बन जाने का है, इसलिए सस्ता राशन बांटने की दुकानों की उम्र पांच साल और बढ़ा दी गई है। उम्मीद है कि जब आज़ादी के सौ साल पूरे हो जाएंगे, और हो सकता है आप पूर्ण विकसित देश ही नहीं, आंकड़ों में दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बन जाएं, तो राशन को सस्ता बांटने की इस कृपा को केवल पांच साल के लिए नहीं, बल्कि अनन्तकाल के लिए बढ़ा दिया जाए।
आखिर इस तरक्की की नज़र भी तो उतारनी है, इसलिए सस्ते राशन की दुकानों की उम्र में बेरोक-टोक वृद्धि होनी चाहिए। वैसे भी हम इस सांस्कृतिक देश में दया-धर्म का पालन करते हुए दुनिया में अनोखे रिकार्ड बनाने में माहिर हैं। आप जानते हैं न, हम इस देश के अस्सी करोड़ से अधिक लोगों में मुफ्त जैसा सस्ता राशन बांटते हैं। यह संख्या खुदा ने चाहा तो बढ़ती जाएगी। लोग राशन के थैले उठा कर, दलालों को अपनी बारी जल्दी कवा देने की चिरौरी करते हुए यह अनाज लेकर परम संतोष का अनुभव करते हैं। बहुत लाभ हैं इस सीमित राशन के। आदमी जीवन के उस स्वर्णिम सिद्धांत का पालन कर सकता है, कि ‘रूखी सूखी खा कर और ठण्डा पानी पी’। इस ऐतिहासिक नियम का पालन करते हुए इस देश की अधिकांश जनता ऐतिहासिक गरीब हो गई है अर्थात सदियों पहले जैसे थी, आज भी वैसी है। अधभूखी और मुफ्त लंगरों की कतार में लगने को तैयार। आप पूछते हैं वह तरक्की की घोषणाएं कहां गईं? इनकी झुग्गी झोंपड़ियों में तो नज़र नहीं आईं। तो आपको बता देंगे बाबू, कि राजनीति और दलाली, सम्पर्क और चोर गलियों के कल के छुटभय्ये और आज का महा-मानव बने मसीहाओं को देख लो, उनके घर प्रासाद बन जाने के बाद पहचाने भी नहीं जाते। आप साइकिल छोड़ कर पैदल हो गए तो आपको कहा, अच्छा किया। पैदल चलने से सेहत बनती है। और उधर उनकी स्कूटियां बड़ी आयातित गाड़ियों में तबदील हो गईं, जिनका परिचय यह है कि तंग और टूटी सड़कों पर चलती हुई वे राह-चलते और फुटपाथों पर सोते हुए लोगों का शिकार करती हैं।
शहरों को आपने भ्रष्टाचार और रंक से राजा हो जाने की नीति-विहीन दौड़ के जंगल बना दिया। अब रईसों का तो सदा से शौक रहा है शिकार खेलना। परम्परा जारी है। क्योंकि हर गलत बात को यहां परम्परा कह कर स्वीकार करने की परम्परा है। इसलिए जंगल बन गये इन शहरों में नये रईस बने इन चतुर सुजानों या उनकी मदमस्त सन्तानों में शिकार खेलने की अमर परम्परा जारी रही। अन्तर केवल इतना है कि अब मचानों की जगह या अपनी बन्दूकों की जगह उनकी बड़ी गाड़ियां सड़कों पर दुर्घटनाओं के नाम पर इन बेदरो-दीवार लोगों का शिकार खेलती हैं, और फिर कुचली जाती वंचित संस्कृति में से उभरती दुनिया में से नये उभरते नेता मुआविज़ों की गुहार लगाते हैं। यह मुआविज़ों की गुहार भी खूब है जनाब! ऐसी घोषणाएं लाती है, जो कभी पूरी नहीं होतीं। आधी पौनी पूरी होती हैं, तो साथ बांटने वाले दलाल लाती हैं जो अल्पांश आप की जेब में डाल कर अपनी नेतागिरी का धंधा चलाते हैं। जी हा,ं वही नेता जो कल आपका भाग्य-विधाता बन कर देश में ऐसी क्रांति करेगा कि जिस से सब की नहीं, तो नाती-पोतों की जून तो अवश्य सुधर जाए।

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