संसद की निराशाजनक कार्यवाही

संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई को शुरू हुआ था। लगभग तीन सप्ताह तक चले इस सत्र की उपलब्धि निराशाजनक ही रही। लोकसभा में सिर्फ दो दिन ही आसानी से काम चला, शेष काम वाले दिनों में नारेबाज़ी, वॉक-आऊट और संसद के बाहर सदस्यों में आपसी टकराव ही होता दिखाई दिया। लोकसभा में सरकार बहुमत में है, इसलिए उसने 12 विधेयक तो पारित करवा लिए परन्तु इनमें से एक विधेयक पर भी सदनों में चर्चा नहीं हुई। सत्र से पहले जंतर-मंतर में नई बनी कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा लम्बा आन्दोलन चलाया गया। भारी संख्या में युवाओं ने इसमें भाग लिया, परन्तु संसद सत्र के शुरू होने पर इस पार्टी द्वारा संसद की ओर कूच करने की जो घोषणा की गई थी, उसमें बड़ी गड़बड़ दिखाई दी। युवाओं के जोश के सामने पुलिस के सभी अवरोध विफल सिद्ध हुए, जिस पर सुरक्षा बलों द्वारा युवाओं को संसद के पास सख्ती से रोके जाने पर सख्त लाठीचार्ज भी करना पड़ा। अनेक युवा और पुलिस कर्मचारी घायल हुए। पुलिस द्वारा युवाओं पर पैलेट गनों का इस्तेमाल करने का आरोप भी लगा, जिसके कारण कुछ युवक घायल भी हुए।
कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने विद्यार्थियों पर लाठीचार्ज और इसके साथ ही राम मंदिर में चढ़ावा घोटाले के मामले को लेकर दोनों ही सदनों को चलने नहीं दिया। संसद सत्र के शुरू होने से पहले युवाओं और विपक्षी पार्टियों की मांगों के आगे झुकते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने नीट का पेपर लीक होने के मामले पर त्याग-पत्र दे दिया था, परन्तु सत्र  के दौरान राहुल गांधी और विपक्षी पार्टियों के नेता गृह मंत्री अमित शाह से विद्यार्थियों पर लाठीचार्ज की कार्यवाही को लेकर बयान देने की मांग करते रहे। सरकार का पक्ष यह था कि पहले इस समूचे घटनाक्रम पर विस्तारपूर्वक बहस होनी चाहिए। उसके बाद ही गृह मंत्री बयान देंगे, परन्तु विपक्षी दल इन दोनों मामलों पर पहले बयान देने के लिए बज़िद रहे। बात यहां तक पहुंच गई कि सरकारी पक्ष ने कहा कि वह चर्चा करवाने के लिए तैयार हैं, परन्तु राहुल गांधी ने कहा कि इस मामले पर गृह मंत्री त्याग-पत्र दें। राहुल गांधी लगातार इस बात पर बज़िद रहे कि यदि गोली चलाने का आदेश गृह मंत्री ने दिया है तो वह त्याग-पत्र दें, यदि उन्होंने यह आदेश नहीं दिया तो वह अयोग्य मंत्री हैं, इस संबंध में ज़िम्मेदारी तय की जाए।
आखिर में अमित शाह ने यह बयान दिया कि वह 24 घंटे सदन में बैठने के लिए तैयार हैं और पूरी बहस के बाद वह अपना बयान देंगे। इसके जवाब में राहुल गांधी ने कहा कि हमें उनका त्याग-पत्र चाहिए, बहस करवाने का कोई लाभ नहीं है। इसी दौरान कांग्रेस की भागीदारी वाले राज्य झारखंड में परीक्षाओं के पेपर लीक होने के मामले पर भारी संख्या में विद्यार्थियों ने लगातार प्रदर्शन किए। सरकार के साथ आपसी बातचीत विफल होने के कारण उन्होंने झारखंड की विधानसभा की ओर दृढ़ इरादे से कूच किया, जिस कारण सरकार की ओर से उन्हें रोकने के लिए कड़े कदम उठाते हुए लाठीचार्ज किया गया, जिसमें भारी संख्या में विद्यार्थी घायल हो गए। इस मामले पर मात्र एक आलोचनात्मक बयान देने की बजाए राहुल गांधी ने अपना कोई पक्ष पेश नहीं किया और न ही मुख्यमंत्री को त्याग-पत्र देने के लिए कहा।
हम समझते हैं कि राहुल गांधी के हठ के कारण संसद का मानसून सत्र निराशाजनक रहा है, जिसने ऐसी परम्पराओं को और उत्साहित किया है, जिनके होते संसद और भी महत्त्वहीन हो कर रह गई है, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर एक बार फिर प्रश्न-चिन्ह लग गया है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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