भारत की आज़ादी की रक्षक बनीं ये महिलाएं
आज़ादी की 80वीं वर्षगांठ पर यदि पूछा जाए कि 1947 से 2026 तक भारत की स्वतंत्रता की सबसे बड़ी ताकत क्या रही है? ...तो इस सवाल का जवाब केवल सेना, संविधान या लोकतांत्रिक संस्थाएं भर नहीं होगा। इस उत्तर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा वे भारतीय महिलाएं भी हैं, जिन्होंने जंग-ए-आज़ादी में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया और आज़ाद भारत को मज़बूत व आत्मनिर्भर बनाने में जी जान से अपना योगदान दिया। इसलिए आज़ादी की इस 79वीं वर्षगांठ पर अन्य महत्वपूर्ण चीजों के साथ महिलाओं के इस महती योगदान को याद करना भी ज़रूरी है, जिनके साहस, नेतृत्व, ज्ञान और समर्पण ने भारत की आज़ादी को केवल सुरक्षित ही नहीं रखा बल्कि उसे नई ऊंचाईयों तक पहुंचाया है।
स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी किसी औपचारिक उपस्थिति तक सीमित नहीं थी। रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्धभूमि में उतरकर अद्भुत वीरता दिखायी थी। बेगम हजरत महल ने अवध में अंग्रेजी शासन को चुनौती दी थी। सरोजनी नायडू ने गांधी जी के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभायी थी और महिलाओं को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा था। इसी तरह अरुणा आसिफ अली ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में तिरंगा फहराकर पूरे देश में नई ऊर्जा का संचार किया। उषा मेहता ने भूमिगत रेडियो के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज को देशभर में पहुंचाया, तो कस्तूरबा गांधी, सुचेता कृपलानी, दुर्गा भाभी, मातंगिनी हाजरा, कैप्टल लक्ष्मी सहगल, भीकाजी कामा, प्रीतिलता वाडेदार, श्रीमती एनी बेसेंट, कल्पना दत्त जोशी, कनकलता बरुआ, रानी गैदिन्ल्यू, झलकारी बाई, अवंतीबाई लोधी, वेलु नाचियार, तारारानी श्रीवास्तव, दुर्गाबाई देशमुख, कमलादेवी चट्टोपध्याय, विजय लक्ष्मी पंडित और राजकुमारी अमृत कौर जैसी अनेक महिलाओं ने यह साबित किया कि आज़ादी केवल पुरुषों का संघर्ष नहीं था बल्कि उसमें भारत की बेटियों की भी बराबर की हिस्सेदारी थी।
आज़ादी के बाद अगर हम देश की राजनीति और फलते-फूलते लोकतंत्र की बात करें तो इंदिरा गांधी, प्रतिभा पाटिल, मीरा कुमार, सुषमा स्वराज, शीला दीक्षित, जयललिता, द्रोपदी मुर्मू, मायावती, ममता बनर्जी, वसुंधरा राजे और निर्मला सीतारमण उन महिलाओं में शामिल हैं, जिन्होंने न केवल देश की संवैधानिक राजनीति को शिखर तक पहुंचाया बल्कि अपने संवेनशीलता और समावेशी सोच से लोकतंत्र को उदार और मजबूत बनाया। इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री के रूप में कठिन अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय परिस्थितियों में देश का नेतृत्व किया। बाद में प्रतिभा पाटिल और द्रोपदी मुर्मू ने देश के सर्वोच्च नागरिक पद यानी राष्ट्रपति पद की कुर्सी संभालकर देश के सबसे बड़े संवैधानिक पद को गरिमा दी। अगर न्याय, प्रशासन और पुलिस क्षेत्र की बात करें तो आज़ादी के इन 79 सालों में एक से बढ़कर एक महिलाओं ने इस क्षेत्र को अपने ज्ञान और कर्तव्य से मजबूत किया है। इनमें प्रमुख हैं— फातिमा बीबी, लीला सेठ, जस्टिस आर. बनुमति, जस्टिस इंदु मल्होत्रा, किरण बेदी, अन्ना राजम मल्होत्रा, अरुणा सुंदरराजन और दूर्वा बनर्जी। इन सब महान शख्सियतों ने देश के लोकतंत्र को चार चांद लगाये हैं। फातिमा बीबी, सर्वोच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश बनीं, तो उनके बाद अनेक महिला न्यायाधीशों ने न्याय व्यवस्था में संवेदनशीलता और समानता की नई मिसालें स्थापित कीं।
अन्य क्षेत्रों की तरह विज्ञान और अंतरिक्ष के क्षेत्रों में भी पिछले 79 साल में एक से बढ़कर एक महिलाओं ने इस क्षेत्र को गौरवान्वित किया है। डॉक्टर टेसी थामस को मिसाइल वुमन ऑफ इंडिया कहा जाता है। डॉक्टर रितु करिधल, नंदिनी हरिनाथ, मुथैया वनिता जैसी इसरो की महिला वैज्ञानिकों ने मंगलयान, चंद्रयान और अन्य अंतरिक्ष अभियानों की सफलता में उल्लेखनीय योगदान दिया है। विज्ञान और अंतरिक्ष तथा रक्षा के क्षेत्रों में इतने ही नाम नहीं हैं, और भी अनेक विभूतियां हैं, जिन्होंने पिछले 8 दशकों में देश का गौरव बढ़ाया है। इनमें अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला, भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स, महिला फाइटर पायलटों में शामिल होकर नई पीढ़ी को प्रेरित करने वाली अवनी चतुर्वेदी, भावना कांत और मोना सिंह, अपने आपमें देशभक्ति की जीवंत कहानियां हैं। इसी क्रम में पुनीता अरोड़ा और माधुरी कानिटकर भी देश की रक्षा क्षेत्र में अपने अहम योगदान के लिए जानी जाती हैं।
अगर खेल जगत की बात करें तो पीटी उषा, कर्णम मल्लेश्वरी, साइना नेहवाल, पीवी सिंधू, मैरी कॉम, साक्षी मलिक, मीराबाई चानू, लवलीना बोरगोहेन, दीपा करमाकर, मिथाली राज और हरमनप्रीत कौर ये वो नाम हैं, जिन्होंने खेल के आसमान में भारत की चमक बिखेरी है। खेल जगत में इन महिलाओं ने भारतीय तिरंगे को हमेशा ऊंचा रखा है। अगर बात शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन क्षेत्र में महिलाओं के योगदान की करें, तो शिक्षा के क्षेत्र में अनेक महिलाओं ने सावित्रीबाई फुले की विरासत को पूरी शिद्दत के साथ आगे बढ़ाया है। वहीं स्वरोज़गार और महिला सशक्तिकरण को नई ऊंचाइयां देने वाली इला भट्ट जैसी शख्सियतें भी मौजूद हैं। समाज, शिक्षा और संस्कृति में भारत का नाम रोशन करने वाली महिलाओं में सावित्रीबाई फुले और इला भट्ट के अलावा पंडिता रमाबाई, सिंधुताई सपकाल, मेधा पाटकर, गौरा देवी, सुधा मूर्ति, महाश्वेता देवी, अमृता प्रीतम, लता मंगेश्कर, एम. सुब्बुलक्ष्मी, सोनल मान सिंह, अरुंधती भट्टाचार्य जैसी महिलाओं ने हमारी आजादी को नये और गरिमामय मायने प्रदान किये हैं।
मीडिया, साहित्य, कला में भी एक से बढ़कर एक महिलाओं ने देश की मौजूदा शानदार तस्वीर गढ़े जाने में अपना महान योगदान दिया है। इसलिए आज़ादी की 79वीं वर्षगांठ के अवसर पर इन महान महिलाओं को याद करना केवल इनके योगदान को याद करना भर नहीं है बल्कि इनके इस साहस को महसूस करना है कि उन्होंने कठिन से कठिन परिस्थितियों में राष्ट्र के हर क्षेत्र में अपना अहम योगदान दिया है। आने वाले वर्षों में यदि भारत विकसित राष्ट्र बनने का सपना पूरा करता है, तो इस सपने में महिलाओं की यही ऊर्जा, नेतृत्व और संकल्प सबसे बड़ी शक्ति होगी।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



