प्रधानमंत्री का लाल किला से ‘विकसित भारत’ का संकल्प
ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर केवल पत्थरों की एक संरचना नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के उतार-चढ़ाव, उसकी आकांक्षाओं, उसकी नियति और उसके सामूहिक संकल्पों की मूक गवाह रही है। हर वर्ष 15 अगस्त को इस प्राचीर से देश के प्रधानमंत्री जब राष्ट्र को संबोधित करते थे तो वह केवल एक औपचारिक भाषण नहीं होता, बल्कि वह आने वाले समय के लिए देश का नीतिगत व वैचारिक रोडमैप होता है। स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसी ऐतिहासिक प्राचीर से वर्ष 2047 तक भारत को एक ‘विकसित भारत’ बनाने का जो अटूट संकल्प दोहराया है, वह देश की समकालीन राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज के लिए एक युगांतकारी मोड़ है। ‘विकसित भारत’ का यह विजन महज़ एक राजनीतिक नारा नहीं है, बल्कि यह 140 करोड़ नागरिकों की सामूहिक चेतना को जगाने और उन्हें राष्ट्र निर्माण के एक महायज्ञ में आहुति देने के लिए प्रेरित करने वाला एक व्यापक राष्ट्रीय दर्शन है। जब हम इस विराट संकल्प की बात करते हैं, तो हमें इसके ऐतिहासिक संदर्भ और प्रासंगिकता को गहराई से समझना होगा। भारत ने लगभग दो सदियों तक औपनिवेशिक दासता और आर्थिक शोषण का दंश झेला है। 1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ, तब हमारी अर्थव्यवस्था जर्जर थी, साक्षरता दर दयनीय थी और अकाल तथा गरीबी जैसी बुनियादी चुनौतियां हमारे सामने थीं। शुरुआती दशकों में भारत का मुख्य ध्यान आत्मनिर्भरता और बुनियादी अस्तित्व की रक्षा पर था। हमने खाद्यान्न संकट से निपटने के लिए हरित क्रांति की, अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए सैन्य तंत्र को मजबूत किया और धीरे-धीरे एक ठोस औद्योगिक आधार तैयार किया। आज स्वतंत्रता के इस दौर में भारत उस स्थिति से बहुत आगे निकल चुका है और अब हम केवल एक अस्तित्व बनाए रखने वाले देश नहीं हैं, बल्कि हम वैश्विक पटल पर एक नई दिशा तय करने वाले राष्ट्र बन चुके हैं। यह संकल्प इस बात का प्रतीक है कि अब भारत अपनी विकासशील छवि के खोल को तोड़कर वैश्विक शक्तियों की अग्रिम पंक्ति में खड़े होने के लिए पूरी तरह तैयार है। 2047 का वर्ष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमारी स्वतंत्रता का शताब्दी वर्ष होगा और कोई भी राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने पर दुनिया के सामने अपनी सफलता का क्या प्रमाण प्रस्तुत करता है, यही उसका वास्तविक ऐतिहासिक मूल्यांकन होता है।
इस व्यापक संकल्प को धरातल पर उतारने के लिए देश के चार प्रमुख वर्गों को विकास का मुख्य केन्द्र बिंदु बनाया गया है, जिन्हें युवा, महिला, किसान और गरीब के रूप में रेखांकित किया गया है। इन चारों स्तंभों के समग्र सशक्तिकरण के बिना किसी भी विकसित समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। भारत आज दुनिया का सबसे युवा देश है और हमारी जनसांख्यिकीय लाभांश हमारी सबसे बड़ी ताकत है। विकसित भारत का सपना तभी सच हो सकता है जब इस युवा ऊर्जा को सही दिशाए उत्कृष्ट शिक्षा व वैश्विक स्तर का कौशल मिले। देश में स्टार्टअप इकोसिस्टम का तेजी से विस्तार और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाना इसी दिशा में उठाए गए बड़े कदम हैं। इसके साथ ही, विकसित भारत का दूसरा अनिवार्य पहलू महिलाओं का सशक्तिकरण और उनके नेतृत्व में होने वाला विकास है। जब तक देश की आधी आबादी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से पूरी तरह सक्रिय नहीं होगी, तब तक विकास की रफ्तार अधूरी रहेगी। सेनाओं में महिलाओं की भागीदारी से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होती महिलाओं की बढ़ती संख्या इस बात का प्रमाण है कि वे अब नीति निर्धारण के केंद्र में आ रही हैं। इसी तरह भारत की आत्मा आज भी गांवों में बसती है और हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि है। विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कृषि क्षेत्र में तकनीकी सुधार, आधुनिक खेती को बढ़ावा और वैश्विक कृषि आपूर्ति श्रृंखला में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाना आवश्यक है। किसान जब पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर आधुनिक कृषि-उद्यमी बनेगा, तभी ग्रामीण भारत समृद्ध होगा। अंत में अंत्योदय की भावना के अनुरूप समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचना चाहिए, क्योंकि किसी भी राष्ट्र को तब तक विकसित नहीं कहा जा सकता जब तक कि बहुआयामी गरीबी का पूरी तरह उन्मूलन न हो जाए और हर नागरिक को सम्मानजनक जीवन स्तर न मिल जाए।
आर्थिक मोर्चे पर भारत आज दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और शीर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं की ओर अग्रसर है। लेकिन विकसित देश बनने के लिए हमें केवल सकल घरेलू उत्पाद के आकार को ही नहीं बढ़ाना है, बल्कि प्रति व्यक्ति आय और नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में भी गुणात्मक सुधार करना होगा। इसके लिए विनिर्माण और आत्मनिर्भरता पर विशेष बल देना आवश्यक है। ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के तहत भारत आज मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग, रक्षा उत्पादन और इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में एक वैश्विक केंद्र के रूप में उभर रहा है। इस पूरे महायज्ञ में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका देश के नागरिकों की है। कोई भी देश केवल सरकार की नीतियों, बजट या घोषणाओं से विकसित नहीं बनता। विकसित भारत का संकल्प तब तक अधूरा है जब तक देश का हर नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सजग नहीं होता। चाहे वह करों का ईमानदारी से भुगतान करना हो, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना हो, पर्यावरण को बचाना हो या फिर अपने-अपने कार्यक्षेत्र में पूर्ण ईमानदारी और उत्कृष्टता के साथ योगदान देना हो, ये सभी नागरिक प्रयास मिलकर एक विशाल राष्ट्रीय शक्ति का निर्माण करते हैं। जब देश के नागरिक ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना को अपने जीवन का मूल मंत्र बना लेंगे, तो भारत की प्रगति को कोई रोक नहीं पाएगा।

