अंग्रेजों के लिए एक बुरा स्वप्न बन गये थे भारतीय जासूस
कल्पना कीजिए, आधी रात का समय है। एक साधारण-सा डाकिया किसी घर के बाहर एक अखबार छोड़ जाता है। अखबार की इबारत में किसी एक विशेष शब्द पर लाल स्याही का छोटा सा निशान बना है। अगले ही दिन सैकड़ों किलोमीटर दूर एक क्रांतिकारी को यह संदेशा मिल जाता है कि हथियारों की खेप सुरक्षित पहुंच गई है। अंग्रेजों की खुफिया पुलिस ऐसा नहीं है कि अखबार नहीं पढ़ती थी, लेकिन उसे, उसमें कुछ भी असामान्य नहीं दिखता था और इन्हीं अखबारों के जरिये क्रांतिकारियों के लिए सूचनाओं का आदान-प्रदान खूब धड़ल्ले से हो जाता था। यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह अदृश्य युद्ध था, जिसमें गोलियों से कहीं ज्यादा खतरनाक गुप्त संदेश और इन गुप्त संदेशों को इधर से उधर भेजने वाले जासूस हुआ करते थे।
भारत की आज़ादी की लड़ाई केवल खुले मैदानों में नहीं लड़ी गई। इसके पीछे ऐसे छाया-युद्धों की दुनिया भी मौजूद रही है, जहां न वर्दी होती थी, न पहचान और न ही कोई पदक। यहां जीत उसी की होती थी, जो दुश्मन की आंखों में धूल झोंक सकता था। अंग्रेजों के पास एक लंबी-चौड़ी खुफिया व्यवस्था थी, लेकिन भारतीय क्रांतिकारियों ने उन्हीं से सीखकर एक ऐसा गुप्त नेटवर्क तैयार कर लिया था, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींद उड़ा दी थी। क्रांतिकारी जानते थे कि सीधे मुकाबले में वे अंग्रेजी सेना का बाल भी बांका नहीं कर सकते। इसलिए उन्होंने अंग्रेजों से जंग के लिए ऐसे-ऐसे तरीके ईजाद किये कि अंग्रेजी साम्राज्य असहाय होकर रह गया। कोई क्रांतिकारी साधु बनकर यात्रा करता और महत्वपूर्ण संदेश को एक ज़िले से दूसरे ज़िले तक ही नहीं बल्कि देश के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंचा देता था। कोई फेरीवाला गांव-गांव घूमता और अंग्रेजों के विरुद्ध योजनाओं की पूरी लिस्ट आम आदमियों तक पहुंचा देता। कोई रेलवे कर्मचारी बनकर सैनिक गतिविधियों की खबरें जुटाता था। देखने वालों को ये बिल्कुल सामान्य इन्सानों जैसे लगते, लेकिन यही सामान्य लोग अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध क्रांतिकारी गतिविधियों की योजनाओं को एक जगह से दूसरी जगह इतनी सफाई से पहुंचाते कि अंग्रेजों की भारी भरकम फौज और खुफियातंत्र बस देखता ही रह जाता।
वास्तव में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को खतरनाक इन्हीं अबूझ पहेलियों ने बनाया था। ब्रिटिश पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौती उन दिनों यह होती थी कि वह दुश्मन को लाख कोशिशों के बाद भी पहचान नहीं पाती थी। कोई स्कूली शिक्षक, कोई किसान, कोई डाकिया या कोई साधारण दुकानदार। कौन, कब, कहां और किस समय गुप्त जासूसी का हिस्सा होता, अंग्रेज बहुत कोशिशों के बाद भी इस सच्चाई को जान नहीं पाते। इसलिए क्रांतिकारियों की ज्यादा से ज्यादा गुप्त योजनाएं अपने मकसद में किसी हद तक सफल हो जाती थीं। भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों की भले गुप्तचरी को लेकर कोई औपचारिक ट्रेनिंग नहीं हुई थी, लेकिन उन्होंने अपनी कल्पनाशीलता से ऐसे-ऐसे तरीके ईजाद कर लिए थे कि बाद में उनके वही सब तरीके एक सफल गुप्तचरी का पाठ बन गये। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों के गुप्तचरी के कारनामे किसी बेहद पठनीय जासूसी उपन्यासों से कम नहीं थे। कहीं अदृश्य स्याही से पत्र लिखे जाते थे, जो आग या किसी विशेष रसायन के संपर्क पर ही पढ़े जा सकते थे। कहीं सामान्य पारिवारिक चिट्ठियों में घरेलू बातों के बीच कुछ ऐसे शब्द रख दिये जाते थे, जो पूरी योजना को पत्र पढ़ने वाले तक पहुंचा दिया करते थे। कई बार एक ही संदेश किसी क्षेत्र विशेष में अलग-अलग लोगों को टुकड़ों के रूप में भेजा जाता और फिर संकेत दिया जाता कि वो लोग आपस में मिलकर उन टुकड़ों को जोड़कर योजना का मसौदा जान लें।
पुलिस की गतिविधियों और हथियारों की आवाजाही तथा बड़े अधिकारियों के कार्यक्रमों पर स्वतंत्रता सेनानियों की हमेशा पैनी निगाह रहती और इसे वह बड़ी सफलता से संकेतों के माध्यम से एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचा देते। बार-बार स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से मात खाने के बाद हालांकि ब्रिटिश सरकार ने भी इसी तर्ज पर एक अनौपचारिक खुफियातंत्र विकसित किया था, जो उस समय की सीआईडी जैसी संस्था को गुप्त रूप से सूचनाएं पहुंचाता था, लेकिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ऐसी हर तरह की कोशिशों पर भारी पड़ते थे। क्योंकि जब तक ब्रिटिश सत्ता क्रांतिकारियों के किसी जासूसी के तरीके को जान पाती थी, तब तक क्रांतिकारी किसी दूसरे तरीके पर काम शुरू कर देते लेकिन हैरानी की बात यह है कि अंग्रेजों को इतनी बुरी तरह से चकमा देने वाले आज़ादी की लड़ाई में शामिल रहे इन जासूसाें में से ज्यादातर यानी करीब-करीब सभी को इतिहास की पुस्तकों में जगह नहीं मिली। शायद यह कोई षड्यंत्र नहीं था। इनका काम ही ऐसा था कि वो इतिहास की किताबों तक नहीं पहुंचे, लेकिन इससे आज़ादी की लड़ाई में उनका महत्व कम नहीं हो जाता बल्कि सच बात तो यह है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल हथियारों के जरिये नहीं लड़ा या जीता गया बल्कि इस जीत में बहुत बड़ा योगदान भारत के चकमा देने वाले देशी गुप्त संदेशवाहकों और जासूसों का था, जिनकी असली पहचान उनके साथ ही दफन हो गई। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर




