भारत के लिए चिन्ताजनक है मक्का समझौता
पश्चिम एशिया में हो रहे अमरीका-इज़रायल और ईरान के युद्ध में पाकिस्तान ने इसे रोकने के लिए अपनी भूमिका निभाई थी। लम्बी अवधि तक इसके प्रधानमंत्री शहबाज़ शऱीफ और सैन्य प्रमुख आसिम मुनीर ने इन देशों का दौरा किया था और समय-समय पर इसके हल के लिए कुछ प्रारूप भी तैयार किए थे। इस काम में तुर्की भी शामिल था। यह युद्ध अभी भी जारी है परन्तु इस दौरान एक आश्चर्यजनक बात यह हुई है कि विगत दिवस सऊदी अरब-पाकिस्तान और तुर्की ने एक रक्षा समझौता किया है, जिसका मुख्य उद्देश्य यह है कि इन तीनों में से किसी एक देश पर किया गया हमला, इन तीनों पर ही हमला माना जाएगा।
भारत के सऊदी अरब के साथ हमेशा अच्छे संबंध बने रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और सऊदी अरब के प्रमुखों ने समय-समय पर एक-दूसरे के देश के दौरे भी किए हैं। सऊदी अरब ने श्री मोदी को अपने देश का सबसे बड़ा सम्मान भी दिया था। आज भी लाखों भारतीय सऊदी अरब सहित अलग-अलग खाड़ी देशों में अपना कामकाज कर रहे हैं। भारत खाड़ी देशों से अरबों-खरबों रुपये का तेल आयात करता है। चाहे इस वर्ष फरवरी से वहां युद्ध जारी होने के कारण उसके इस निर्यात में ज़रूर कमी आई है। एक तरफ पाकिस्तान अमरीका और ईरान के बीच मध्यस्थता करवाने के लिए सक्रिय है, परन्तु दूसरी तरफ उसने यह मक्का समझौता क्यों किया यह बात ज्यादा समझ आने वाली नहीं है। ईरान में शिया मुसलमानों की बहुसंख्या है। पाकिस्तान में भी लगभग 20 प्रतिशत शिया मुसलमान रहते हैं। एक अन्य देखने वाली बात यह भी होगी कि चीन द्वारा भी भीतर से इस समझौते को सहमति दी गई है। अमरीका ने भी इस संबंध में ज्यादा प्रतिक्रिया प्रकट नहीं की। ऐसी स्थिति में भारत को इस संबंध में और भी सुचेत होना पड़ेगा, क्योंकि पिछले 70 वर्ष से जो हालात बने हुए हैं, उनके दृष्टिगत अपने पड़ोसी देश के साथ भारत के संबंध शीघ्र सुधरते दिखाई नहीं देते।
पाकिस्तान द्वारा समझौता करने का एक बड़ा कारण यह भी हो सकता है कि वह बेहद आर्थिक संकट से गुज़र रहा है। यह समझौता उसके अपने हथियारों के निर्माण और कुछ वित्तीय सहायता जुटाने के काम ज़रूर आ सकता है क्योंकि सऊदी अरब और चल रहे इस युद्ध में ईरान ने लगातार मिसाइलों से हमले किए हैं। चाहे ये हमले सऊदी अरब या अन्य खाड़ी देशों के विरुद्ध तो नहीं कहे जा सकते परन्तु ईरान यहां वर्षों से स्थापित अमरीकी अड्डों को अपना निशाना बनाता ज़रूर दिखाई दे रहा है। जिस कारण अन्य खाड़ी देशों के साथ-साथ सऊदी अरब को भी भारी नुकसान हुआ है। ईरान द्वारा होर्मुज़ समुद्री मार्ग बंद करने से भी अन्य खाड़ी देशों के साथ-साथ सऊदी अरब के तेल निर्यात पर बड़ा प्रभाव पड़ा है, यह मामला अब तक उसके लिए चुनौती बना हुआ है। तुर्की की भी इज़रायल के साथ लम्बी अवधि से बड़ी दुश्मनी चली आ रही है। इज़रायल उसको भी इस कशमकश में दूसरा ईरान बताता रहा है। जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, हम शुरू से ही इसकी विदेश नीतियों के आलोचक रहे हैं। इसकी विदेश नीतियों की कमियों संबंधी जानते हैं। अपनी स्थापना के समय से ही इसने विदेशी सहायता लेने के लिए जिस तरह अमरीका से समझौते किए और लम्बी अवधि तक उसका पीठू बना रहा है, उसने इस देश को कभी अपने पांवों पर खड़ा होने का अवसर नहीं दिया। अ़फगानिस्तान पर सोवियत यूनियन द्वारा किए गए हमले के समय अमरीका ने एक तरह से इसे अपना सैन्य अड्डा ही बना लिया था। यहीं से वह अ़फगानिस्तान में रूसी सोवियत सेना के साथ तालिबान द्वारा पूरी टक्कर लेता रहा था।
सोवियत सेना के जाने के बाद वहां घटित होते रहे घटनाक्रम के कारण ओसामा-बिन-लादेन के संगठन अल-कायदा ने अ़फगानिस्तान की धरती से ही हमले की योजनाबंदी करके अमरीका के ट्रेड टावरों को निशाना बनाया था। अमरीका अ़फगानिस्तान की नीतियों का कड़ा आलोचक बन गया था। उस समय भारत भी अ़फगानिस्तान के साथ नाराज़ था। बाद में उसे पाकिस्तान के इरादों की समझ आ गई। पाकिस्तान तालिबान के मामले पर अमरीका के साथ दोहरा खेल खेलता रहा था। आज उसकी ओर से अपनी ऐसी नीतियों के कारण ही अ़फगानिस्तान उसके बेहद विरुद्ध खड़ा दिखाई देता है। दोनों देशों में बार-बार युद्ध जैसे हालात भी बनते रहे हैं। पाकिस्तान के प्रांत खैबर पख्तूनख्वा में फैली गड़बड़ और बलोचिस्तान में एक तरह से छिड़ चुके युद्ध के साथ-साथ पाक अधिकृत कश्मीर में पैदा हुई बेचैनी से भी पाकिस्तान की हालत लगातार कमज़ोर होती दिखाई दे रही है। शायद यह समझौता भी इसी हालात में से निकला हो। ईरान लगातार खाड़ी देशों के साथ-साथ सऊदी अरब पर भी हमले कर रहा है। यमन के हूतियों का निशाना भी सऊदी अरब बना हुआ है। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान का यह मक्का समझौता उसके लिए कितना लाभदायक या नुकसानदायक सिद्ध होगा, यह देखना अब शेष होगा, परन्तु भारत के लिए यह समझौता चिंता का बड़ा कारण ज़रूर बन गया है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

