वंदे मातरम् गायन को लेकर उपजता विवाद
कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के कथित अपमान के आरोप पर देश की राजनीति गरमा गई है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने चित्तौड़गढ़ में कहा कि ‘यह गान फिर से सम्मान प्राप्त कर रहा है, जो सोनिया गांधी को रास नहीं आ रहा है। सोनिया जी 140 करोड़ जनता आपको देख रही है। यदि कांग्रेसियों में जरा भी शर्म बची है तो इस गीत के अमर रचयिता बंकिम बाबू और जनता से माफी मांगें।’ इस बीच दिल्ली के इंद्रप्रस्थ थाने में अधिवक्ता शुभ शर्मा ने सोनिया और राहुल गांधी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। कर्नाटक के भाजपा नेता विकास पुत्तुर ने भी थाने में शिकायती अर्जी दी है। बंकिम बाबू के वंशज सुमित्रो चटर्जी ने भी सोनिया गांधी से बिना शर्त माफी मांगने का आग्रह किया है यानी यह विवाद लंबा चलने वाला है। स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले पर जब समारोह चल रहा था, तब राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसके संपूर्ण गान से किनारा कर लिया था। वंदे मातरम् को लेकर पहली बार विवाद खड़ा हुआ हो ऐसा नहीं है, रह-रहकर विवाद नए-नए रूपों में अंगड़ाई लेता ही रहता है। यही नहीं जब राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ की तरह वंदे मातरम् को संसद में विधायी संरक्षण देने संबंधी विधेयक पर चर्चा हो रही थी तब भी कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल पीछे हट रहे थे। बावजूद इसके संपूर्ण गायन से जुड़ा विधेयक पारित हो गया।
राष्ट्रगीत का बहिष्कार संसद और विधानसभाओं में तो होता ही रहा है, किंतु अब स्वतंत्रता दिवस के पर इसके संपूर्ण गान का विरोध किया जाना चिंताजनक है। संविधान के इस प्रविधान का अपमान अलगाववादी मानसिकता का प्रतीक है। यह मामला तब और गंभीर हो जाता है, जब निर्वाचित सांसद और विधायक वंदे मातरम् की उपेक्षा करें क्योंकि कोई भी जनप्रतिनिधि न केवल बहुधर्मी और बहुजातीय मतदाताओं के बहुमत से संसद में पहुंचता है, बल्कि धर्म व जातीयता से ऊपर उठकर संविधान, देश व जनहित की शपथ लेकर अपने कर्त्तव्य का पालन करता है। लिहाजा यह मुद्दा धर्म और राजनीति से परे राष्ट्रीय गरिमा और सोच से जुड़ा मसला है। यदि राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान करने वाले लोगों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई नहीं की गई तो इससे अलगाववाद की संकीर्ण मानसिकता को विस्तार मिलेगा और जनता में गलत संदेश जाएगा। इसलिए इस्लाम या ईसाइयत के बहाने वंदे मातरम् का विरोध करने वाले जो भी सांसद या विधायक हों, उन्हें बर्खास्त किया जाए। पूर्व सांसदों व विधायकों को मिलने वाले विशेषाधिकार व सुविधाओं से भी वंचित किया जाए।
बंकिम चंद्र चटर्जी के बांग्ला भाषा में लिखे उपन्यास ‘आनंद मठ’ में उल्लेखित गीत को ‘राष्ट्रगीत’ के रूप में स्वीकारा गया है। यह गीत कोई मामूली गीत नहीं है। भारत को उसकी व्यापक राष्ट्रीयता की पहचान और स्वाभिमान इसी गीत से प्राप्त हुए। नागरिक सभ्यता की विरासत, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानव सेवा के मूल्यों के उत्स इसी गीत के समवेत स्वर की उपज हैं। अंग्रेजों के विरुद्ध भिन्न जातीय और धर्म-समुदायों को संगठित करने के अभियान में इसी गीत की भूमिका बुलंद थी। तय है, वंदे मातरम् क्रांति के स्वरों में नींव का पत्थर था। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की रक्त धमनियों में विद्रोह की उग्र भावना इसी गीत की देन है। 1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन को देशव्यापी धरातल इसी गीत के बूते मिला था। और वह यही आंदोलन था, जिसमें गांधी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया था। सुभाषचंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फौज के फौजियों ने भी इसी गीत को गाते हुए मातृभूमि की बलिवेदी पर प्राण न्यौछावर किए थे।
14 अगस्त 1947 की मध्य-रात्रि में जब देश आज़ाद हो रहा था, तब इस मंत्र गीत का गायन श्रीमती सुचेता कृपलानी ने किया और वहां उपस्थित लोग इस गीत के सम्मान में गीत खत्म हो जाने तक खड़े रहे। 15 अगस्त, 1947 को जब स्वतंत्रता का सूर्योदय हो रहा था, तब आकाशवाणी पर पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने इसे बड़े ही रोचक ढंग से गाया। आखिरकार 24 अगस्त, 1948 को जन गण मन के साथ इस गीत को भी राष्ट्रगीत की प्रतिष्ठा मिली। लेखक और दार्शनिक युगदृष्टा होते हैं, इसलिए बंकिम बाबू ने इस गीत को लिखे जाने के वक्त ही अपनी दिव्यदृष्टि से अनुभव कर लिया था कि यह गीत राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बनकर लोकप्रियता के शिखर चूमेगा, इसीलिए उन्होंने इसे बंगाली भाषा में न लिखते हुए संस्कृत में लिखा। मूल और संपूर्ण गीत की केवल नौ पंक्तियां बंगाली में हैं। गीत का जो संपादित अंश राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया गया है, वह केवल आठ पंक्तियों का है।
बाद में देश-विभाजन के लिए जिम्मेदार मुस्लिम लीग के नेताओं ने ज़रूर वंदे मातरम् को बुतपरस्ती, मसलन मूर्तिपूजा मानते हुए इसका विरोध किया। इस बहाने लीगियों ने अल्पसंख्यकों को खूब उकसाया। नतीजतन 1938 तक कांगेस के जो प्रमुख मुस्लिम नेता इस गीत की राष्ट्रीय गरिमा का ख्याल रखते चले आ रहे थे, वे भी दबी जुबान से इसका विरोध करने लगे। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप बहुसंख्यक हिंदू और सिख हठपूर्वक गीत की महिमा के बखान में लगे रहे। वंदे मातरम् एक मौलिक रचना है, इसकी व्याख्या धर्म नहीं, केवल साहित्य के संदर्भ में होनी चाहिए। इसे यदि कोई सांसद या विधायक इस्लाम विरोधी जताता है, तो उसका मकसद धर्म के बहाने राजनीतिक रोटियां सेंकना है, जो अलगाववादी राजनीति की संकीर्ण मानसिकता का प्रतीक है। सोनिया गांधी ने इस गीत का विरोध करके अपने ईसाई होने की पहचान को महत्व दिया है। राजनीतिक स्वार्थ के लिए राष्ट्रीय हितों को दरकिनार करना राष्ट्रघाती सोच है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि संविधान की गरिमा को पलीता लगाने वाले और राष्ट्रीयता के प्रतीक गीत का अपमान करने वाले प्रतिनिधियों को कानून के दायरे में सबक सिखाया जाए। ताकि सदनों में संकीर्ण सोच का विस्तार न हो। प्रतिनिधि बहुमत से लिए निर्णयों का आदर करने के लिए हैं, न कि निरादर के लिए।



