जारी रहेगा राम मंदिर ट्रस्ट का विवाद
अयोध्या के राम मंदिर में करोडों रुपये की चढ़ावा चोरी का मामला उजागर होने के बाद भी श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट अपने कामकाज में पारदर्शिता लाने को तैयार नहीं दिख रहा है। ट्रस्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) की तलाश हो रही है। पहले इस पद के लिए विज्ञापन निकाला गया था। उसके जवाब में 5200 लोगों ने आवेदन किया, जिनमें से तीन लोगों की समिति ने सिर्फ 18 लोगों के नाम शॉर्टलिस्ट किए। सवाल है कि 5200 आवेदनों में से 18 नाम किस आधार पर छांटे गए? ट्रस्ट के सीईओ पद के लिए आवेदन करने वाले पूर्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने यह मुद्दा उठाया है।
उन्होंने कहा था कि वह सीईओ पद के लिए घोषित की गई सारी योग्यता रखते हैं, फिर भी उनका नाम शॉर्टलिस्टेड उम्मीदवारों में नहीं है। वह जानना चाहते हैं कि उन्हें छांटने का क्या आधार है। हो सकता है कि और भी आवेदक यह जानना चाहे। सरकार मे किसी बड़े पद के लिए ऐसे आवेदन आते हैं तो सरकार के पास उनकी जांच कराने का सिस्टम होता है, लेकिन ट्रस्ट के तीन लोगों की समिति के पास ऐसा कोई सिस्टम होने की खबर नहीं है। इसलिए जाहिर है कि सिर्फ अपनी मज़र्ी के आधार पर लोगों के नाम छांटे गए हैं। यह भी कहा जा रहा है कि संघ और विश्व हिंदू परिषद की ओर से पहले ही कुछ लोगों के नाम तय हैं, जिनमें से किसी को चुना जाएगा। जो हो, इतना तय है कि यह मामला अभी और विवादों में फंसेगा।
यूपीआई शुल्क
भारत में बहुत सारे सरकारी फैसलों से पहले लोगों को आज़माया जाता है। मीडिया में कुछ खबरें दी जाती हैं। उन पर लोगो की प्रतिक्रिया देखी जाती है और तब नीतिगत फैसला होता है। कई मामलों में ऐसा हुआ है। ताजा मामला यूपीआई के ज़रिए होने वाले डिजिटल लेन-देन पर शुल्क लगाने का है। पिछले दिनों खबर आई कि सरकार डिजिटल लेन-देन पर शुल्क लगाने जा रही है, क्योंकि इस पर बहुत खर्च हो रहा है। अभी ग्राहक या दुकानदार को शुल्क नहीं देना होता है। उस पर 20 हज़ार करोड़ रुपए का खर्च सरकार करती है। ज़ाहिर है 140 करोड़ नागरिकों को एक सुविधा देने के लिए इतना खर्च करना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन सरकार शुल्क लगाना चाहती है। इसकी खबर आने के बाद लोगों ने सोशल मीडिया में इसका जम कर विरोध किया तो सरकार ने फैसला वापस करने के अंदाज़ में कहा है कि ग्राहकों को कोई शुल्क नहीं देना होगा और छोटे दुकानदारों को भी उनके लेन-देन पर कोई चार्ज नहीं देना होगा। जनता खुश हो गई क्योंकि सरकार ने कहा कि बड़े दुकानदारों और बड़े लेन-देन पर ही शुल्क लगेगा। अब सवाल है कि छोटे लेन-देन पर हो या बड़े पर, दुकानदार कहां से शुल्क देगा? क्या सरकार यह कह रही है कि दुकानदार अपना मुनाफा घटा कर शुल्क भरेगा? ऐसा नहीं होता है। दुकानदार जो शुल्क चुकाएगा वह ग्राहक से ही वसूलेगा। इसलिए ग्राहकों को ज्याद खुश होने की ज़रुरत नहीं है।
शिक्षा विभाग का तमाशा जारी
केंद्र सरकार परीक्षा में गड़बड़ियों के मामले में पिछले कई महीने से घिरी है। देश भर के छात्रों के दबाव में सरकार ने तत्कालीन शिक्षा मंत्री धमेंद्र प्रधान का इस्तीफा तो करा लिया, लेकिन उसके बाद नया तमाशा शुरू हो गया है। सरकार ने पूर्णकालिक शिक्षा मंत्री का इस्तीफा कराया और दो बड़े मंत्रालय संभाल रहे प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। इससे पहले सरकार ने उच्च शिक्षा के सचिव विनीत जोशी को हटा दिया। हालांकि हटाना कोई सज़ा नहीं थी, क्योंकि उन्हें पंचायती राज का सचिव बनाया गया। लेकिन शिक्षा विभाग में असली तमाशा उसके बाद शुरू हुआ। विनीत जोशी की जगह नरेश पाल गंगवार को उच्च शिक्षा सचिव बनाया गया। उनकी पोस्टिंग 23 जुलाई को हुई, लेकिन वे ज्वाइन ही नहीं कर सके क्योंकि विनीत जोशी ने पद नहीं छोड़ा। विनीत जोशी ने पद इसलिए नहीं छोड़ा क्योंकि उन्हें जिन विवेक भारद्वाज की जगह पंचायती राज में जाना था, वह 31 जुलाई को सेवा-निवृत्त होने वाले थे, परन्तु नहीं हुए। सो, वह अपने पद पर बने रहे और इस वजह से जोशी भी अपने पद पर रहे। अब बिना ज्वाइन किए गंगवार वहां से विदा हो गए। उनकी जगह अर्चना गौर मुखर्जी को नया उच्च शिक्षा सचिव बनाया गया है। यह पूरी कवायद बताती है कि इतने हंगामें और छात्रों के इतने अहम सरोकार के बावजूद सरकार को कोई परवाह नहीं है। पिछले तीन हफ्ते से तदर्थ शिक्षा मंत्री और तदर्श शिक्षा सचिव से उच्च शिक्षा विभाग का काम चल रहा है।
भ्रष्टाचार संबंधी संदेश
भ्रष्टाचार के मसले पर देश के लोगों को केंद्र सरकार यह जताना चाहती है कि वह बहुत गंभीर है। इसलिए दिल्ली हाई कोर्ट के जज रहे जस्टिस यशवंत वर्मा पर महाभियोग चलेगा। उनके खिलाफ संसद की जांच समिति की रिपोर्ट आ गई है। जानकार सूत्रों का कहना है कि सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगी। उनके खिलाफ महाभियोग चलेगा और उन्हें हटाया जाएगा। ध्यान रहे आज तक देश के किसी भी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज को महाभियोग के ज़रिए नहीं हटाया गया। यह पहला मौका हो सकता है जब हाई कोर्ट के जज को भ्रष्टाचार के आरोप में महाभियोग के ज़रिए हटाया जाए।
संसद की बनाई जांच समिति ने जस्टिस वर्मा पर लगे तीनों आरोपों को सही पाया है। उनके ऊपर मुख्य आरोप यह है कि जब वह दिल्ली हाई कोर्ट में जज थे तब उनके आवास के स्टोर रूम में पांच-पांच सौ रुपये के नोटों की गड्डियां बोरे में भरी हुई मिली थीं। वह इस पर पहले सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति और बाद में संसद की जांच समिति को भी संतुष्ट नहीं कर पाए। उन्होंने हालांकि इस्तीपा दे दिया है, लेकिन कानून के जानकारों का कहना है कि महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने के बाद उन्होंने इस्तीफा दिया है, इसलिए महाभियोग चलता रहेगा। तकनीकी स्थिति यह है कि राष्ट्रपति ने भी अभी तक उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया है। इससे भी लग रहा है कि सरकार मामले को रफा-दफा होने देने के मूड में नहीं है।





