तमिलनाडु में हावी सिने-सियासत

तमिलनाडु के चुनाव (विधानसभा) ने इस बार पहले के सभी अनुमान गलत साबित कर दिए। अभिनेता और टी.वी. के प्रमुख थलापति विजय की सफलता ने राजनीति के पंडितों को भी हैरान कर दिया। अगर तमिलनाडु का पिछला इतिहास खंगाला जाए तो यह इतना आश्चर्यजनक भी नहीं है। वहां ‘पालिटिकल सिनेमा’ का लम्बा इतिहास सामने है। यह चालीस का दशक ही था जब सामाजिक सरोकारों वाली फिल्में जन-मानस को आकर्षित करने लगी थीं। इन फिल्मों में सामाजिक असमानता, अवसरों की कमी और सामाजिक न्याय की बातें परिपक्व संदेश बनती रहीं। सिनेमा अवाम की राजनीतिक समझ को मज़बूत करती रही।
विजय ने उसी द्रविड़ परम्परा को आगे बढ़ाया, जिस परम्परा से डी.एम.के. और अन्ना डी.एम.के. निकली हैं। अपनी फिल्मों के माध्यम से भ्रष्ट व्यवस्था से जूझना, लड़ना और नायक को एक मसीहा की छवि प्रदान करना, सत्यनिष्ठ और कोमल स्वभाव दिखाना इनकी विशेषता रही है। हिन्दी फिल्मों में मनोज कुमार के नायकत्व वाली ‘बेईमान’ फिल्म भी इस तरह की रही है। इनकी फिल्मों में समाज की तीखी, परेशानकुन समस्याओं को लेकर भारी गुस्से की अभिव्यक्ति रहती है जिससे लोगों को लगता है कि यही है हमारा नायक जो भ्रष्टाचार की तमाम दीवारों को तोड़-फोड़ देगा। यदि आप विजय की फिल्मों से अपरिचित रह गए हो तो समझ लें कि 70 के दशक में जिस तरह अमिताभ बच्चन की एंग्री यंगमैन की छवि बन गई थी, कुछ ऐसा ही विजय की फिल्म ने तमिलनाडु की जनता को प्रभावित किया। ऐसी फिल्मों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव कुछ इसी तरह का होता है।
दक्षिण भारत की फिल्मों में सितारों का छाप छोड़ना उनके ग्लैमर से नहीं आता। इसकी सामाजिक सांस्कृतिक प्रक्रिया है जो प्रभाव बनाती है। आम तौर पर वे स्टार या तो पौराणिक किरदार में आते हैं या फिर घटिया व्यवस्था के विरुद्ध लड़ते हुए। इस इमेज को राजनीतिक एजेंडे में परिवर्तित किया जाता है। यह काम इतना प्रभावी ढंग से किया जाता है कि उसे वोट बैंक में बदलने में कोई मुश्किल पेश नहीं आती। दूसरा, वे हमेशा भाषायी गौरव और क्षेत्रीय अस्मिता को पहल देते हैं। लोगों से जुड़े रहते हैं जिसका राजनीतिक लाभ उन्हें मिलता ही है। वे ग्लैमर पर अपना ध्यान नहीं देते, सामाजिक आन्दोलन से जुड़े रहते हैं। अन्ना दुरई और करुणानिधि जैसे अभिनेता पहले लेखक और विचारक रहे, बाद में राजनेता बने। फिल्म मीडिया का उपयोग भी उन्होंने द्रविड़ विचारधारा के प्रसार के लिए किया। अन्नादुरई तो फिल्मी दुनिया से आकर पहले सी.एम. बने। 1969 में जब तमिलनाडु राज्य का गठन हुआ उन्हें ही सी.एम. बनाया गया था। एन.टी.आर. पार्टी के गठन के 9 महीने बाद ही सी.एम. बन गए थे। कोई लम्बा संघर्ष नहीं करना पड़ा था। तेलगु फिल्म के ‘भगवान’ की छवि लेकर आए एन.टी. रामाराव ने 1982 में तेलगु देशम पार्टी कर गठन किया था और कांग्रेस के दशकों पुराने किले को सिर्फ 9 महीने के समय में ध्वस्त कर मुख्यमंत्री बने थे। उन्होंने एक बार नहीं, तीन बार राज्य की बागडोर सम्भाले रखी। करुणानिधि तो स्क्रिप्ट राइटिंग से मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे। वह पांच बार (लगभग 20 वर्ष) तक मुख्यमंत्री बने रहे। राजनीति में व्यस्त रहने पर भी उन्होंने फिल्म लेखन जारी रखा। लगभग 75 फिल्मों की स्क्रिप्ट और संवाद लिखे। 
जयललिता को याद करें तो वह राजनीति में अपना सिक्का जमाने वाली पहली महिला मुख्यमंत्री रहीं। एम.जी.आर. की को-स्टार रहीं। जयललिता बाद में उन्हीं के प्रभाव में राजनीति में उतरीं और बतौर अन्ना डी.एम.के. नेत्री छ: बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रही। अब यह विरासत विजय के पास है।  

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